कुख्यात आतंकी संगठन हमास ने इजरायल पर अब तक का क्रूरतम हमला किया है. इन हमलों में 900 से ज्यादा लोगों के मारे जाने की सूचना है. हमास के आतंकवादियों ने न केवल लोगों को मारा है बल्कि इजरायल से बहुत से बच्चों को बंधक बनाकर अपने साथ भी ले गए हैं. ताकि इजरायल को जवाबी कार्रवाई करने से रोका जा सके. हालांकि इजरायल पर इसका कोई फर्क नहीं पड़ा. दुनिया भर में हमास के हमलों की निंदा हो रही है. भारत सरकार ने घोषणा की है कि इस अहम मौके पर देश इजरायल के साथ खड़ा है.पर दुर्भाग्य की बात ये है कि देश के हिस्सों से इजरायल विरोधी और हमास समर्थक बयान और प्रदर्शन देखने को मिल रहे हैं. अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी में हमास के समर्थन में जुलूस निकाला गया है, असुद्दीन ओवैसी ने खुलकर फिलिस्तीन का समर्थन किया है और इजरायल को दोषी करार दिया है. कम्युनिस्ट नेता दीपांकर भट्टाचार्य ने भी इजरायल का साथ देने के लिए भारत सरकार की आलोचना की है. कई जगहों से इजरायल में हुए नरसंहार को सेलिब्रेट करने की खबर भी आई है.
एएमयू वाली घटना से बढ़ेगा तनाव
अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी में हमास के समर्थन में रविवार देर शाम करीब 400 छात्रों ने रैली निकाली. जुलूस में फिलिस्तीन की स्वतंत्रता, नारा-ए-तकबीर...अल्लाह हू अकबर, ला इल्लाह इल अल्लाह जैसे नारे लगाए गए. इस पर पुलिस ने FIR दर्ज की है.सोशल मीडिया पर भी कहीं इजराइल तो कही फिलिस्तीन के समर्थन में पोस्ट करने से प्रशासन को डर है कि सांप्रादायिक तनाव बढ़ सकता है. अलीगढ़ और वेस्ट यूपी के कई जिलों में अलर्ट किया गया है. एएमयू की घटना के बाद प्रतिक्रिया हुई है. योगी सरकार में मंत्री ठाकुर रघुराज प्रताप सिंह ने कहा कि मैं प्रधानमंत्री और राष्ट्रपति से मांग करता हूं कि यूनिवर्सिटी को बंद करना चाहिए. AIMIM के मुखिया असद्दीन ओवैसी ने कहा कि गाजा पट्टी को इजरायल ने खुली जेल में बदल दिया है. इजरायल ने 16 साल से गाजा पट्टी को ब्लॉक कर रखा है. इतना ही नहीं साल 2021 में इजरायल ने गाजा एयरपोर्ट को भी बर्बाद कर दिया था.उन्होंने कहा कि मिस्र में आने वाला राफा के रास्ते को भी इजराइल खोलता और बंद करता रहता है.ओवैसी ने कहा कि इजरायल की ओर से हिंसा फैलाई जा रही है.ये लोग तब ऐसा कह रहे हैं जब हमास की ओर से इजारायल पर किए गए ताबड़तोड़ हमलों की भारत ने निंदा की है. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कहा था कि हम इजरायल में आतंकवादी हमलों की निंदा करते हैं. हम कठिन वक्त में एकजुटता के साथ इजराइल के साथ खड़े हैं.
कनाडा-ब्रिटेन और भारत से सेलेब्रेशन की खबरें, यूएई और सऊदी से क्यों नहीं
भारत के मुसलमानों को समझना चाहिए कि आखिर यूएई और सऊदी अरब के मुसलमान अपने रोष को क्यों दबाए हुए हैं. सऊदी के मुसलमान क्या भारत के मुसलमानों से कमतर हैं? दरअसल दुनिया भर में देश के नागरिकों के लिए राष्ट्रहित सर्वोपरि है. यूएई और सऊदी की समस्याएं अलग अलग हैं. यही कारण है कि सऊदी और यूएई के मुसलमान अपने देश के साथ हैं. ईरान अगर आज हमास का समर्थन कर रहा है तो ये उसका हित है. पर जो हित ईरान का है वही हित यूएई और सऊदी का नहीं हो सकता. ईरान हूती विद्रोहियों को यूएई और सऊदी के खिलाफ साजो सामान मुहैया कराता रहा है. हूती विद्रोहियों से निपटने के लिए और यमन में सरकार को पुनर्स्थापित करने के लिए सऊदी अरब ने 2015 में अरब देशों का एक सैन्य गठबंधन तैयार किया था. दुनिया जानती है कि यमन पर कब्जे की लड़ाई में सऊदी अरब और अन्य खाड़ी देशों और ईरान के बीच एक छद्म युद्ध चलता रहा है. अगस्त, 2020 में इजरायल और यूएई के बीच एक समझौता हुआ ईरान विरोधी गठबंधन में इजरायल की भी एंट्री हो गई. अब यूएई और सऊदी के लोग अपने देश के साथ मजबूती से खड़े हैं.
यूएई खुलकर आया इजरायल के साथ, सऊदी का बैलेंस रुख
इजरायल पर हमले का ईरान और कई मुस्लिम देशों में जश्न मनाया जा रहा है, वहीं यूएई ने हमास को चेताया है. मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार यूएई खुलकर इजरायल के साथ आ गया है. बताया जा रहा है कि यूएई ने भी सीरिया को अपनी धरती से इजरायल के खिलाफ किसी भी हमले की अनुमति नहीं देने की चेतावनी दी है.यूएई ने साल 2021 में इजरायल में अपना दूतावास खोला था. कई खाड़ी देशों ने IOC के मंच पर यूएई की आलोचना भी की थी कि यूएई इजरायल के खिलाफ नरम पड़ रहा है. यूएई ने कहा कि वह इन खबरों से हैरान है कि हमास ने इजरायल के लोगों को उनके घरों से निकालकर बंधक बना लिया है.सऊदी अरब ने भी बहुत सतर्कतापूर्वक प्रतिक्रिया दी है. यूएई और सऊदी अरब दोनों इजरायल के साथ अपने रिश्ते मजबूत कर रहे हैं. सबसे ज़्यादा चौंकाने वाला रुख़ तुर्की का है.तुर्की के विदेश मंत्रालय के बयान को देखिए , ‘’हिंसा बढ़ने का किसी भी पक्ष को फ़ायदा नहीं होगा. तुर्की हालात काबू करने में सहयोग देने के लिए हमेशा तैयार है.हम दोनों पक्षों से अपील करते हैं, वो हिंसा का रास्ता छोड़ एक स्थायी समाधान की दिशा में काम करें.’’
हमास/कट्टरपंथ से नाता जोड़ने वालों के लिए ऐतिहासिक सबक
हिंदू-मुस्लिम एकता कायम रखने के लिए भारत ने 1920 में वो ऐतिहासिक भूल की थी, जिसने इस उपमहाद्वीप को बंटवारे की कगार पर ला दिया. मुसलमानों में वैश्विक एकता कायम करने के लिए तभी खिलाफत आंदोलन शुरू हुआ था. अंग्रेजों के खिलाफ अपनी लड़ाई में महात्मा गांधी ने उस दौरान मुस्लिम लीग का साथ इस शर्त पर लिया कि कांग्रेस खिलाफत आंदोलन में उसका समर्थन करेगी. लोकमान्य तिलक ने विरोध भी किया. बाद में इसी के चलते मोहम्मद अली जिन्ना ने कांग्रेस छोड़ दी. ये और बात है कि बाद में खुद जिन्ना एक कट्टर सेक्युलर नेता से सांप्रादायिक मुसलमान बन गए. इस 'ग्लोबल मुस्लिम ब्रदरहुड' को नजरअंदाज करने का जो सिलसिला 1920 में कांग्रेस ने शुरू किया था, वो भारत के बंटवारे के बाद इंदिरा गांधी से लेकर यूपीए -2 तक वैसे ही चलता रहा. यह वैश्विक लेवल के मुस्लिम भाईचारे का ही डर था कि इजरायल को कभी एक देश के रूप में मान्यता नहीं दी गई. यह वैश्विक मुस्लिम भाईचारा ही था कि यासिर अराफात के फिलिस्तीन को दुनिया में सबसे पहले मान्यता देने वाले देशों में भारत भी शामिल था. पर अब समय बदल गया है. बदलते समय को देखते हुए अरब देश खुद इस वैश्विक मुस्लिम भाइचारे से दूर हो रहे हैं. मिस्र ने तो खुद अपने देश में मुस्लिम ब्रदरहुड के नाम से बने आतंकी संगठन के खिलाफ कार्रवाई की है. ऐसे में ऐसे किसी भी गठजोड़ से भारतीय मुसलमानों और भारतीय राजनेताओं को दूर रहना होगा. ऐसा करने से भारतीय मुसलमान के रूप में उन्हें अलग पहचान मिलती है, जिन पर 9/11 हो या ISIS के उभार का दौर, कोई उन पर आतंकवादी होने का शक नहीं करता. जैसा कि पाकिस्तानी मुसलमानों के साथ होता है.