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चुनाव आयोग ने कर दी बंगाल पुलिस-प्रशासन की बड़ी ‘सर्जरी’, क्या TMC के परफॉर्मेंस पर फर्क पड़ेगा?

पश्चिम बंगाल में विधानसभा चुनाव से पहले चुनाव आयोग ने डीजीपी से लेकर थानों के प्रभारी तक को बदल डाले हैं. चीफ सेक्रेट्री से लेकर बीडीओ और सहायक निर्वाचन अधिकारी तक बदल दिए गए हैं. अब तो बंगाल में चुनावी हिंसा न होने की गारंटी होनी चाहिए - वरना, चुनाव आयोग भी सवालों के घेरे में आ जाएगा.

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मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार ने मुख्यमंत्री ममता बनर्जी की पूरी प्रशासनिक व्यवस्था को बदल डाला है. (Photo: PTI)
मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार ने मुख्यमंत्री ममता बनर्जी की पूरी प्रशासनिक व्यवस्था को बदल डाला है. (Photo: PTI)

पश्चिम बंगाल चुनाव के लिए मतदान में तीन हफ्ते का वक्त बचा है. पहले चरण की वोटिंग 23 अप्रैल तो दूसरे फेज के लिए 29 अप्रैल को डाले जाएंगे, और वोटों की गिनती 4 मई को होगी - अपने ताजातरीन आदेश में चुनाव आयोग ने 24 घंटे में 200 से ज्यादा अफसरों, जिनमें थाना प्रभारी और बीडीओ शामिल हैं, का तबादला कर दिया है. 

ये तबादले खास तौर पर संदेशखाली, नंदीग्राम और भवानीपुर जैसे इलाकों से जुड़े हैं. भवानीपुर से पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी चुनाव मैदान में हैं. ममता बनर्जी के खिलाफ भवानीपुर से उतरे बीजेपी नेता शुभेंदु अधिकारी अपने गढ़ नंदीग्राम से भी चुनाव लड़ रहे हैं. 

चुनाव आयोग का कहना है कि ताजा बदलावों का मकसद सिर्फ एक ही है, चुनाव को पूरी तरह निष्पक्ष और पारदर्शी बनाना. पश्चिम बंगाल चुनावों की घोषणा करते हुए 15 मार्च को मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार ने आश्वस्त किया था कि पश्चिम बंगाल में चुनाव शांतिपूर्ण तरीके से यानी हिंसा मुक्त होंगे. 

मुख्य चुनाव आयुक्त ने तब ही कहा था, 'चुनाव आयोग ने डीजीपी और कोलकाता पुलिस आयुक्त सहित वरिष्ठ पुलिस अधिकारियों की नियुक्ति और तबादले भी उसी मकसद से किए हैं,' - लिहाजा आयोग के लेटेस्ट एक्शन को भी उसी मकसद के एक्सटेंशन के तौर पर देखा जा सकता है. 

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ऐसे में, जबकि ऊपर से नीचे तक, डीजीपी से थाना प्रभारी तक, चुनाव आयोग ने पूरे पुलिस-प्रशासन को बदल डाला है, पश्चिम बंगाल चुनाव के पहली बार हिंसा मुक्त होने की अपेक्षा तो की ही जानी चाहिए - बाकी नतीजा जो भी आए. 

पश्चिम बंगाल में हुए ताजातरीन तबादले

चुनाव आयोग ने बड़े पैमाने पर पश्चिम बंगाल के थानों के प्रभारी बदल दिए हैं. चुनाव आयोग के तबादले के आदेश में भवानीपुर और नंदीग्राम विधानसभा क्षेत्र के अधिकारी भी शामिल हैं. साथ ही, हल्दिया, कोलाघाट, एगरा और पटाशपुर जैसे थानों पर भी नई नियुक्तियां की गई हैं

1. भवानीपुर थाने का प्रभारी सौमित्र बसु को बनाया गया है. सौमित्र बसु पहले स्पेशल टास्क फोर्स में तैनात थे. चंदन नगर से शुभब्रत नाथ को हटाकर नंदीग्राम थाने का प्रभारी बनाया गया है. बीजेपी उम्मीदवार शुभेंदु अधिकारी के चुनाव लड़ने की वजह से नंदीग्राम महत्वपूर्ण सीट हो गई है. वैसे ही भवानीपुर विधानसभा क्षेत्र मुख्यमंत्री ममता बनर्जी के कारण. 

2. पश्चिम बंगाल में चुनाव आयोग के नए आदेश के अनुसार, 184 पुलिस अफसरों का ट्रांसफर किया गया है. इनमें राज्य के करीब 500 से अधिक पुलिस थानों में से 173 के प्रभारी भी शामिल हैं. सिर्फ कोलकाता की ही बात करें, तो 80 थानों में से 31 पुलिस स्टेशन के प्रभारी बदले जा चुके हैं. यानी थाना स्तर पर बैठा हर तीसरा इंचार्ज हटा दिया गया है.

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3. नए तबादलों में 18 जिलों के करीब 345 बीडीओ में से 97 बीडीओ और सहायक निर्वाचन अधिकारी भी शामिल किए गए हैं. इनमें पश्चिम बंगाल सिविल सेवा के 2014 बैच के सीनियर अधिकारियों सहित 2025 के नवनियुक्त अफसर भी शामिल हैं. संदेशखाली, नंदीग्राम और भवानीपुर में भी ऐसे अधिकारी बदल दिए गए हैं. 

चुनाव आयोग की प्रतिबद्धता का इम्तिहान

चुनाव आयोग के एक सीनियर अधिकारी ने मीडिया से बातचीत में कहा कि बीडीओ और सहायक निर्वाचन अधिकारी चुनाव तंत्र के रीढ़ की हड्डी होते हैं. ग्राउंड लेवल पर ऐसे तबादले अक्सर किए जाते हैं, लेकिन ये बेहद महत्वपूर्ण होते हैं. चुनाव आयोग ऐसे तबादलों के माध्यम से स्थानीय स्तर पर बन चुके आपसी रिश्तों के जरिए लोकतांत्रिक प्रकिया पर संभावित असर को रोकने की कोशिश करता है. ताकि, मतदान प्रक्रिया निष्पक्ष और अच्छे तरीके से हो सके. 

चुनाव आयोग की बातें अपनी जगह है, ममता बनर्जी ये सब अलग नजरिए से देखती हैं. चुनाव आयोग और बीजेपी को एक साथ टार्गेट करते हुए एक चुनावी रैली में ममता बनर्जी कह रही थीं, उन्होंने आईएएस अधिकारियों का अपमान किया है. उन्होंने आईपीएस अफसरों का अपमान किया है. बीजेपी ने पश्चिम बंगाल सिविल सेवा और पुलिस सेवा के अधिकारियों का अपमान किया है. कई साजिशें चल रही हैं, मैं इसकी निंदा करती हूं. दिल्ली में रची गई साजिशों को मैं नाकाम कर दूंगी... याद रखिए, जख्मी शेर ज्यादा खतरनाक होता है... उन्होंने मुझसे सारी शक्तियां छीन ली हैं. मुझे कोई और नहीं, सिर्फ एक ताकत चाहिए... जनता की ताकत, मुझे कुछ और नहीं चाहिए. 

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कुछ दिन पहले चुनाव आयोग को लिखे अपने पत्र में भी ममता बनर्जी का कहना था, मैं पश्चिम बंगाल सरकार के हर अधिकारी और उनके परिवारों के साथ डटकर खड़ी हूं, जिन्हें केवल राज्य की ईमानदारी और प्रतिबद्धता के साथ सेवा करने के कारण निशाना बनाया जा रहा है. बंगाल कभी भी डराने-धमकाने वालों के आगे नहीं झुका है, और न ही झुकेगा.

पश्चिम बंगाल के साथ ही असम, केरलम, तमिलनाडु और केंद्र शासित प्रदेश पुड्डुचेरी में हो रहे विधानसभा के चुनाव के मद्देनजर अफसरों के तबादले हुए हैं, लेकिन पश्चिम बंगाल की तरह पूरे घर को बदल डालने जैसा लगातार प्रयास नहीं नजर आया है. लोकसभा चुनाव 2024 के दौरान भी चुनाव आयोग ने पश्चिम बंगाल के तत्कालीन डीजीपी राजीव कुमार को चुनाव काल तक के लिए हटा दिया था. हालांकि, चुनाव खत्म हो जाने के बाद में ममता बनर्जी ने राजीव कुमार को फिर से बहाल कर दिया था.

चुनाव आयोग की तरफ से जारी आदेशों के साथ मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार की एक खास टिप्पणी अभी काफी प्रासंगिक लगती है, 'आयोग पारदर्शी, भयमुक्त, हिंसा-मुक्त और प्रलोभन-मुक्त चुनाव कराने के लिए प्रतिबद्ध है' - और इसे नए तबादले के आदेशों की वजह के रूप में समझने की कोशिश की जा सकती है.

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अब अगर सवाल है कि नियम क्या कहता है? तो नियमों के मुताबिक, चुनाव की अवधि के दौरान पूरा प्रशासनिक अमला निर्वाचन आयोग के हवाले हो जाता है. तब तक, जब तक आचार संहिता लागू है. चुनावों की घोषणा से नतीजे आने तक. SIR के काम में लगे अधिकारी भी उस अवधि में जब प्रक्रिया चल रही होती है, चुनाव आयोग के डेप्युटेशन पर होते, और चुनाव प्रकिया की अवधि में बाकी अधिकारी भी. जन प्रतिनिधित्व अधिनियम, 1950 की धारा 13 CC में कहा गया है, 'मुख्य निर्वाचन अधिकारी, जिला निर्वाचन अधिकारी आदि को चुनाव आयोग की प्रतिनियुक्ति पर माना जाएगा.'

नियमों के मुताबिक, वे सभी अधिकारी या कर्मचारी, जो मतदाता सूची की तैयारी, पुनरीक्षण और संशोधन के साथ साथ चुनावों के संचालन से जुड़े काम में लगे हों, उन्हें उस अवधि के दौरान चुनाव आयोग की प्रतिनियुक्ति पर माना जाएगा. जब वे इन कार्यों में लगे हों, और इस अवधि में वे चुनाव आयोग के नियंत्रण, पर्यवेक्षण और अनुशासन के अधीन रहेंगे.

बंगाल में चुनावी हिंसा न होने की गारंटी है क्या?

चुनाव आयोग की पश्चिम बंगाल चुनाव में खास तौर से चप्पे चप्पे पर नजर है. वोटर लिस्ट को दुरुस्त करने के लिए SIR यानी विशेष गहन पुनरीक्षण, संभावित चुनावी हिंसा ने निबटने के एहतियाती उपाय के तौर पर सुरक्षा बलों की पर्याप्त तैनाती - और पूरे राज्य की पुलिस और प्रशासनिक मशीनरी में व्यापक फेरबदल. 

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पश्चिम बंगाल में चुनावों के पहले, और बाद में होने वाली हिंसा कभी न खत्म होने अनावश्यक बुराई बन गई है. पश्चिम बंगाल में केंद्रीय पर्यवेक्षकों को केंद्रीय सशस्त्र पुलिस फोर्स (CAPF) की तैनाती प्रक्रिया की निगरानी करने, और डेली रिपोर्ट देने वाले निर्देश के साथ ही चुनाव आयोग ने पहले से ही साफ कर दिया है कि CAPF की आवाजाही और तैनाती का काम सीआरपीएफ द्वारा कोऑर्डिनेट किया जाएगा. मतलब, स्थानीय प्रशासन और पुलिस की कोई भूमिका नहीं होगी. 

1. एनसीआरबी के 2018 की रिपोर्ट के मुताबिक, पूरे साल में देश भर में हुई 54 राजनीतिक हत्याओं में 12 मामले पश्चिम बंगाल से थे. पश्चिम बंगाल में 2018 के पंचायत चुनाव के दौरान 23 राजनीतिक हत्याओं की खबर आई थी. 

2. एनसीआरबी की एक रिपोर्ट के मुताबिक, 2010 से 2019 के बीच पश्चिम बंगाल में 161 राजनीतिक हत्याएं हुईं, और इसके कारण देश भर में पश्चिम बंगाल का नाम पहले स्थान पर दर्ज किया गया था. 

3. मई, 2021 में पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव नतीजे आने के बाद भी राज्य के कई इलाकों में हिंसक घटनाएं हुई थीं, जिसमें हत्या, बलात्कार और बलात्कार के प्रयास के कई मामले दर्ज किए गए थे.

NCRB यानी नेशनल क्राइम रिकॉर्ड्स ब्यूरो के आंकड़ों के मुताबिक, चुनाव के दौरान सबसे ज्यादा हिंसा पश्चिम बंगाल में ही होती है. पंचायत चुनाव से लेकर लोकसभा चुनाव तक. ऐसा लगता है जैसे पश्चिम बंगाल में चुनावी हिंसा राजनीतिक वर्चस्व के लिए शक्ति प्रदर्शन का रूप लेती जा रही है.

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पश्चिम बंगाल में चुनाव के दौरान केंद्रीय सुरक्षा बलों की भूमिका को लेकर सवाल उठाए जाते रहे हैं. और यही वह है कि चुनाव आयोग ने पश्चिम बंगाल प्रशासन से पहले ही साफ शब्दों में कह दिया है कि विधानसभा चुनाव के दौरान केंद्रीय बलों को बिठाकर रखा नहीं जा सकेगा.

अब तो महत्वपूर्ण जगहों पर कुल जमा गिनती के अफसर बचे होंगे, जिनका तबादला नहीं हुआ है. फिर भी पश्चिम बंगाल चुनाव में, मतदान से पहले या बाद में, अगर हिंसक घटनाएं होती हैं, तो चुनाव आयोग को भी सवालों का जवाब देना होगा. क्योंकि, बचे हुए अफसरों को तो काबिल होने के साथ साथ यह भी माना ही जा सकता है कि वे किसी भी तरह के राजनीतिक प्रभाव में नहीं आने वाले हैं. चुनाव आयोग से तबादले का आदेश न मिलना भी तो बचे हुए अफसरों के लिए ईमानदारी और निष्ठा के प्रति सर्टिफिकेट ही है.

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