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भारी शब्दों से 'मीम्स' तक का सफर, Gen-Z ने बदला आंदोलनों और नारों का अंदाज़

आंदोलनों में नारों का अंदाज़ बदल रहा है. भारी-भरकम शब्दों की जगह युवा पीढ़ी मीम्स, फ़िल्मी डायलॉग और गानों के जरिए बेबाक तंज कस रही है. मुंबई के प्रदर्शन में 'वोट चुराया मेरा, किसने ओ सनम...' और 'ज्ञानेश ब्रो, रिजाइन दो' जैसे चुटीले पोस्टरों ने नए 'मीम-क्रान्ति' दौर की झलक दिखाई.

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युवा पीढ़ी नारों में मीम्स, फ़िल्मी डायलॉग और गानों के जरिए तंज कस रही है. (Photo: X)
युवा पीढ़ी नारों में मीम्स, फ़िल्मी डायलॉग और गानों के जरिए तंज कस रही है. (Photo: X)

जब भी कहीं विरोध या प्रदर्शन होता है, तो नारे सिर्फ तेज आवाज में बोले गए शब्द नहीं होते, बल्कि किसी भी आंदोलन की जान और उसकी सबसे बड़ी ताकत होते हैं. नारे भीड़ को एक मकसद से जोड़ते हैं और बड़ी से बड़ी बात को दो-चार असरदार शब्दों में कह देते हैं. तीखे नारे सीधे सत्ता में बैठे लोगों तक जनता का आक्रोश पहुंचाते हैं, प्रदर्शन खत्म भी हो जाए, तब भी नारे याद रह जाते हैं और उस पूरे आंदोलन की पहचान बन जाते हैं. आज की युवा पीढ़ी (Gen-Z) ने तो नारों के अंदाज़ को पूरी तरह से बदल दिया है. अब नारे भारी-भरकम शब्दों तक सीमित नहीं रहे, बल्कि वे सोशल मीडिया, मीम्स, मुहावरों और गानों के ज़रिए नए रूप में सामने आ रहे हैं.

इसका उदाहरण मुंबई के शिवाजी पार्क में मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के खिलाफ हुए प्रदर्शन में देखने को मिला. प्रदर्शनकारियों ने सोशल मीडिया के मीम्स, बॉलीवुड अंदाज में कहे गए संवादों और तंज के जरिए अपनी बात रखी. युवा प्रदर्शनकारी रंग-बिरंगे पोस्टर और बैनर लेकर प्रोटेस्ट करने पहुंचे. इनमें से कई पर फिल्मी डायलॉगनुमा नारे, वायरल रील, लोकप्रिय गानों का इस्तेमाल किया गया था.

कुछ पोस्टरों पर गाने के अंदाज में लिखा था 'वोट चुराया मेरा, किसने ओ सनम… ज्ञानू ने'. 'वोट चुराया, चोरी-चोरी, चुपके-चुपके'. एक पोस्टर पर 'एक जीरा, दो अजवाइन, ज्ञानेश कुमार, दे दो रिजाइन' लिखा था. तो दूसरे पर 'ज्ञानेश ब्रो, इस्तीफा दो' लिखा था.

एक अन्य पोस्टर में मराठी में तंज कसा गया था 'ज्ञानू, तुझा डेमोक्रेसी वार भरोसा नाय का' यानी 'ज्ञानू, तुम्हें डेमोक्रेसी पर भरोसा नहीं है क्या?' प्रदर्शन कर रहे युवाओं ने जो पोस्टर थाम रखे थे, उनमें फिल्मी डायलॉग्स को भी चुटीले अंदाज में कहा गया था. एक पोस्टर पर लिखा था 'तुमसे न हो पाएगा'. 'ज्ञानू तो गयो'.

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प्रदर्शनकारियों ने इंटरनेट की भाषा का भी जमकर इस्तेमाल किया. बैनरों पर लिखा था- '13 करोड़ वोटर डिलीट... एरर 404, डेमोक्रेसी नॉट फाउंड', '#ज्ञानू मस्ट गो'. 'ज्ञानू जी, इट्स टाइम टू लॉग आउट'.

इतना ही नहीं, Gen-Z इस प्रोटेस्ट को एंजॉय करते भी दिखे. एक पोस्टर पर लिखा था 'गर्मी बहुत है, वाटर कैनन चालू करो.' वहीं, सीधे निशाना साधते हुए एक बैनर में CEC का नया अर्थ गढ़ा गया 'चीफ इरेज़र कमिश्नर'. मुंबई और यूपी के लोकप्रिय नाश्ते का भी प्रदर्शन में मजाकिया अंदाज में इस्तेमाल हुआ. एक पोस्टर पर लिखा था 'एक कचौरी, दो चाय, ज्ञानेश कुमार बाय-बाय.' 

इस तरह के नारों का इस्तेमाल सिर्फ मुंबई के शिवाजी पार्क में ही नहीं हुआ, बल्कि दिल्ली में लेडी श्रीराम कॉलेज फॉर वुमन की छात्राओं ने भी हाल ही में प्रोटेस्ट किया, उनके हाथों में जो तख्तियां थीं, उन पर लिखे स्लोगंस ने भी ध्यान खींचा. इसमें 'एक सुट्टा दो चाय मर्द जात हाय-हाय', 'नारी अपने आप की, नहीं किसी के बाप की', 'एक कचौरी दो समोसा, इन मर्दों का क्या भरोसा', 'शर्म नहीं है मर्दों में, औरत क्यों है पर्दों में', 'मेरे सिर में दर्द है, इसका कारण मर्द है' सरीखे नारे लिखे हुए थे. 

दरअसल, एक वायरल 'मीम' या एक चुलबुला 'वन-लाइनर' किसी लंबे भाषण से ज़्यादा तेज़ी से असर करता है. पहले एक नारा बहुत प्रचिलित था 'जो रोज़ी-रोटी दे न सके, वो सरकार निकम्मी है'. लेकिन अब इसका स्वरूप बदल गया है. आज युवा 'हमसे भूल हो गई, पर अब और नहीं' जैसे डायरेक्ट मीम का इस्तेमाल करते हैं.

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नारों की ताकत जानने के लिए अतीत में झांकें तो महात्मा गांधी के 'अंग्रेजों भारत छोड़ो', 'करो या मरो', नेताजी सुभाष चंद्र बोस के 'तुम मुझे खून दो, मैं तुम्हें आजादी दूंगा', भगत सिंह के 'इंकलाब जिंदाबाद' नारे ने युवाओं में देशप्रेम का ज़बरदस्त जोश भर दिया था. वहीं, लाल बहादुर शास्त्री ने 'जय जवान, जय किसान' नारा दिया था. देश के रक्षकों और अन्नदाताओं का हौसला बढ़ाने वाला यह नारा आज भी सबके दिल के करीब है. बाल गंगाधर तिलक के नारे 'स्वराज मेरा जन्मसिद्ध अधिकार है और मैं इसे लेकर रहूंगा' ने लोगों को अहसास कराया कि आज़ादी उनका हक है. आपातकाल के दौरान 'सिंहासन खाली करो कि जनता आती है' नारे ने सरकार को हिलाकर रख दिया था.

मसलन, एक दौर था जब भारी-भरकम शब्दों, जोश से भरी शायरी और गंभीर नारों का माहौल होता था, लेकिन आज की पीढ़ी का अंदाज़ अलग है. अब नारों में सिर्फ़ गुस्सा या निराशा नहीं, बल्कि एक खास किस्म की चुलबुलाहट, व्यंग्य और बेबाकी साफ झलकती है. आज का युवा बात तो गंभीर मुद्दे की करता है, लेकिन उसे पेश करने का तरीका बिल्कुल बदल गया है. पोस्टर पर अब कोई उबाऊ लाइन नहीं होती, बल्कि ऐसा मीम या फ़िल्मी संवाद होता है जो सीधा दिल पर लगे और चेहरे पर हल्की सी मुस्कान भी छोड़ जाए. नारों की शैली भले ही 'पंची और वायरल' हो गई हो, लेकिन समाज में इनकी धमक और प्रभाव आज भी पहले जितना ही निर्णायक है. 

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