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प्रियंका गांधी की संसद में एंट्री से कांग्रेस और राहुल को कितना फायदा होगा?

प्रियंका गांधी को केरल के वायनाड के रास्ते लोकसभा में पहुंचने की हरी झंडी कांग्रेस ने दे दी है. कांग्रेस कार्यकर्ता बहुत पहले से ही यह डिमांड करते रहे हैं. पिछले दिनों राहुल गांधी ने भी कहा था कि बनारस से अगर प्रियंका गांधी चुनाव लड़ी होतीं तो पीएम मोदी चुनाव हार गए होते. सवाल यह है कि अगर इतना विश्वास प्रियंका पर है तो उन्हें इतना देर से क्यों मुख्य धारा में लाया जा रहा है. फिलहाल देर आए दुरुस्त आए जैसा होना चाहिए.

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राहुल गांधी और प्रियंका गांधी की जोड़ी लोकसभा में कितना कमाल करेगी?
राहुल गांधी और प्रियंका गांधी की जोड़ी लोकसभा में कितना कमाल करेगी?

राहुल गांधी और कांग्रेस के लिए प्रियंका गांधी का लोकसभा पहुंचना पपीहे को स्वाति नक्षत्र की बूंद साबित हो सकता है. बशर्ते कि उन्हें खुलकर खेलने का मौक़ा मिले और राहुल गांधी का सबऑर्डिनेट बनकर न रहने दिया जाये. क्योंकि जिस तरह राहुल गांधी की वायनाड सीट से उनकी लांचिंग हो रही है उससे तो ऐसे ही लग रहा है कि प्रियंका को सीमित दायरे में रहना होगा. क्योंकि वायनाड कांग्रेस पार्टी के लिए ऐसी सीट है जहां से पार्टी अपने किसी भी कैंडिडेट को चुनाव जिता सकती है. उत्तर भारत में रायबरेली से अगर प्रियंका सांसद बनतीं तो निश्चित रूप से कांग्रेस और उसके कार्यकर्ताओं में एक उम्मीद की किरण बन जातीं. हालांकि प्रियंका का लोकसभा चुनाव लड़ना ही काफी है, क्योंकि इससे कम से कम इतना तो तय हो जाएगा कि वो सक्रिय राजनीति करेंगी. राजनीतिक मामलों में उनका हस्तक्षेप तो पहले भी था. कांग्रेस के जटिल मुद्दों को सुलझाने में उनकी प्रमुख भूमिका पहले से ही रही है. 

ट्रंप कार्ड चलने का सही वक्त आ गया है

कांग्रेस के पास प्रियंका नाम का ट्रंप कार्ड बहुत पहले से रहा है. हो सकता है कि कांग्रेस की रणनीति रही हो कि उसे सही समय पर इस्तेमाल किया जाएगा. जिस तरह कांग्रेस को यूपी में सफलता मिली है वह आश्चर्यजनक है. उत्तर प्रदेश में राहुल गांधी का 4 लाख वोटों से जीतना और अमेठी से केंद्रीय मंत्री स्मृति इरानी का डेढ़ लाख से अधिक वोट से हारना सिर्फ अखिलेश यादव या समाजवादी पार्टी के समर्थन से संभव नहीं था.  

यूपी विधानसभा चुनाव के दौरान प्रियंका गांधी ने नारा दिया था, लड़की हूं... लड़ सकती हूं. प्रियंका गांधी खूब लड़ीं थीं और कांग्रेस के पक्ष में बज भी क्रिएट हुआ था. पर उसे वोट में नहीं तब्दील कर सकीं थीं. पर माहौल जब ठीक हुआ तो वहीं प्रियंका 2 साल बाद यूपी की अमेठी और रायबरेली सीट पर इस जबरदस्त जीत का आधार बनीं. यही नहीं कांग्रेस को उत्तर प्रदेश में 17 सीटें ऐसी मिलीं थीं जहां से समाजवादी पार्टी भी कुछ एक सीटों को छोड़ दें तो बिल्कुल भी आश्वस्त नहीं थी कि वहां से चुनाव जीत सकेगी. इन सीटों में कई ऐसी थीं जहां कांग्रेस को कैंडिडेट तक नहीं मिल रहे थे.पर प्रियंका के नेतृत्व में कांग्रेस ने इतिहास रच दिया.इसके पहले भी प्रियंका ने अपना कमाल हिमाचल और अन्य राज्यों में दिखाया था.

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प्रियंका में इंदिरा गांधी वाली कला, मुद्दों को कब और कैसे उठाना है जानती हैं

प्रियंका गांधी में पार्टी वर्कर्स और कांग्रेस समर्थकों को पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी का रूप दिखता है. उन्होंने कई मौकों पर इसे साबित भी किया है. चुनाव कैंपेन के तरीके में वो जिस तरह आम लोगों से कनेक्ट हो जाया करतीं हैं वो उन्होंने अपनी दादी से सीखा है. रायबरेली चुनाव प्रचार के दौरान उन्होंने नेहरू को भी याद किया, और इंदिरा गांधी की हार का जिक्र भी किया. वो रायबरेली के लोगों को मैसेज देना चाहती थीं और बखूबी दिया भी. वो कहती हैं कि जैसे इंदिरा गांधी को आपने तब सबक सिखाया था, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को भी सिखाइये. लोगों ने उनकी बात मान भी लीं. प्रियंका गांधी का भाषण अमेठी तक पहुंचा. वहां भी उन्हें जनसमर्थ मिला.

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के मंगलसूत्र वाले बयान को उन्होंने अपने परिवार से जोड़कर जनता से इमोशनली जुड़ने का प्रयास किया. प्रियंका गांधी ने चुनाव प्रचार के दौरान जनता से पूछा कि 55 साल में कांग्रेस ने किसी का सोनना या मंगलसूत्र छीना क्या? 
और ऐन उसी वक्त याद भी दिलाया, 'मेरी मां का मंगलसूत्र इस देश के लिए कुर्बान हुआ.' वो जनता से फिर मुखातिब होती हैं और कहती हैं कि 'जब मेरी बहनों को नोटबंदी के चलते अपने मंगलसूत्र गिरवी रखने पड़े, तब प्रधानमंत्री जी कहां थे. प्रधानमंत्री जी तब कहां हैं जब कर्ज तले दबे किसान की पत्नी को अपना मंगलसूत्र बेचना पड़ता है. प्रधानमंत्री जी ने मणिपुर की उस महिला के बारे में क्यों कुछ नहीं बोला जिसे निर्वस्त्र करके घुमाया गया. महंगाई ने आज कितनों के मंगलसूत्र गिरवी रखवा दिए हैं.' इस तरह वो जनता को भावुक कर देती हैं. 

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लोकसभा में कांग्रेस और राहुल गांधी के लिए ताकत बन सकती हैं

ये सभी जानते हैं कि लोकसभा में या लोकसभा के बाहर अब कद्दावर नेताओं की कमी हो चुकी है. कांग्रेस के अधिकतर क्षत्रप पार्टी छोड़ चुके हैं या बुजुर्ग हो चुके हैं. इस बीच प्रियंका का लोकसभा पहुंचना कांग्रेस के लिए नई ऊर्जी मिलने के समान होगा. एनडीए सरकार को घेरने में अब राहुल गांधी अकेले नहीं पड़ेंगे. कांग्रेस सांसदों का भी प्रियंका के आने से उत्साह डबल हो जाएगा. अगर राहुल गांधी प्रतिपक्ष के नेता का पद स्वीकार करते हैं तो उनपर जिम्मेदारियों का भार बढ़ जाएगा.दूसरी बात संसद में बराबरी का मुकाबला होगा. जिस तरह लोग संसद की  कार्यवाही के दौरान पीएम मोदी और गृहमंत्री अमित शाह को ध्यान से सुनते थे अब कांग्रेस से राहुल गांदी और प्रियंका की जोड़ी का भी लोगों का इंतजार रहा करेगा. इसके साथ ही कई मुद्दों पर वो राहुल गांधी से बेहतर बोल सकती हैं, इससे कांग्रेस की आवाज आम जनता तक पहुंचने में मदद मिलेगी.

पर केरल में बांधना ठीक नहीं होगा कांग्रेस के लिए 

पर जैसा अब तक राहुल गांधी और प्रियंका गांधी की राजनीतिक यात्रा का इतिहास रहा है उससे यही लगता है कि प्रियंका को केरल से बाहर कम ही तवज्जो मिले. अगर राहुल गांधी की छवि पर प्रियंका कहीं भारी न पड़ जाएं इस सोच से कांग्रेस बाहर नहीं निकलेगी तो प्रियंका को भी काम करने में मजा नहीं आएगा. आखिर कोई कब तक अपने भाई का सहारा बनकर काम करता रहेगा. हर शख्स की अपनी इच्छाएं और महत्वकांक्षाएं होती हैं. विशेषकर उन लोगों में जिनमें प्रतिभा है पर उसे उभरने का मौका नहीं मिल रहा है उनमें इस किस्म की महत्वाकांक्षा और बढ़ जाती है. जाहिर है वो महत्वाकांक्षाएं प्रियंका में भी हैं. केरल में अभी विधानसभा चुनाव होने हैं. केरल में जैसा माहौल है उसके हिसाब से यही लगता है कि अगर थोड़ी भी  कांग्रेस मेहनत करेगी तो वहां सरकार बन जाएगी. जाहिर है कि प्रियंका को अपनी पहली सफलता मिलनी तय है. 

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