संसद का मॉनसून सत्र शुरू होते ही NEET पेपर लीक मुद्दे पर विपक्ष आगबबूला है. शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे से कुछ भी कम के लिए वह तैयार नहीं है. संसद से लेकर सड़क तक जारी इस सियासी घमासान और गतिरोध को तोड़ने के लिए मोदी सरकार ने एक बड़ा दांव चला है. सरकार की योजना सत्र की शुरुआत 'वंदे मातरम्' से जुड़े एक ऐतिहासिक विधेयक से करने की है.
सिनेमाघरों में राष्ट्रगान पर खड़े होने या न होने की पुरानी बहसों को पीछे छोड़ते हुए अब केंद्र सरकार 'राष्ट्रीय सम्मान के अपमान की रोकथाम (संशोधन) विधेयक, 2026' (Prevention of Insults to National Honour (Amendment) Bill, 2026) लेकर आ रही है. शुक्रवार को इसे राज्यसभा में पेश किया जाएगा. इस बिल की टाइमिंग और इसकी जरूरत पर सवाल उठाए जा रहे हैं.
सरकार को उम्मीद है कि राष्ट्रभक्ति और राष्ट्रीय प्रतीकों से जुड़े इस मुद्दे पर तमाम राजनीतिक दल एक सुर में नजर आएंगे. हालांकि, संसद के मौजूदा मिजाज को देखते हुए सहमति की गुंजाइश बेहद कम नजर आ रही है.
वंदे मातरम् भले हमारा राष्ट्रीय गीत हो, लेकिन इसे लेकर एक राजनीतिक बहस 1937 से चली आ रही है. जब कांग्रेस द्वारा वंदे मातरम् के पहले दो अंतरों को ही आधिकारिक आयोजनों के लिए स्वीकार किया गया. बीजेपी इस फैसले पर अक्सर निशाना साधती रही है. और पिछले दिनों केंद्र सरकार ने एक आदेश के जरिए वंदे मातरम् के सभी पैरा को अधिकृत बनाने की मंजूरी दी है. विपक्ष यह भी मानता है कि इस बिल के जरिए पुराने राजनीतिक विवादों को फिर से उकेरा जा रहा है.
जनसभाओं से लेकर 'स्पेस' तक: मोदी और 'वंदे मातरम्'
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की राजनीति में 'वंदे मातरम्' का हमेशा विशेष स्थान रहा है. चुनावी रैलियों में जब पीएम मोदी मंच से हुंकार भरते हैं- वे पुकारते हैं ’वंदे...’ और सामने खड़ी जनता का गूंजता जवाब आता है- ’मातरम्!’ इस घोष की पुनरावृत्ति धीरे-धीरे इतनी तीव्र हो जाती है कि पूरी जनसभा एक अलग ही ऊर्जा से भर उठती है.
यह सिर्फ भाषण की शुरुआत या अंत भर नहीं है, बल्कि बीजेपी की सांस्कृतिक और राजनीतिक विचारधारा का अभिन्न हिस्सा बन चुका है. चाहे बंगाल के चुनावी एजेंडे को ही ले लें. बैंकिमचंद्र चट्टोपाध्याय द्वारा रचित इस गीत को बीजेपी ने बंगाल विधानसभा चुनाव के दौरान अपने राष्ट्रवाद के एजेंडे के केंद्र में रखा.
इसके अलावा हाल ही में भारत के पहले प्राइवेट रॉकेट के साथ स्पेस भेजी गई पर्ची पर खुद प्रधानमंत्री मोदी ने अपने हाथों से 'वंदे मातरम्' लिखकर देश की तकनीकी प्रगति को सांस्कृतिक गौरव से जोड़ा.
1971 के मूल कानून में नया विधेयक क्या बदलाव लेकर आ रहा है:
-मौजूदा कानून (1971) में दायरा राष्ट्रध्वज, राष्ट्रगान (जन गण मन) और संविधान तक था. जिसमें राष्ट्रगान रोकने या बाधा डालने पर 3 साल तक की जेल या जुर्माने का प्रावधान था.
-प्रस्तावित संशोधन (2026) में राष्ट्रगीत (वंदे मातरम्) को भी समान कानूनी दर्जा दिया जा रहा है. अब वंदे मातरम् के गाने में बाधा डालने पर भी 3 साल की सजा या जुर्माना भुगतना पड़ेगा.
24 जनवरी 1950 को संविधान सभा के अध्यक्ष डॉ. राजेंद्र प्रसाद ने कहा था कि 'वंदे मातरम्' को 'जन गण मन' के समान ही मान और दर्जा दिया जाएगा. सरकार का तर्क है कि यह बिल उसी ऐतिहासिक संकल्प को कानूनी अमलीजामा पहनाता है.
मोदी सरकार के राजनीतिक लक्ष्य: एक तीर से कई निशाने
इस विधेयक के जरिए सत्ता पक्ष एक साथ कई राजनीतिक समीकरण साधने की कोशिश में है. सबसे पहले NEET पेपर लीक पर आक्रामक विपक्ष को राष्ट्रवाद के मुद्दे पर असहज करना. अगर विपक्ष बिल का विरोध करता है, तो बीजेपी उसे ’राष्ट्रगीत विरोधी’ ठहराने का नैरेटिव बना सकती है.
दूसरा, राष्ट्रवाद का एजेंडा सेट करना. संसद में मॉनसून सत्र की बहस का रुख सरकार अपने अनुकूल पिच पर मोड़ना चाहती है. और इसके लिए मौका भी है. सरकार वंदे मातरम् की रचना की 150वीं वर्षगांठ मना रही है. ऐसे में इस बिल को लाकर बीजेपी अपने कोर-वोटर को सांस्कृतिक गौरव का मैसेज देना चाहती है.
विपक्ष के तर्क: 'मुद्दों से ध्यान भटकाने की साजिश'
विपक्षी खेमा इस बिल को लेकर सरकार पर लगातार हमलावर है. कांग्रेस और अन्य विपक्षी दलों का आरोप है कि NEET घोटाले, बेरोजगारी और महंगाई जैसे गंभीर जनहित के मुद्दों से जनता का ध्यान हटाने के लिए 'वंदे मातरम्' को राजनीतिक हथियार बनाया जा रहा है.
यदि सरकार वाकई इस विधेयक को लेकर सीरियस है तो वह इसका मसौदा विपक्षी दलों को उपलब्ध कराती, लेकिन ऐसा नहीं हुआ. विपक्षी नेताओं का कहना है कि राष्ट्रभक्ति दिल से आती है, कानून या सजा के डर से जबरन नहीं थोपी जा सकती.