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अमेरिका की आजादी की कहानी, हिंदुस्तानी नजर से

ढाई सौ साल पहले अमेरिका में लड़ी गई आजादी की जंग हिंदुस्तानी स्वतंत्रता संग्राम जैसी ही थी, बस वहां एक कॉलोनाइजर दूसरे से आजाद हुआ था.

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अमेरिकी राज्य साउथ डकोटा के माऊंट रशमोर पर उकेरी गई चार राष्ट्रपति जॉर्ज वाशिंगटन, थामस जैफरसन, थियोडोर रूजवेल्ट और अब्राहम लिंकन की आकृति राष्ट्रीय स्मारक तो है ही, यह अमेरिकी आजादी का भी प्रतीक है. (Photo- Pixabay)
अमेरिकी राज्य साउथ डकोटा के माऊंट रशमोर पर उकेरी गई चार राष्ट्रपति जॉर्ज वाशिंगटन, थामस जैफरसन, थियोडोर रूजवेल्ट और अब्राहम लिंकन की आकृति राष्ट्रीय स्मारक तो है ही, यह अमेरिकी आजादी का भी प्रतीक है. (Photo- Pixabay)

4 जुलाई, दुनिया का सबसे ताकतवर देश अमेरिका अपनी आजादी की 250 वर्षगांठ मना रहा है. साल 1776 में इसी दिन अमेरिका ने ब्रिटिश हुकूमत की गुलामी की जंजीरों को तोड़कर खुद को एक आजाद देश घोषित किया था. जब हम अमेरिका के इस ढाई सौ साल के सफर और उसकी आजादी की लड़ाई को देखते हैं, तो इसकी कहानी हुबहू हमारे हिंदुस्तान के स्वतंत्रता संग्राम जैसी नजर आती है. वही टैक्स का विरोध, वही विदेशी सामानों का बहिष्कार, और वही 'अंग्रेजों देश छोड़ो' वाले तेवर.

लेकिन इस पूरी कहानी में एक बहुत बड़ा और दिलचस्प ट्विस्ट है, जो इसे भारत की लड़ाई से बिल्कुल अलग बनाता है. भारत में जहां जमीन के असली बेटों यानी हम हिंदुस्तानियों ने विदेशी अंग्रेजों को खदेड़ा था, वहीं अमेरिका में ऐसा नहीं था. अमेरिका की जंग असल में 'एक कॉलोनाइजर की दूसरे कॉलोनाइजर से आजादी' की लड़ाई थी. यानी जो लोग ब्रिटेन से आकर वहां खुद बसे थे और जिन्होंने वहां के मूल निवासियों (रेड इंडियंस) की जमीन पर कब्जा किया था, वही कॉलोनाइजर बाद में अपनी ही मातृभूमि यानी ब्रिटेन के राजा के खिलाफ खड़े हो गए. आइए, इस अनोखे और दिलचस्प इतिहास को एक भारतीय की नजर से समझते हैं.

शुरुआती दौर: जब अपनों ने ही अपनों के खिलाफ मोर्चा खोला

कहानी की शुरुआत भारत जैसी ही लगती है, लेकिन इसके किरदार अलग हैं. जिस तरह ईस्ट इंडिया कंपनी व्यापार करने के बहाने भारत आई और यहां के राजा-महाराजाओं को हराकर पूरे देश पर कब्जा कर लिया, ठीक वैसे ही ब्रिटिश हुकूमत ने उत्तरी अमेरिका के महाद्वीप पर अपने पैर पसारे थे. ब्रिटेन ने वहां के पूर्वी किनारे पर एक-एक करके 13 कॉलोनियां बसाई थीं.

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लेकिन फर्क यह था कि इन कॉलोनियों में रहने वाले लोग भारत की तरह वहां के मूल निवासी नहीं थे. वे खुद ब्रिटेन, आयरलैंड और यूरोप के दूसरे देशों से आए कॉलोनाइजर थे, जिन्होंने वहां के लोकल लोगों को पीछे धकेलकर शहरों पर कब्जा किया था. समय के साथ, इन ब्रिटिश कॉलोनाइजरों की पीढ़ियां वहीं पली-बढ़ीं और वे खुद को पक्के अमेरिकी मानने लगे. अब वे ब्रिटेन के राजा जॉर्ज तृतीय (King George III) को टैक्स तो दे रहे थे, लेकिन खुद को लंदन में बैठे अंग्रेजों से अलग और स्वतंत्र महसूस करने लगे थे. यहीं से 'अपनों की अपनों से जंग' की बुनियाद पड़ी.

US thirteen colonies
अमेरिका की इन्हीं 13 कॉलोनियों ने ब्रिटिश हुकूमत को मानने से इनकार कर दिया, और आखिरकार 1776 में आजादी का ऐलान कर दिया. (फोटो - विकिपीडिया)

'नो टैक्सेशन विदाउट रिप्रेजेंटेशन', जैसे भारत के स्वराज की मांग

1760 और 1770 के दशकों में ब्रिटेन की सरकार का खजाना खाली होने लगा, तो उसने अमेरिका में रह रहे इन ब्रिटिश मूल के लोगों पर भारी टैक्स ठोक दिए. इनमें 'स्टैम्प एक्ट' और 'टी एक्ट' (चाय पर टैक्स) जैसे कड़े कानून शामिल थे. मजेदार बात यह थी कि इन कानूनों को बनाने वाली ब्रिटेन की संसद में इन अमेरिकी बस्तियों का एक भी नेता या प्रतिनिधि (Representative) शामिल नहीं था.

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यह बात अमेरिका में रह रहे कॉलोनाइजरों को चुभ गई. उन्होंने ठीक वैसा ही स्टैंड लिया जैसा भारत में बाल गंगाधर तिलक ने 'स्वराज' के लिए लिया था. अमेरिकी नेताओं ने नारा दिया- 'नो टैक्सेशन विदाउट रिप्रेजेंटेशन' (No Taxation Without Representation), यानी 'जब तक ब्रिटेन की संसद में हमारे लोग नहीं बैठेंगे, तब तक हम कोई टैक्स नहीं देंगे.' उन्होंने ब्रिटिश सामान का पूरी तरह से बहिष्कार (Boycott) करना शुरू कर दिया. अंग्रेजी कपड़े, चाय और दूसरी चीजों को छोड़ दिया गया. यह बिल्कुल वैसा ही था जैसे भारत में महात्मा गांधी के नेतृत्व में 'स्वदेशी आंदोलन' चलाया गया था, जहां विदेशी कपड़ों की होली जलाई गई थी.

मैसाचुसैट्स का गदर और बोस्टन टी पार्टी

जैसे हमारे देश में दांडी मार्च और नमक कानून तोड़ने का आंदोलन हुआ था, वैसे ही अमेरिकी इतिहास में 'बोस्टन टी पार्टी' (Boston Tea Party) की घटना हुई. दिसंबर 1773 में, जब ब्रिटिश सरकार की चाय से लदे तीन जहाज बोस्टन के बंदरगाह पर आए, तो अमेरिकी क्रांतिकारियों का गुस्सा फूट पड़ा. 'संस ऑफ लिबर्टी' नाम के संगठन के लोग, वहां के मूल निवासियों (रेड इंडियंस) का भेष बनाकर रात के अंधेरे में जहाजों पर चढ़ गए और चाय के सारे बक्सों को समुद्र में फेंक दिया.

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इस घटना से भड़ककर ब्रिटिश सरकार ने बोस्टन के बंदरगाह को सील कर दिया और मैसाचुसेट्स (Massachusetts) राज्य में मार्शल लॉ लगा दिया. इसके बाद मैसाचुसेट्स में एक तरह का गदर मच गया. लोकल कॉलोनाइजरों ने अपनी खुद की गुपचुप सेनाएं और कमेटियां बना लीं. अप्रैल 1775 में लेक्सिंगटन और कॉनकॉर्ड नामक जगहों पर ब्रिटिश फौज और इन अमेरिकी विद्रोहियों के बीच पहली सीधी गोलीबारी हो गई. अब यह लड़ाई सिर्फ टैक्स की नहीं, बल्कि आर-पार की जंग बन चुकी थी.

कांग्रेस का गठन, और 'अंग्रेजों, अमेरिका छोड़ो' मिशन

जब जंग छिड़ गई, तो सभी 13 कॉलोनियों के बड़े नेता एक साथ आए, बिल्कुल वैसे ही जैसे भारत में आजादी की लड़ाई के लिए 'इंडियन नेशनल कांग्रेस' का गठन हुआ था. अमेरिका में इस मंच को 'कॉन्टिनेंटल कांग्रेस' (Continental Congress) नाम दिया गया. इसमें जॉर्ज वॉशिंगटन, जॉन एडम्स और बेंजामिन फ्रैंकलिन जैसे बड़े लीडर शामिल हुए.

शुरुआत में ये नेता भी भारत के उदारवादियों की तरह थे, जो पूरी तरह नाता नहीं तोड़ना चाहते थे. लेकिन जनवरी 1776 में थॉमस पेन (Thomas Paine) नामक एक लेखक ने एक छोटा सा पैम्फलेट यानी किताब लिखी, जिसका नाम था 'कॉमन सेंस'. इस किताब ने पूरी बाजी पलट दी. थॉमस पेन ने बहुत ही आसान भाषा में लिखा कि 'यह कितनी बेवकूफी की बात है कि ब्रिटेन जैसा एक छोटा सा टापू इतने बड़े अमेरिकी महाद्वीप पर राज कर रहा है.' इस किताब ने अमेरिकी जनता के दिल में 'अंग्रेजों, अमेरिका छोड़ो' की भावना फूंक दी.

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4 जुलाई 1776: आजादी का घोषणापत्र और अंदरूनी समझौता

जनता के भारी दबाव के बीच, कॉन्टिनेंटल कांग्रेस ने आखिरकार पूरी आजादी (पूर्ण स्वराज्य) का ऐलान करने का मन बना लिया. थॉमस जेफरसन को आजादी का पत्र यानी 'डिक्लेरेशन ऑफ इंडिपेंडेंस' (Declaration of Independence) लिखने का काम सौंपा गया. जेफरसन ने एक बेहद खूबसूरत ड्राफ्ट तैयार किया, जिसमें लिखा था कि 'सभी इंसान बराबर पैदा हुए हैं और सबको आजादी का हक है.'

लेकिन यहां पर एक और विरोधाभास सामने आया. थॉमस जेफरसन ने शुरुआत में इस ड्राफ्ट में राजा जॉर्ज तृतीय पर यह आरोप भी लगाया था कि उन्होंने गुलामों के व्यापार (Slave Trade) को बढ़ावा दिया. लेकिन अमेरिका के कुछ दक्षिणी राज्यों के कॉलोनाइजर खुद बड़े-बड़े जमींदार थे और अफ्रीकी गुलामों से खेती करवाते थे. उन्होंने इस बात का विरोध किया. नतीजा यह हुआ कि आजादी के घोषणापत्र से उस हिस्से को हटा दिया गया, ताकि सभी कॉलोनाइजर एकजुट रहकर ब्रिटेन के खिलाफ दस्तखत कर सकें. आखिरकार, 4 जुलाई 1776 को इस फाइनल ड्राफ्ट को मंजूरी मिल गई और यूनाइटेड स्टेट्स ऑफ अमेरिका (USA) का जन्म हुआ.

ये है यूएस कांग्रेस का 4 जुलाई 1776 को जारी किया गया इंडिपेंडेंस डिक्लेरेशन ड्राफ्ट :

'फ्रांसीसी मदद' और नेताजी जैसी रणनीति

हालांकि, अमेरिकी आजादी की घोषणा को ब्रिटेन ने ज्यादा तवज्जो नहीं दी. ब्रिटेन की सेना उस वक्त दुनिया की सबसे ताकतवर और प्रोफेशनल सेना थी. उनके सामने इन अमेरिकी बागियों का टिक पाना मुश्किल था. ऐसे में अमेरिका को किसी बाहरी महाशक्ति की मदद चाहिए थी. यहां काम आई बेंजामिन फ्रैंकलिन की कूटनीति. वे फ्रांस गए और वहां की सरकार से मदद मांगी. फ्रांस और ब्रिटेन की पुरानी दुश्मनी थी.

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जब 1777 में अमेरिका ने साराटोगा की लड़ाई में ब्रिटिश फौज को हरा दिया, तो फ्रांस को भरोसा हो गया कि ये लोग लड़ सकते हैं. इसके बाद साल 1778 में अमेरिका और फ्रांस के बीच एक ऑफिशियल गठबंधन (Treaty of Alliance) हुआ. फ्रांस ने अमेरिका को बड़े पैमाने पर हथियार, बारूद, पैसे और अपनी नौसेना की ताकत दी. यह रणनीति काफी हद तक वैसी ही थी, जैसी भारत की आजादी के लिए नेताजी सुभाष चंद्र बोस ने जर्मनी और जापान से मदद लेकर आजाद हिंद फौज खड़ी की थी. फ्रांस, स्पेन और नीदरलैंड की मदद ने ब्रिटिश हुकूमत के पैर उखाड़ दिए.

(यहां ये याद दिलाना जरूरी हो जाता है कि पिछले दिनों राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने ईरान युद्ध में फ्रांसीसी मदद न मिलने पर उलाहना दिया कि यदि दूसरे विश्वयुद्ध में अमेरिका फ्रांस की मदद नहीं करता तो आज फ्रांसीसी लोग जर्मन बोल रहे होते. लेकिन, सच तो यह है कि ढाई सौ साल पहले फ्रांस अमेरिकी क्रांतिकारियों की मदद नहीं करता तो अमेरिका का जन्म ही नहीं होता.)

ब्रिटिश हुकूमत की हार और 'पूर्ण स्वराज'

जॉर्ज वॉशिंगटन की बेहतरीन लीडरशिप और फ्रांसीसी सेना की मदद से अमेरिकी फौज ने ब्रिटिश सेना को घुटनों पर ला दिया. आखिरकार, 1781 में यॉर्कटाउन की ऐतिहासिक लड़ाई में ब्रिटिश जनरल लॉर्ड कॉर्नवॉलिस को अमेरिकी और फ्रांसीसी सेना के सामने सरेंडर करना पड़ा. दिलचस्प बात यह है कि यही कॉर्नवॉलिस अमेरिका में हारने के बाद भारत का गवर्नर-जनरल बनकर आया था.

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यॉर्कटाउन की इस करारी हार के बाद ब्रिटिश पार्लियामेंट समझ गई कि अब अमेरिका को संभालना उनके बस का नहीं है. साल 1783 में पेरिस की संधि (Treaty of Paris) हुई और ब्रिटेन ने आधिकारिक तौर पर अमेरिका को एक आजाद देश मान लिया. इस तरह अमेरिका के कॉलोनाइजरों ने अपनी ही मातृभूमि से अपना 'पूर्ण स्वराज' छीन लिया.

एक जैसी जंग, मगर अलग किरदार

आज जब अमेरिका अपनी आजादी के 250 साल पूरे कर रहा है, तो उसकी कहानी हमें बताती है कि भारत और अमेरिका दोनों की जंग का तरीका एक जैसा था. दोनों ने ब्रिटिश हुकूमत के अहंकार और उनके कड़े कानूनों के खिलाफ हथियार उठाए और कूटनीति का इस्तेमाल किया.

लेकिन सबसे बड़ा फर्क यह है कि भारत की लड़ाई एक दबे-कुचले, शोषित समाज की अपने ही देश की मिट्टी को आजाद कराने की लड़ाई थी. वहीं, अमेरिका की लड़ाई उस जमीन पर कब्जा कर चुके कॉलोनाइजरों की अपने ही राजा के खिलाफ 'बिजनेस और हक' की लड़ाई थी, जिसमें वे कामयाब रहे.

हैप्पी 4th ऑफ जुलाई, अमेरिका!

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