युद्ध में कौन हार रहा है, यह जानने का बहुत सरल तरीका है- देखो कौन शांति की गुहार लगा रहा है. युद्ध में हमेशा कुछ न कुछ मरता है. सबसे पहले सच्चाई मरती है. उसके ठीक पीछे इज्जत लंगड़ाती हुई आती है, सीने पर नया मेडल लगाए हुए.
मई 2025 में भारत ने पाकिस्तान की जमीन पर आतंकवादी ठिकानों पर सटीक हमले किए. बाकायदा ऐलान करके. और कुछ घंटों में खत्म. सब कुछ भारत की शर्तों पर हुआ. पाकिस्तान ने जवाबी कार्रवाई की. यह हैरानी की बात थी क्योंकि भारत ने साफ कह दिया था कि उसे युद्ध नहीं लड़ना है. फिर भी पाकिस्तान ने गोलीबारी शुरू कर दी. भारत ने जवाब दिया. कुछ दिनों में पाकिस्तान का पूरा एयर डिफेंस सिस्टम ध्वस्त हो गया. भारतीय वायुसेना अपने टारगेट चुन रही थी जैसे नौचंदी मेले में एयर राइफल वाले स्टॉल पर गुब्बारे पर निशाने लगाए जाते हैं- आराम से, मनमाने ढंग से. तभी पाकिस्तान ने फोन उठाया और वॉशिंगटन को कॉल किया. दर्द से छुटकारा पाने के लिए.
भारत की शुरुआत से यही राय थी कि उसे जंग नहीं चाहिए. वॉशिंगटन को धन्यवाद देकर कहा गया- पाकिस्तानी जनरलों से कहो कि वे भी यही बात कहें. जब पाकिस्तान के DGMO ने भारत के DGMO को फोन करके लड़ाई खत्म करने को कहा, भारत ने हामी भर दी. सीजफायर हो गया. डोनाल्ड ट्रंप ने दुनिया के सामने यह ऐलान दोनों देशों की सेना के बयान आने से पहले ही कर दिया. उन्होंने दावा किया कि उन्होंने यह कर दिखाया और कहा कि उन्हें नोबेल शांति पुरस्कार मिलना चाहिए.
लगे हाथ आसिम मुनीर ने भी जीत का ऐलान कर दिया. उन्होंने खुद को जीत का मेडल और जीवनभर के लिए ‘फील्ड मार्शल’ की पदवी भी दे डाली. यह उस शख्स के लिए बड़ा कारनामा था जिसके एयर डिफेंस मलबे में बदल चुके थे और एयरफील्ड पर गड्ढे हो गए थे. पाकिस्तान की PR मशीन पूरी तेजी से चल पड़ी. प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ मुस्कुराए और मुनीर का शुक्रिया अदा किया. पाकिस्तानी मीडिया ने मेगाफोन पर चढ़कर चिल्लाना शुरू कर दिया. सब जीत रहे थे. उपमहाद्वीप के सैन्य इतिहास में यह सबसे “विजयी” हार थी.
भारत ने ऐसा कोई नाटक नहीं किया. उसे जरूरत भी नहीं थी. सैटेलाइट तस्वीरें सबके सामने थीं. गड्ढे झूठ नहीं बोलते. वे रडार जो पाकिस्तान के आसमान की रक्षा करते थे, किसी काम के नहीं रहे. भारत ने बस सबूत को खुलेआम पड़ा रहने दिया और अपने काम पर लग गया. ऐसा आत्मविश्वास तब आता है जब तुम्हें पता हो कि कुछ बोलने की जरूरत नहीं है. भारत के पास यह आत्मविश्वास था. पाकिस्तान के पास फील्ड मार्शल.
अब मिडिल ईस्ट में जो कुछ हो रहा है, वह ऑपरेशन सिंदूर का हॉलीवुड वर्जन है. बड़े ग्लोबल स्टेज पर, ज्यादा बजट के साथ, ज्यादा ज्वलनशील इलाके के साथ और ऐसे किरदारों के साथ कि अपोकैलिप्स नाउ भी कम ड्रामैटिक लगे.
28 फरवरी को इजरायल और अमेरिका ने ईरान की पूरी टॉप लीडरशिप को एक ही हमले में खत्म कर दिया. वॉशिंगटन को लगा कि इससे तेहरान का हौसला टूट जाएगा, रिजीम की कमर टूट जाएगी, कमांड बिखर जाएगा और मामला जल्दी निपट जाएगा. लेकिन स्क्रिप्ट बदल गई.
ईरान ने जवाब दिया- बदले की आग के साथ.
उसने इजरायल पर हमला किया. पूरे मिडिल ईस्ट में अमेरिकी अड्डों पर हमला किया. उन अरब देशों पर भी हमला किया जिन्होंने चुपके से वॉशिंगटन के साथ हाथ मिला लिया था और सोचा था कि उनका भूगोल उन्हें बचा लेगा.
ईरान दशकों से अमेरिकी प्रतिबंधों के तले जी रहा है. प्रतिबंधों का मकसद देश को भूखा मारकर घुटनों पर लाना होता है. लेकिन असल में उन्होंने ईरान को बेहद धैर्यवान, थोड़ा रचनात्मक और अमेरिकी धमकियों से पूरी तरह बेपरवाह बना दिया. जब तुम 40 साल से सजा भुगत रहे हो, तो और सजा बस एक साधारण मंगलवार जैसी हो जाती है.
होर्मुज स्ट्रेट बंद हो गया. अमीर अमेरिकी-समर्थक खाड़ी देश अब समझ रहे हैं कि जिस पड़ोसी से कभी दोस्ती नहीं हो सकी, वह अंदर से दरवाजा बंद कर दे तो क्या होता है. उनका सुरक्षा गारंटर अपने बेस भी सुरक्षित नहीं रख पाया और अब सब बंद करने के लिए गिड़गिड़ा रहा है. ईरान गिड़गिड़ा नहीं रहा. ईरान टोल वसूल रहा है. और टोल बहुत भारी है.
अंदाजा लगाओ, अब कौन शांति मांग रहा है.
मार्च 2026 में ट्रंप ने पाकिस्तान को फोन किया- ठीक वैसे ही जैसे मई 2025 में पाकिस्तान ने ट्रंप को फोन किया था. भूमिकाएं बस उलट गई हैं. हताशा वैसी की वैसी. दुनिया का सबसे ताकतवर देश अब एक गरीब और बिखरे हुए देश से गुजारिश कर रहा था कि वह तेहरान से बात कर ले. पाकिस्तान ने हां कह दी क्योंकि उसे लगा कि कम से कम वह किसी के काम का तो है. ईरान ने मना कर दिया. न अमेरिका से, न पाकिस्तान से. ईरान बात करने में दिलचस्पी नहीं रखता था. उसके पास और काम थे- जैसे अरबों को जहां दर्द हो, वहां मारना.
स्टिव विटकॉफ इस्लामाबाद पहुंचे. ट्रंप के दामाद जेरेड कुश्नर भी गए. तेहरान ने कहा- कोई सीनियर आदमी लेकर आओ. फिर अमेरिका ने पाकिस्तान के जरिए स्कूल के नोट जैसा 15 सूत्री प्रस्ताव तेहरान भेजा. सब ठुकरा दिए गए. चर्चा के लायक भी नहीं समझे गए.
इसके बजाय ईरान ने अपनी शर्तें भेजीं. होर्मुज के यातायात पर स्थायी नियंत्रण. इलाके से अमेरिकी सैन्य बेस की पूरी वापसी. नुकसान की भरपाई. भविष्य में कोई हमला न हो, इसकी गारंटी. ये घुटनों पर बैठे देश की मांगें नहीं हैं. ये उस देश की मांगें हैं जिसने सामने वाले का हाथ देख लिया है, हर कार्ड को अच्छे से परख लिया है और पाया है कि सारे कार्ड खाली हैं.
ये वही ट्रंप हैं जिन्होंने जेलेंस्की से कहा था कि तुम्हारे पास कोई कार्ड नहीं बचा. आज सऊदी अरब ने यूक्रेन के साथ डिफेंस डील साइन कर ली. दुनिया ने देख लिया. ट्रंप के कार्ड दिख गए.
इधर ट्रंप कैमरे के सामने आकर अमेरिका और दुनिया को बता रहे हैं कि वे जीत रहे हैं. ईरान गिड़गिड़ा रहा है. अमेरिकी सैन्य ताकत ने तेहरान की डिफेंस क्षमता पूरी तरह मिटा दी है. शब्द वही हैं. लय वही है. ये वही भाषण है जो आसिम मुनीर ने दिया था, बस पंजाबी-उर्दू से अमेरिकी अंग्रेजी में अनुवादित और ज्यादा प्रोडक्शन वैल्यू के साथ. मुनीर के पास एपॉलेट और सेरेमोनियल बैटन था. ट्रंप के पास ट्रुथ सोशल और कैप्स लॉक है. माध्यम अलग है. मैसेज एक ही है- हम जीत रहे हैं. गड्ढों को नजरअंदाज कर दो.
ऑपरेशन सिंदूर के दौरान पाकिस्तानी PR ऑपरेशन इस विधा का मास्टरक्लास था. कई एंकर, कई प्लेटफॉर्म, कई दावे- राफेल आसमान से गिर रहे हैं, पाकिस्तानी ड्रोन इंडिया गेट के ऊपर मंडरा रहे हैं, भारतीय शहर कांप रहे हैं, महान जीत हो रही है. पाकिस्तानी एयर डिफेंस का मलबा स्पेस से दिख रहा था. दावे सिर्फ पाकिस्तानी टीवी पर दिख रहे थे. ट्रंप अब गिरे हुए जेट्स की संख्या बढ़ा रहे हैं, आखिरी गिनती में 11.
एक गरीब पाकिस्तान अब खुद को इस संघर्ष में ब्रोकर के रूप में पेश कर रहा है. इस्लामाबाद को पता चल रहा है कि अमेरिका और ईरान दोनों से बात करने वाला एकमात्र देश होने में कितना अच्छा डिप्लोमैटिक फायदा और डॉलर निकल सकता है.
ईरान ने अमेरिका से बात नहीं की है. वह ऐसा बार-बार सार्वजनिक रूप से कह भी रहा है. ऐसी तसल्ली के साथ जो उस देश के पास होती है जिसके पास माफी मांगने के लिए कुछ नहीं है और दिखावा करने की भी कोई वजह नहीं है.
अमेरिका के महंगे रडार, AWACS प्लेन, फ्यूल टैंकर और फाइटर जेट चले गए. वो बेस जो डिटरेंस प्रोजेक्ट करने वाले थे, अब कमजोरी दिखा रहे हैं.
वॉशिंगटन अब ईरान में सैनिक उतारने पर विचार कर रहा है. यह सोच इतनी सामरिक लापरवाही भरी है कि इसे सोचने में काफी मेहनत लगी होगी. कुछ और भी भयानक होने की अफवाहें हैं- यहां तक कि परमाणु विकल्प की भी.
सच सरल है. सब कुछ विफल हो गया है. सारा प्रभाव खत्म हो चुका है. रणनीति खंडहर में बदल गई है. ईरान ने कुछ भी नहीं माना है और ऐसा होने के कोई संकेत नहीं हैं.
कार्ल मार्क्स ने कहा था कि इतिहास खुद को दोहराता है- पहले त्रासदी के रूप में, फिर मजाक के रूप में.
ऑपरेशन सिंदूर खुद को दोहरा रहा है. पहले पिंडी में. अब फारस में.
युद्ध की धुंध हारने वाले पक्ष के लिए उदार होती है. वह उसे तस्वीरें बनाने देती है, विजय परेड का कार्यक्रम बनाने देती है, मेडल बांटने और पदवी देने और नोबेल नामांकन देने देती है. लेकिन धुंध अस्थायी होती है. वह उठती है. और जब उठती है तो गड्ढे अभी भी वहीं होते हैं. स्ट्रेट अभी भी बंद है. ईरान ने अभी भी फोन नहीं उठाया.
डोनाल्ड ट्रंप अब जंग से एग्जिट ढूंढ रहे हैं. ईरान उनकी बच निकलने की राह आसान नहीं बनाना चाहता. वह पूरा हिसाब करेगा और होर्मुज का टोल भी वसूलेगा.
ट्रंप ने यह युद्ध नहीं जीता. वे हार रहे हैं. पूरी तरह से.
(Indiatoday.in के लिए लिखे गए लेख का अनुवाद)