सरकार ने मंगलवार को एक खिड़की खोली. लोग दरवाजे को लेकर चिल्ला रहे हैं. ताजी हवा की जरूरत को लेकर सरकार अपनी जगह सही है. और किसी चोर के चुपके से अंदर आने की बात पर लोग भी अपनी जगह सही हैं, क्योंकि एक खिड़की देर-सबेर दरवाजा बन ही जाती है. UPI को फ्री रखने के फायदे इसे फ्री रखने की लागत से कहीं ज्यादा थे, लेकिन सरकार को उस चीज को ठीक करने की खुजली हुई जो खराब ही नहीं थी, और अब उसे सबके सामने हाथ मलना पड़ रहा है. हम भारतीयों का यह एक पुराना तरीका है.
सबसे पहले, बोरिंग हिस्से को किनारे करते हैं. क्योंकि सरकार को लगता है कि आंकड़ों वाली बात पर आकर ही सारा विवाद खत्म हो जाता है. 15 अक्टूबर से, किसी व्यक्ति द्वारा किसी दुकानदार को किया जाने वाला 2,000 रुपये से ऊपर का UPI पेमेंट 0.4 प्रतिशत मर्चेंट डिस्काउंट रेट (MDR) के दायरे में आएगा. 3,000 रुपये के भुगतान पर व्यापारी को 12 रुपये, 50,000 रुपये के भुगतान पर 200 रुपये देने होंगे, और 75,000 रुपये या उससे ऊपर के किसी भी भुगतान पर यह ज्यादा से ज्यादा 300 रुपये तय कर दिया गया है.
एक व्यक्ति से दूसरे व्यक्ति (पर्सन-टू-पर्सन) के ट्रांसफर किसी भी राशि पर फ्री ही रहेंगे, और UPI के कुल इस्तेमाल में गिनती के हिसाब से इनकी हिस्सेदारी 37 प्रतिशत और रकम के हिसाब से 70 प्रतिशत है. पी2पीएम टैग वाले छोटे व्यापारी, जो महीने में 1 लाख रुपये तक लेते हैं, उन पर भी कोई शुल्क नहीं लगेगा. दुकानदारों वाले कुल लेनदेन का सिर्फ 4 प्रतिशत हिस्सा ही इसके दायरे में आएगा.
QR कोड स्कैन करने वाले ग्राहक को कोई एक्स्ट्रा पैसा नहीं देना है, ऐप वाले कोई प्लेटफार्म फीस नहीं जोड़ सकते, और व्यापारी को इसे आपके बिल में जोड़ने की इजाजत नहीं है. बैंकों से नजर रखने को कहा गया है, अब भगवान या सरकार ही जाने यह कैसे होगा. आपकी चाय, आपका ऑटो, आपकी सब्जी, सब पर कोई असर नहीं पड़ेगा. यह शुल्क किसी बड़े बिल पर है, नंदू के चाय स्टॉल पर नहीं.
तो हां, यह बहुत छोटी सी रकम है. एक तय सीमा वाली छोटी रकम. यह रकम दुकानदार को देनी है, सामान खरीदने वाले को नहीं. सरकारी तंत्र ने एक चार्ट जारी किया और वह चार्ट अपनी जगह सही भी है. बैंकिंग क्षेत्र का कहना है कि इस पूरे सिस्टम को चलाने और सिक्योर रखने में लगभग 20,000 करोड़ रुपये सालाना खर्च आता है, और सुरक्षा गार्ड की तनख्वाह तो किसी न किसी को देनी ही होगी.
जाहिर है, बैंक अपने बनाए ढांचे के खर्च के लिए सपोर्ट की मांग करेंगे ही. हालांकि, वे उस पैसे की गिनती नहीं करेंगे जो UPI की वजह से उनका बच रहा है. UPI से पहले, उन्हें ATM में पैसे भरने के लिए ज्यादा चक्कर लगाने पड़ते थे. अब हर व्यक्ति का ATM जाना कम हो गया है, बैंक में लाइन कम हो गई है और नए ग्राहक बनाना सस्ता हो गया है. सभी बैंकों, उनकी शाखाओं और ATM के बारे में सोचिए. सिर्फ यही बचत इस सिस्टम के रख-रखाव के खर्च को पूरा करने में काफी मददगार साबित होती है.
अब बात करते हैं आंकड़ों के इस पूरे खेल की. लोग भावना से जुड़कर वोट देते हैं, आंकड़ों को देखकर आज तक किसी ने वोट नहीं दिया. लोग उस एहसास के लिए वोट देते हैं जो वे महसूस करते हैं. इस 0.4 प्रतिशत को एक टैक्स की तरह ही देखा जाएगा. यह कोई टैक्स नहीं है. यह बैंकों के पास जाता है, सरकार के खजाने में नहीं. लेकिन इससे कोई फर्क नहीं पड़ता. यदि कोई हीरा पन्ना कॉम्प्लेक्स में जब कोई सरकारी विभाग आपके पैसे को छूता है, तो वह टैक्स ही कहलाता है. जब कोई बिचौलिया आपकी फ्री चीज पर फीस लगाता है, तो वह चोरी ही लगती है. ठठेरी बाजार में बैठकर कोई भी पी2पीएम के नियमों को पढ़ने नहीं जाएगा.
हम यह नजारा और इसके अलग-अलग नतीजे पहले भी देख चुके हैं. नोटबंदी का प्रबंधन बहुत ही खराब था. लाइनें लगीं, मौतें हुईं, नकद से चलने वाले व्यापार का रातों-रात गला घोंट दिया गया, और दो साल के भीतर RBI ने बताया कि 99.3 प्रतिशत पैसा वापस आ गया. हर आंकड़े के हिसाब से यह एक नाकामी थी. लेकिन हर एहसास के हिसाब से, यह एक जीत थी. नंदू चायवाला इस सोच के साथ लाइन में खड़ा था कि बड़ी गाड़ी वाला सेठ उससे भी लंबी लाइन में खड़ा है. और 500 रुपये के चार पुराने नोट लेकर लाइन में खड़े रहने के बाद 2000 रुपये का एक नोट लेकर बाहर निकलने का जो अहसास था, वह अलग ही था. नंदू ने चार बार वैष्णो देवी की यात्रा की है और उस कड़कती ठंड में बैंक की लाइन वाले अहसास और यात्रा वाले अहसास में वह कोई अंतर नहीं कर पाता. वही अहसास कि मुझसे ज्यादा अमीर आदमी परेशान हो रहा है, 2017 में बीजेपी को यूपी में 312 सीटों तक ले गया. गणित इसके खिलाफ था, लेकिन भावना जीत गई.
इसी बात को उलट दीजिए तो आपको 2024 का नतीजा मिल जाएगा. संविधान बदलने की कोई योजना नहीं थी. न घोषणापत्र में, न किसी भाषण में. लेकिन एक अफवाह फैल गई कि '400 पार' का नारा संविधान बदलने के लिए है. इस अफवाह की वजह से बीजेपी ने अपना बहुमत खो दिया और वह 240 सीटों पर सिमट गई, जो कि जरूरी बहुमत से कम था. आंकड़ों का हिसाब 400 का था, लेकिन सच्चाई 240 निकली. गणित का कोई मौका ही नहीं बना, भावना एक बार फिर जीत गई. भावना हमेशा जीतती है.
अब बात करते हैं सही समय की, और सही समय का होना राजनीति में बहुत जरूरी होता है. यह सरकार पहले से ही यूजीसी के मामले में घिरी हुई है. उस माहौल के बीच अब उसने एक ऐसी चीज पर हाथ डाल दिया है जिस पर दादरी से लेकर धारावी तक, हर भारतीय -चाहे वह गरीब हो या अमीर, अनपढ़ हो या पढ़ा-लिखा- बिना सोचे-समझे भरोसा करने लगा था कि UPI पेमेंट्स फ्री है. और सरकार ने ऐसा वित्त मंत्रालय के उस बयान के ठीक 15 महीने बाद किया है जिसमें UPI पर एमडीआर लगने की खबरों को "पूरी तरह से झूठा, बेबुनियाद और गुमराह करने वाला" बताया गया था और चेतावनी दी गई थी कि ऐसी बातें नागरिकों के बीच बेवजह डर और शक पैदा करती हैं. जब आपका अपना मना किया हुआ बयान ही आपकी नई घोषणा बन जाए, तो अगली बार किसी बात से मना करने को भी एक वादे की तरह ही देखा जाएगा.
कम भरोसे वाले समाज में किसी अच्छी बात के साथ भी यही होता है. हर तोहफा एक जाल लगता है. और यह भरोसे की कमी सिर्फ विपक्षी पार्टियों की बनाई हुई नहीं है. कांग्रेस ने 0.5 प्रतिशत शुल्क का दावा किया और बीजेपी के अमित मालवीय ने इस दावे को पूरी तरह से झूठा बताया. वे सही भी हैं, क्योंकि यह 0.4 है. लेकिन यह बात उस आदमी को समझाइए जिसने यह मान लिया है कि 0.4 और 0.5 के बीच का फर्क सिर्फ कुछ समय का है. हर कोई मान रहा है कि यह सिर्फ हवा का रुख देखने की कोशिश है. जिस देश में हर किसी की मान्यता का सम्मान करने की उम्मीद की जाती है, वहां आप किसी की मान्यता से बहस नहीं कर सकते.
सरकारी प्रेस रिलीज से किसी को तसल्ली नहीं मिलने वाली. NPCI के FAQs व्हाट्सएप पर वायरल नहीं होते. "UPI पर टैक्स लग गया" की खबर UPI की रफ्तार से ही फैली है. और यूपी का चुनाव कोई दस साल दूर नहीं है, बस कुछ महीनों की बात है. जिस पार्टी ने नोटबंदी के अहसास पर वह राज्य जीता था, वह अब इस नए शुल्क वाले अहसास के साथ वहां जा रही है.
यह शुल्क कुल UPI लेनदेन के बहुत छोटे से हिस्से पर लागू होता है और भारत के जुगाड़ू लोग इसका भी कोई न कोई रास्ता निकाल ही लेंगे. दोनों ही तरह से, शुल्क बहुत मामूली है. लेकिन इतनी मामूली रकम के लिए अपनी बात से पलटना बुद्धिमानी नहीं है. जो चीज सिर्फ एक पैसे की हो, उसे फ्री करके सबको खुश किया जा सकता है. लेकिन जो चीज पहले से फ्री हो, उस पर एक पैसा लगाना भी लूट जैसा लगता है. जैसा कि हमारे समय के जाने-माने फिलॉसफर श्री समय रैना ने एक बार कहा था: एक मांसाहारी आदमी शाकाहारी खाना खा सकता है, लेकिन एक शाकाहारी आदमी मांसाहारी खाना नहीं खा सकता. फ्री UPI उस भारी कीमत से बचने का एक छोटा सा तरीका है जो पैसे वाले UPI के आने से चुकानी पड़ सकती है.