अरबों डॉलर का भारी-भरकम बजट, अमेरिका और पश्चिमी मुल्कों से खरीदे गए दुनिया के सबसे महंगे लड़ाकू विमान, टैंक और मिसाइल डिफेंस सिस्टम. इसके बावजूद सऊदी अरब की फौज यमन के फटेहाल हूती लड़ाकों के आगे बेबस नजर आ रही है. फौजी साजो-सामान और तकनीक के इस दौर में भी सऊदी फौज यमन के पहाड़ों और तंग घाटियों में हूती लड़ाकों को पीछे धकेलने में नाकाम हो रही है.
हूती लड़ाके सऊदी अरब की सीमा में घुसकर लगातार छापामार हमले कर रहे हैं. उसकी इकोनॉमी की रीढ़ बेशकीमती तेल पाइपलाइन को उड़ा दे रहे हैं. रिफाइनरियों पर हमले कर रहे हैं. सऊदी अरब के F-15 विमान मार गिरा रहे हैं. उसके जहाजों की बाब-अल-मंदब स्ट्रेट में नाकेबंदी कर दे रहे हैं. सऊदी अरब की यह बेचारगी सिर्फ यमन के जंग के मैदान तक महदूद नहीं है, बल्कि यह कमजोरी पूरी अरब दुनिया के फौजी ढांचे और उनकी डिफेंस पॉलिसी में छिपी गहरी खामियों को बेनकाब करती है.
तख्तापलट का खौफ
सऊदी अरब और कई अन्य अरब मुल्कों की फौज का ढांचा इस तरह तैयार किया गया है कि वह देश की सरहदों की हिफाजत करने से ज्यादा हुकूमत और शाही खानदान की सुरक्षा करे. इतिहास गवाह है कि इन फौजों का इस्तेमाल अपनी ही जनता के विरोध-प्रदर्शनों और आंदोलनों को कुचलने के लिए ज्यादा हुआ है. हुक्मरानों को हमेशा यह खौफ सताता रहता है कि कहीं उनकी अपनी ही फौज का कोई काबिल जनरल या बड़ा अफसर तख्ततापलट न कर दे.
इसी डर की वजह से फौजी चेन ऑफ कमान को बेहद पेचीदा और सीमित रखा गया है. जंग के मैदान में तैनात फील्ड कमांडरों को अपने स्तर पर फैसले लेने की आजादी नहीं होती. छोटे से छोटे फौजी मूवमेंट के लिए भी रियाद में बैठे डिफेंस मिनिस्टर या बादशाह की मंजूरी का इंतजार करना पड़ता है. जब तक ऊपर से हुक्म आता है, तब तक मैदान-ए-जंग के हालात बदल चुके होते हैं. इस ढीले और डरे हुए तंत्र की वजह से ही हूती लड़ाकों के अचानक होने वाले छापों का सऊदी फौज सही वक्त पर जवाब नहीं दे पाती.
जमीनी ट्रेनिंग की भारी कमी
कागजों पर सऊदी अरब का रक्षा बजट दुनिया के बड़े मुल्कों में गिना जाता है. वे बेहिसाब पैसा खर्च करके F-15 जैसे लड़ाकू जहाज और अब्राम्स टैंक खरीदते हैं. लेकिन महंगे हथियार खरीद लेने भर से कोई फौज ताकतवर नहीं बन जाती, जब तक कि उन्हें चलाने वाले सिपाहियों के पास सही ट्रेनिंग और जज्बा न हो.
सऊदी फौज के निचले स्तर के सिपाहियों और अफसरों की ट्रेनिंग बेहद पुरानी और कागजी है. सऊदी सिपाहियों को पहाड़ी इलाकों और गुरिल्ला वॉर का कोई तजुर्बा नहीं है. जब हूती लड़ाके मोटरसाइकिलों और हल्की मिसाइलों के साथ अचानक हमला करते हैं, तो सऊदी सिपाही अपने भारी-भरकम टैंक छोड़कर भाग निकलते हैं. ताजा हालात बताते हैं कि अत्याधुनिक तकनीक का सही इस्तेमाल न कर पाना और जमीनी ट्रेनिंग का न होना ही उनकी सबसे बड़ी नाकामी है. वहीं दूसरी ओर यमन के पहाड़ों में बैठे हूतियों ने पिछले कुछ सालों में न सिर्फ अपने हथियारों को अपग्रेट किया है, बल्कि अब तो कहा जा रहा है कि कुछ रूसी सैटेलाइट की मदद से वे सऊदी अरब के भीतर सटीक हमले कर रहे हैं. और ऐसा करने के लिए उनके पास हौसले और जज्बे की कभी कमी नहीं थी.
कबीलाई सोच
सऊदी अरब में कौमी पहचान से ज्यादा अहमियत कबीले (जनजाति) और धार्मिक फिरकों (शिया-सुन्नी) को दी जाती है. फौज में तरक्की या बड़ी जिम्मेदारी किसी अफसर की काबिलियत, बहादुरी या जंग के तजुर्बे को देखकर नहीं, बल्कि उसके कबीले और शाही खानदान से नजदीकी को देखकर तय होती है.
इस तरह के पक्षपात से फौज के भीतर आपसी भरोसा और तालमेल टूट जाते हैं. जब सिपाहियों को लगता है कि उनकी मेहनत और जान की कोई कीमत नहीं है और बड़े ओहदों पर सिर्फ खास कबीले या रसूल वाले लोग ही बैठेंगे, तो उनमें लड़ने का जज्बा खत्म हो जाता है. यूनिटों के बीच आपसी भरोसे की यही कमी जंग के मैदान में हार का सबब बनती है.
डिफेंस आउटसोर्सिंग
सऊदी अरब की पूरी रक्षा नीति इस सोच पर टिकी रही है कि अगर उन पर कोई बड़ा संकट आएगा, तो अमेरिका और उसकी फौज उन्हें बचा लेगी. यमन युद्ध में जब अमेरिका ने अपनी सीधी जमीनी भूमिका से हाथ पीछे खींच लिए, तो सऊदी फौज पूरी तरह अलग-थलग पड़ गई. मक्का डिफेंस पैक्ट के बाद से उसके नए-नए फौजी दोस्त बने पाकिस्तान और तुर्की भी सिर्फ हूतियों की निंदा करने तक ही सीमित हैं.
सऊदी अरब के पास अपने खुद के हथियार या फौजी सामान बनाने की कोई बड़ी घरेलू व्यवस्था नहीं है. वे मर्मत और देख-रेख के लिए भी विदेशी सलाहकारों पर निर्भर हैं. इसके अलावा, सिर्फ हवा से बमबारी करके जंग नहीं जीती जा सकती; जमीन पर उतरकर कब्जा बनाए रखना पड़ता है. सऊदी वायुसेना ने यमन में भारी बमबारी की, लेकिन जमीनी लड़ाई में उनके सिपाही हूतियों के सामने टिक नहीं सके.
जब किसी फौज की मानसिकता केवल अंदरूनी दमन करने वाली पुलिस जैसी बन जाती है, तो वह बाहर के किसी संगठित और विचारधारा से प्रेरित दुश्मन का सामना करने की सलाहियत खो देती है. हूती लड़ाके एक विचारधारा और यमन पर अपने नियंत्रण के मकसद से लड़ रहे हैं, जबकि सऊदी सिपाही महज एक सरकारी नौकरी की तरह अपनी ड्यूटी निभा रहे हैं.