केरल में ओणम धूमधाम से मनाया जा रहा है. घर-घर फूलों की रंगोली बन रही है. केले के पत्ते पर खाना परोसा जा रहा है. नाव की दौड़ हो रही है. हिंदू, मुस्लिम, ईसाई - सब शामिल हैं इसे मनाने में. प्रोग्रेसिव और पढ़े-लिखे लोगों वाले इस राज्य में जब ईद आती है तो मुस्लिम परिवारों को दूसरे धर्म वाले पड़ोसी बधाई देते हैं. क्रिसमस पर चर्च की घंटी बजती है, केक कटते हैं, और सभी धर्मों के लोग आपस में ग्रीटिंग्स शेयर करते हैं. ओणम भी उसी तरह साझा त्योहार बन चुका है. बस, एक फर्क के साथ...
हर साल जब ओणम आता है तब एक समानांतर बहस चल पड़ती है. सोशल मीडिया पर लिखा जाता है – “ओणम हिंदुओं का त्योहार नहीं है. यह मलयाली संस्कृति की पहचान है. फसल कटने का त्योहार है.” फिर कोई जवाब में पूछ बैठता है – “ईद मुस्लिम त्योहार है, क्रिसमस ईसाई त्योहार है. लेकिन ओणम हिंदू नहीं?” 16 अगस्त से शुरू हुआ ओणम का त्योहार जारी है. और साथ ही यह गरमागरम बहस भी कि हिंदू त्योहारों को या तो बुरा बताओ या उसका रंग-रूप बदल दो. बस हिंदू मत रहने दो.
सवाल यह है कि ईद और क्रिसमस के उलट ओणम की बारी आती है तो उसकी पहचान का सवाल क्यों खड़ा हो जाता है? हिंदू जड़ें होने के बावजूद. सोशल मीडिया पर कई यूजर्स दलील देते हैं कि ऐसा इसलिए ताकि मुस्लिम और ईसाई धर्म मानने वालों को एक हिंदू त्योहार में शामिल होने में कोई असुविधा न हो. त्योहार साझा रहे. इस पर वही सवाल दोबारा होता है कि ईद और क्रिसमस को साझा त्योहार बनाने के लिए कोई प्रयास क्यों नहीं होते?
ओणम की जड़ में है महाबली-वामन कथा
ओणम की कहानी पुरानी है. ईसाइयत और इस्लाम से भी पुरानी. मान्यता है कि केरल में महाबली नाम के राजा थे. उनके राज्य में सब बराबर रहते थे. कोई गरीब नहीं, कोई भूखा नहीं. देवताओं को यह पसंद नहीं आया. विष्णु भगवान वामन अवतार लेकर आए. छोटे कद के ब्राह्मण बनकर तीन कदम जमीन मांगी. महाबली ने वचन दे दिया. पहले दो कदमों में धरती और आसमान नाप लिए. तीसरे कदम के लिए महाबली ने अपना सिर आगे कर दिया. वामन ने उन्हें पाताल भेज दिया, लेकिन एक वादे के बदले. हर साल एक बार महाबली अपने लोगों से मिलने आ सकते हैं. और उसी मान्यता के मुताबिक ओणम मनाया जाता है.
यह कहानी भागवत पुराण और वामन पुराण में लिखी है. थिरुवोणम नक्षत्र पर त्योहार पड़ता है, जो विष्णु से जुड़ा है. केरल के त्रिक्काकरा मंदिर में वामन की पूजा सदियों से होती रही. पुराने ताम्रपत्रों और साहित्य में भी इसका जिक्र मिलता है. घरों में ओणाथप्पन की मूर्ति रखी जाती है. फूलों की पोक्कलम (रंगोली) बनाई जाती है. दीपक जलाए जाते हैं. ये रिवाज हिंदू परंपरा से जुड़े हैं.
महाबली-वामन कथा में ‘सेक्युलर’, ‘लेफ्ट-लिबरल’ और ‘जाति-भेद’ वाला ट्विस्ट
ओणम को नॉन-हिंदू बताने वालों को थोड़ी देर के लिए एक तरफ रख दें, तो इस त्योहार की पौराणिक कहानी को मोड़ने की कोशिश भी कम दिलचस्प नहीं है. कुछ लोग महाबली को पीड़ित और वामन को धोखेबाज बता रहे हैं. जैसे महाबली असुर थे और वामन ने अत्याचार किया. पुरानी कहानी में महाबली विष्णु के भक्त हैं. वचन निभाने वाले. वे खुद सिर आगे करते हैं. लेकिन नई व्याख्या में इसे जाति-भेद की लड़ाई बना दिया जाता है. द्रविड़ बनाम आर्य. असुर बनाम देवता. कुछ जगहों पर महाबली को बौद्ध राजा तक कह दिया जाता है. सोशल मीडिया पर यूजर्स इन ट्विस्ट को भी उठा रहे हैं. वे कह रहे हैं कि कहानी का मतलब बदला जा रहा है. सीपीआईएम नेता थॉमस आइसॉक की एक पुरानी एक्स पोस्ट अब भी शेयर हो रही है, जिसमें वे ओणम को महाबली के जातिगत उत्पीड़न से जोड़कर बता रहे थे.
इतने प्रयासों के बाद तो कोई भी नॉन-हिंदू ओणम को अपना ही लेगा. केरल के मुस्लिम स्कूलों और कॉलेजों में ओणम के कार्यक्रम हो रहे हैं. चर्चों में पोक्कलम बन रहे हैं.
सिर्फ ओणम नहीं, कई त्योहारों का एक ही पैटर्न
बहस सिर्फ ओणम तक सीमित नहीं. देश के कई क्षेत्रीय त्योहारों में भी यही पैटर्न दिख रहा है. पोंगल को तमिल संस्कृति और फसल का त्योहार कह दिया जाता है. बैसाखी को पंजाबी संस्कृति का. जो त्योहार कम लोकप्रिय हैं, उन्हें अंधविश्वास कहकर किनारे कर दिया जा रहा है. जो बहुत लोकप्रिय हैं, उन्हें सबका बनाकर हिंदू जड़ों से काटने की कोशिश हो रही है. कई यूजर्स इसे संगठित प्रयास बता रहे हैं. क्षेत्रीय त्योहारों की हिंदू पहचान मिटाने के लिए उन्हें आंचलिक संस्कृति और हार्वेस्ट तक सीमित कर दिया गया है. ताकि उनसे जुड़े रीति-रिवाज पूरी तरह समाप्त किए जा सकें.
जैसे, ओणम को ही लीजिए. अगर यह सिर्फ फसल कटने का त्योहार होता तो इसे मनाने के लिए कोई भी तारीख चुन ली जाती. लेकिन, ऐसा नहीं है. बाकायदा उसी नक्षत्र में यह त्योहार मनाया जाता है, जो महाबली के आगमन के लिए तय है - थिरुवोणम. फसल और संस्कृति का लेबल सिर्फ हिंदू जड़ों को काटने के लिए लगाया गया है.
क्या वाकई इस्लाम और ईसाइयत में ओणम कबूल है?
केरल में ओणम को लेकर मौलाना अक्सर सावधानी बरतने की सलाह देते हैं. 2025 में मलप्पुरम में यहां के कई मौलानाओं ने मिलकर कहा था कि यह त्योहार हिंदू परंपराओं और महाबलि-वामन कथा से जुड़ा है. इसमें शामिल होने से शिर्क का खतरा है, इसलिए मुसलमानों को दूर रहना चाहिए.
दूसरी ओर सिरो-मालाबार चर्च ने 2024 में जो नोट जारी किया वह उसमें मौलानाओं की तुलना में भाषा थोड़ी सॉफ्ट थी. कहा गया कि ओणम सांस्कृतिक त्योहार है, धार्मिक नहीं. फूल सजावट, सद्य और पुलिकली सांस्कृतिक गर्व के विषय हैं. ईसाई इसे भाईचारे के रूप में मना सकते हैं.
और ऐसा ही होता भी है. प्रोग्रेसिव मुसलमान और ईसाई कहते हैं कि यह केरल की साझा संस्कृति है. व्यक्तिगत आजादी होनी चाहिए. ज्यादातर लोग इन हिदायतों के बावजूद ओणम को खुशी और सद्भाव का मौका मानकर मनाते हैं. और इसके लिए ओणम की हिंदू पहचान की कुर्बानी दे दी जाती है.
मिल-जुलकर त्योहार मनाना अच्छी बात है. किसी पर किसी तरह की रोक नहीं होनी चाहिए. लेकिन, क्या इस साझेदारी के लिए एक त्योहार का अतीत बदलना जरूरी है? क्या फसल और संस्कृति का लेबल लगाकर पुराणों और मंदिर परंपराओं को भुलाना सही है? ईद को मुस्लिम मानकर मनाना गलत नहीं. क्रिसमस को ईसाई मानकर मनाना गलत नहीं. फिर ओणम को हिंदू मानकर मनाने में क्या दिक्कत? रंग मिलाने से सुंदर तस्वीर बनती है. किसी एक रंग को मिटा देने से नहीं.