नीतीश कुमार और शरद पवार में पहली कॉमन चीज तो यही है कि दोनों का राज्यसभा के लिए निर्विरोध चुना जाना तय हो गया है. और, अनकॉमन बात यह है कि नीतीश कुमार ने कभी नहीं कहा कि वो प्रधानमंत्री पद के दावेदार नहीं हैं, जबकि शरद पवार इस बारे में पहले ही अपना स्टैंड साफ कर चुके हैं.
नीतीश कुमार अब भी प्रधानमंत्री पद के वैसे ही दावेदार हैं, जैसे कांग्रेस ने विपक्षी खेमे में राहुल गांधी के लिए वो पोजीशन रिजर्व कर रखी है, यह बात अलग है कि विपक्षी गठबंधन INDIA ब्लॉक के नेतृत्व को लेकर भी गठबंधन में कभी सहमति नहीं बन सकी.
शरद पवार और नीतीश कुमार दोनों ही राज्यसभा में ऐसे वक्त जा रहे हैं, जब न तो उनके पास पहले जैसी सियासी ताकत बची है, न ही जोड़-तोड़ के मौके जो अपने-अपने स्तर पर अब तक करते आ रहे थे - और दोनों के राजनीतिक दलों पर भी अस्तित्व का खतरा मंडरा रहा है.
दांव पर विरासत, अस्तित्व का भी संकट
नीतीश कुमार और शरद पवार दोनों की राजनीतिक विरासत और उनके बनाए राजनीतिक दलों पर भी अस्तित्व का खतरा पैदा हो गया है. नीतीश कुमार की पार्टी जेडीयू तो बिहार और केंद्र की सरकार में साझीदार भी है, लेकिन शरद पवार तो फिलहाल दोनों ही जगह विपक्ष में हैं - लेकिन चुनौतियां दोनों के सामने मिलती जुलती ही हैं.
शरद पवार का राजनीतिक उत्तराधिकार पहले ही दो हिस्सों में बंट चुका था. अजित पवार के चले जाने के बाद भी उनका खेमा तो महाराष्ट्र की सत्ता में साझीदार भी है, और केंद्र में भी बीजेपी के साथ खड़ा है. लेकिन, शरद पवार के हिस्से में बचा-खुचा बहुत ही कम है. एनसीपी के दोनों गुटों के विलय की संभावना भी अब खत्म हो चुकी है - शरद पवार गुट के नेता जयंत पाटिल ने विलय की संभावनाओं पर बयान देकर फुल स्टॉप लगा दिया है.
शरद पवार वाली एनसीपी के साथ गनीमत है कि सुप्रिया सुले पहले से ही बारामती और मुंबई से लेकर दिल्ली तक सक्रिय हैं, लेकिन नीतीश कुमार की पार्टी जेडीयू में तो अभी परिवार से बेटे निशांत कुमार के दाखिला लेने की ही बात चल रही है. जेडीयू के कार्यकारी अध्यक्ष संजय झा हैं, जबकि एनसीपी की वर्किंग प्रेसिडेंट सुप्रिया सुले हैं.
राज्यसभा चुनाव में भी बीजेपी दोनों के साथ करीब करीब एक जैसा ही व्यवहार कर रही है. शरद पवार के खिलाफ कोई उम्मीदवार न उतार कर बीजेपी ने एक मैसेज तो दिया ही है, यानी आने वाले दिनों में शरद पवार की एनसीपी का भी बीजेपी के साथ आने का पूरा स्कोप बना हुआ है. नीतीश कुमार के साथ तो बीजेपी खड़ी है ही, बस मनमानी कर रही है.
बिहार हो या महाराष्ट्र बीजेपी का कॉमन एजेंडा अपना राजनीतिक विस्तार है. महाराष्ट्र में तो बीजेपी ने थोड़े गैप के बाद अपना मुख्यमंत्री बना लिया था, लेकिन बिहार बचा हुआ था. जैसे बिहार में नीतीश कुमार बीजेपी के सामने दीवार बनकर खड़े थे, महाराष्ट्र में बीजेपी को झटका देने वाले शरद पवार ही हैं.
नीतीश के लिए अब क्या बचा है
नीतीश कुमार के साथ जो हो रहा है, ये सब तो होना ही था. बीजेपी को तो बस उस घड़ी का इंतजार था, जब वो अपने मन की कर सके और विरोध न हो.
लोगों को हैरानी बस इस बात पर हो रही है कि नीतीश कुमार ने इतनी जल्दी, और अचानक सरेंडर क्यों कर दिया. आखिर ऐसी कौन सी कमजोर नस बीजेपी ने पकड़ ली कि छुड़ाना मुश्किल हो गया, और 'पलटूराम' का हुनर भी काम न आया.
बिहार में तो नीतीश कुमार ने चुनावी प्रदर्शन सुधारते हुए पोजीशन बेहतर कर ली थी. केंद्र सरकार में भी सपोर्ट का मजबूत कंधा बने हुए हैं, फिर भी हथियार डाल देने के लिए मजबूर क्यों होना पड़ा?
नीतीश कुमार के पास अब विरासत के बचाव के सीमित विकल्प ही हैं. या तो बेटे निशांत कुमार या विजय चौधरी जैसे भरोसेमंद नेता के लिए मुख्यमंत्री पद की डील कर लें, या फिर उनके करीबी नेता मैदान में डटे रहें - अगर यह डील अब तक नहीं हो पाई है, और आगे भी कोई संभावना नहीं है, तो मान लिया जाना चाहिए कि नीतीश कुमार के पास कुछ भी नहीं बचा है. जो है, वो सब बस ऊपरी तौर पर दिखाई दे रहा है, नींव सियासी दीमक खा चुका है.
और शरद पवार के लिए क्या शेष है
अगर एनसीपी का विलय हो गया होता, तो शरद पवार की ताकत भी बढ़ चुकी होती. वैसे ही अगर निशांत कुमार पहले से जेडीयू में एक्टिव हो गए होते, तो चीजें अलग होतीं. आज की तारीख में दोनों की कॉमन सियासी दुश्मन बीजेपी ही है. नीतीश कुमार की जेडीयू को साथ रहकर खुद का बचाव करना है, और शरद पवार की एनसीपी को दूर रहकर - क्योंकि दोनों ही बुरी तरह चपेट में आ चुके हैं.
एनसीपी (एससी) के लिए राज्यसभा में तो जीरो बैलेंस की नौबत आ चुकी थी, लेकिन शरद पवार के जाने के बाद वैसी स्थिति टल गई है. लोकसभा में सुप्रिया सुले सहित 8 सांसद हैं. महाराष्ट्र की बात करें तो विधान परिषद में 3 ही सदस्य हैं, और विधानसभा में भी महाविकास आघाड़ी में सबसे कम नंबर है. महाराष्ट्र विधानसभा में विपक्षी खेमे में सबसे ज्यादा उद्धव ठाकरे के 20, कांग्रेस के 16 और शरद पवार के पास 10 ही विधायक हैं.
थोड़ा कम या ज्यादा जरूर हो सकता है, लेकिन बीजेपी के बिहार में पांव जमाने में जैसे नीतीश कुमार जमीनी मददगार साबित हुए, पश्चिम महाराष्ट्र और विदर्भ क्षेत्र में शरद पवार की भी मिलती जुलती भूमिका ही मानी जाती है. ज्यादातर ये सब म्युचुअल ही हुआ है, लेकिन मुद्दे की बात यह है कि साथ चलकर भी मंजिल किसे हासिल होती है?
पूरे गांधी परिवार की तरह शरद पवार की तीन पीढ़ियां संसद में पहुंच रही हैं - और परिवारवाद से ताउम्र दूरी बनाए रखने वाले नीतीश कुमार आखिरी वक्त में बेटे के नाम पर असहमति वापस लेकर अपने उसूलों से समझौता कर चुके हैं.
2015 के बिहार चुनाव में नीतीश कुमार ने कई बार कबीर का एक दोहा दोहराया था, 'धीरे-धीरे रे मना, धीरे सब कुछ होय, माली सींचे सौ घड़ा, ऋतु आए फल होय.' और, 2020 के बिहार विधानसभा चुनावों की आखिरी रैली में नीतीश कुमार ने कहा था, 'अंत भला तो सब भला' - लेकिन आज की तारीख में ऐसा न तो शरद पवार के साथ हो रहा है, न ही नीतीश कुमार के साथ.