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वो क्या ब्लैकमेलिंग थी? पूर्व वित्त सचिव गर्ग के कौन से ‘खुलासे’ से बौखला गए निशिकांत दुबे

पूर्व वित्त सचिव सुभाष चंद्र गर्ग ने एक पॉडकास्ट में भाजपा सांसद डॉ. निशिकांत दुबे पर जो आरोप लगाए, सोमवार को उसके पलटवार का दिन था. दुबे ने न सिर्फ अक्षम कहा, बल्कि उन पर आपराधिक मानहानि का दावा करने की भी बात कही. गर्ग ने दुबे पर ब्लैकमेलिंग और काम न करने पर झूठी शिकायतें करने के गंभीर आरोप लगाए थे. 

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पूर्व वित्त सचिव सुभाष गर्ग और भाजपा सांसद निशिकांत दुबे के बीच का घमासान अब चौराहे पर आ गया है.
पूर्व वित्त सचिव सुभाष गर्ग और भाजपा सांसद निशिकांत दुबे के बीच का घमासान अब चौराहे पर आ गया है.

राजनीति की गलियों में वार और पलटवार का दौर कभी थमता नहीं, लेकिन जब देश की नौकरशाही के शीर्ष पद पर रहे प्रशासनिक अधिकारी और सत्तारूढ़ दल के प्रभावशाली सांसद के बीच जुबानी जंग छिड़ जाए, तो मामला बेहद दिलचस्प हो जाता है. कुछ ऐसा ही नजारा इन दिनों पूर्व वित्त सचिव सुभाष चंद्र गर्ग और भारतीय जनता पार्टी के सांसद डॉ. निशिकांत दुबे के बीच छिड़ी जुबानी जंग के चलते दिखने को मिल रहा है. सुभाष गर्ग ने एक पॉडकास्ट के दौरान अपने कार्यकाल के कई ऐसे पन्ने खोले हैं, जिन्होंने सियासी हलकों में हलचल पैदा कर दी है.

सुभाष गर्ग सीधा कहते हैं कि ‘निशिकांत दुबे ब्लैकमेलिंग किस्म के आदमी हैं’. फिर वे एक कहानी बताते हैं. उनके मुताबिक, यह कहानी तब की है जब वे वित्त मंत्रालय में कार्यरत थे. उन्होंने बताया कि किस तरह सांसद निशिकांत दुबे एक बार उनके दफ्तर पहुंचे थे. गर्ग का दावा है कि दुबे ने उनसे LIC चेयरमैन के जरिए अपना एक काम करवाने की सिफारिश की थी. यह काम किसी के तबादले या कॉन्ट्रैक्ट से संबंधित था. हालांकि, जब गर्ग ने यह कहकर इनकार कर दिया कि LIC उनके विभाग के अंतर्गत नहीं आती और वे इस तरह के काम नहीं करते, तो माहौल में कड़वाहट आ गई. गर्ग का कहना है कि उन्होंने संसद सदस्य की उस अनुचित मांग को सिरे से खारिज कर दिया था.

कहानी में नया मोड़ तब आया जब मार्च 2018 में निशिकांत दुबे ने तत्कालीन सरकार को एक पत्र लिखा, जिसमें गर्ग को लेकर कई तरह की शिकायतें की गई थीं. गर्ग के अनुसार, सरकार ने उस वक्त उस पत्र पर कोई ध्यान नहीं दिया और उसे कचरे के डिब्बे में डाल दिया. इसके बाद गर्ग का तबादला जुलाई 2019 में हुआ, जो कि पत्र लिखे जाने के लगभग सवा साल बाद की बात थी. लेकिन इस पूरे घटनाक्रम के दौरान दोनों के बीच का तनाव अंदर ही अंदर सुलगता रहा.

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इस कड़वाहट का सबसे बड़ा और दिलचस्प नाटक संसद की एक स्थायी समिति की बैठक में देखने को मिला. उस समय 2018-19 का आम बजट पेश हुआ था और सरकार ने अपनी महत्वाकांक्षी 'आयुष्मान भारत' योजना का ऐलान किया था. चूंकि योजना पर फैसला अंतिम समय में हुआ था, इसलिए बजट में उसके लिए अलग से हेड यानी लाइन आइटम नहीं बनाया जा सका था. स्थायी समिति की बैठक में जब सांसदों ने इस बारे में सवाल पूछा, तो वित्त सचिव के रूप में मौजूद गर्ग ने पूरी ईमानदारी से अपनी बात रखी. उन्होंने स्वीकार किया कि निर्णय में देरी के कारण अलग हेड नहीं बन सका, लेकिन वैकल्पिक व्यवस्था के तहत राष्ट्रीय स्वास्थ्य बीमा योजना के फंड से काम चलाया जा रहा है.

गर्ग को लगा कि उनका जवाब बेहद ईमानदार और तथ्यात्मक था, लेकिन जैसे ही वे दफ्तर लौटे, महज दस मिनट के भीतर प्रधानमंत्री कार्यालय से नृपेंद्र मिश्रा का फोन आ गया. मिश्रा ने उनसे पूछा कि उन्होंने संसदीय समिति में यह क्यों कहा कि सरकार समय पर फैसले नहीं लेती. गर्ग यह सुनकर हैरान रह गए. जब उन्होंने पूछा कि यह शिकायत किसने की, तो पता चला कि निशिकांत दुबे सीधे पीएमओ पहुंचकर उनके बयान को तोड़-मरोड़कर शिकायत दर्ज करा आए थे. गर्ग का आरोप है कि निशिकांत दुबे ने उनके इनकार का बदला लेने और उन्हें नीचा दिखाने के लिए यह पूरा ताना-बाना बुना था.

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डॉ. निशिकांत दुबे का करारा पलटवार आपराधिक मानहानि की चेतावनी

सांसद निशिकांत दुबे ने सुभाष गर्ग के दावों को पूरी तरह से खारिज करते हुए उन पर तीखा हमला बोला. दुबे ने तंज कसते हुए कहा कि पूर्व वित्त सचिव पद से रातोंरात हटाए जाने के कारण 'बोरा गए हैं' यानी अपना मानसिक संतुलन खो बैठे हैं. उन्होंने कहा कि अज्ञानता और अक्षमता के चलते ही सरकार ने उन्हें रातोंरात पद से हटा दिया था.

सांसद ने अपने 2018 के पत्र का हवाला देते हुए कहा कि उन्होंने तत्कालीन वित्त सचिव के कामकाज और रवैये को लेकर बहुत पहले ही सरकार और प्रधानमंत्री को आगाह कर दिया था. दुबे का कहना है कि उनकी चिट्ठी कोई काल्पनिक बात नहीं थी, बल्कि उसमें अधिकारी की कार्यशैली पर गंभीर सवाल उठाए गए थे. उन्होंने दावा किया कि गर्ग अब अपनी नाकामी और पद से हटाए जाने की खीझ मिटाने के लिए उन पर अनर्गल आरोप लगा रहे हैं.

इस तरह एक ओर जहां पूर्व वित्त सचिव इसे एक सांसद की ब्लैकमेलिंग और निजी खुन्नस बता रहे हैं, वहीं दूसरी ओर सांसद निशिकांत दुबे इसे एक बर्खास्त या हटाए गए अयोग्य अफसर का विलाप करार दे रहे हैं. दोनों ओर से जारी इस तीखी जंग ने एक बार फिर नौकरशाही और नेताओं के बीच के उस गुप्त और जटिल रिश्ते को चौराहे पर लाकर खड़ा कर दिया है, जो अमूमन बंद कमरों तक ही सीमित रहता है.

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