सोशल मीडिया के गलियारों में आज एक नाम तैर रहा है- मौलाना अबुल कलाम आजाद. स्वतंत्र भारत के पहले शिक्षा मंत्री. भारत रत्न भी. जिन्हें स्वतंत्रता संग्राम में हिंदू-मुस्लिम एकता के प्रतीक के तौर पर पेश किया गया. लेकिन इतिहास का पहिया जब पीछे घूमता है, तो वही आजाद एक बिल्कुल अलग रूप में सामने आते हैं.
हाल ही में JNU प्रोफेसर और लेखक आनंद रंगनाथन ने मौलाना आजाद के साल 1914 में दिए गए एक भाषण का जिक्र किया. भाषण की भाषा और उसका तेवर किसी भी आधुनिक मजहबी कट्टरपंथी की याद दिलाने वाले थे. इस पर गीतकार जावेद अख्तर ने एतराज जताया और भाषण का सोर्स मांग लिया. बस फिर क्या था, सोशल मीडिया पर बहस छिड़ गई और इतिहास की धूल जम चुकी परतें एक-एक करके उघड़ने लगीं.
इतिहास की सबसे बड़ी खूबी, या यूं कहें कि खामी, यही है कि वह कभी एक जैसा नहीं रहता. हमें स्कूली किताबों में जिस आजाद को एक धर्मनिरपेक्ष, सहिष्णु और राष्ट्रवादी नेता के रूप में पढ़ाया गया, उनका एक दौर ऐसा भी था जब उनकी तकरीरें किसी कट्टरपंथी मजहबी जुनून से भरी हुई थीं. 1910 के दशक में, जब ओटोमन साम्राज्य अपनी आखिरी सांसें ले रहा था, तब मौलाना आजाद भारत के मुसलमानों के दिलों में खिलाफत और पैन-इस्लामिज्म (वैश्विक इस्लाम) की आग भड़का रहे थे.
जब नाम में जुड़ा 'गुलाम' और दिल में बसी मक्का की फिज़ा
मौलाना आजाद की शुरुआती जिंदगी पर नजर डालें तो उनके विचार अपने-आप समझ में आने लगते हैं. उनका जन्म 1888 में मक्का में हुआ था. जो उस समय ओटोमन साम्राज्य का हिस्सा था. उनका असली नाम अबुल कलाम गुलाम मुहियुद्दीन था. उनके पिता एक रूढ़िवादी इस्लामिक विद्वान थे. आजाद ने पारंपरिक दीनी तालीम हासिल की और बहुत कम उम्र में ही इस्लामिक ग्रंथों के गहन जानकार बन गए. कहा जाता है कि वे 13 साल की उम्र में अपने से दोगुनी उम्र के लोगों को इस्लाम की बारीकियां पढ़ा रहे थे.
दीनी तालीम की इसी गहराई ने उन्हें 'मौलाना' बनाया. जब वे महज 25-26 साल के नौजवान थे, तब तक वे उर्दू पत्रकारिता और अपनी जोशीली तकरीरों (भाषणों) के जरिए मुस्लिम समुदाय पर अपनी छाप छोड़ चुके थे. उन्होंने 'अल-हिलाल' नाम से एक अखबार शुरू किया, जो कहने को तो ब्रिटिश हुकूमत के खिलाफ था, लेकिन उसका मूल संदेश इस्लामिक पहचान और दुनिया भर के मुसलमानों को एक धागे में पिरोने का था.
1914 का वह भाषण: जब आजाद ने दिए कट्टरपंथ के तर्क
पूर्व बीबीसी पत्रकार तुफैल अहमद ने मौलाना आजाद पर प्रकाशित अपने विश्लेषण "Global Islamism, jihadism and Maulana Abul Kalam Azad, my defence lawyer" में आजाद के उस दौर के बयानों और भाषणों का ब्योरा दिया है.
27 अक्टूबर 1914 को कोलकाता (तब कलकत्ता) में मुसलमानों के एक बड़े जलसे को संबोधित करते हुए 26 साल के मौलाना आजाद ने जो कहा, वह आज के दौर के किसी उग्रवादी संगठन के भाषण जैसा ही लगता है. उस समय प्रथम विश्वयुद्ध छिड़ चुका था और ओटोमन साम्राज्य (तुर्की) ब्रिटेन के खिलाफ मैदान में था.
मौलाना आजाद ने भारतीय मुसलमानों को तुर्की के ओटोमन खलीफा के प्रति वफादार रहने की हिदायत देते हुए कहा था:
"अगर इस्लाम की आत्मा का एक तिनका भी उसके मानने वालों के अंदर जिंदा है, तो मैं कहूंगा कि अगर युद्ध के मैदान में किसी तुर्क के पैर में एक कांटा भी चुभता है, तो इस्लाम के खुदा की कसम, भारत का कोई भी मुसलमान तब तक सच्चा मुसलमान नहीं हो सकता जब तक कि वह उस दर्द को महसूस न करे."
यह भाषण केवल सहानुभूति तक सीमित नहीं था. आजाद ने मुसलमानों को ग्लोबल इस्लाम (Pan-Islamism) से जोड़ते हुए दोस्ती और दुश्मनी का नया पैमाना तय कर दिया था. उन्होंने अपने भाषण में स्पष्ट कहा:
"भारतीय मुसलमानों को ओटोमन खिलाफत को अपने दिलों में एक पाक दीनी रिश्ते की तरह संजोकर रखना चाहिए. दुनिया की जिस भी सरकार से तुर्की की दुश्मनी है, उसे इस्लाम का दुश्मन समझें और जो तुर्की का दोस्त है, उसे इस्लाम का दोस्त समझें, क्योंकि हमारी दोस्ती और दुश्मनी किसी व्यक्तिगत स्वार्थ के लिए नहीं, बल्कि खुदा के लिए है."
जिहाद, कुर्बानी और 'सौदा': आजाद के ही शब्दों में
मौलाना आजाद ने केवल खलीफा की रक्षा का आह्वान ही नहीं किया, बल्कि उन्होंने 'जिहाद' की ऐसी व्याख्या की जो आज के इस्लामिक कट्टरपंथ में भी दिखाई देती है. अपने भाषणों में उन्होंने यह बात साफ तौर पर रखी कि एक मुसलमान की जान और माल पर उसका अपना हक नहीं है, वह सब अल्लाह के नाम पर बिक चुका है.
आजाद के शब्दों में- "जिस दिन हमने यह स्वीकार किया कि हम मुसलमान हैं, उसी दिन हमने यह भी स्वीकार कर लिया कि हमारी जिंदगी इस्लाम के हाथ बिक चुकी है. इस्लाम का मतलब ही यही है कि हम अपना सिर केवल एक ईश्वर के आगे झुका दें, अब यह उसकी मर्जी है कि वह हमारे सिर को दोस्तों की गोद में रखे या दुश्मनों की तलवार के नीचे."
जिहाद में जान और माल की कुर्बानी को वाजिब ठहराते हुए आजाद ने आगे कहा था:
"इसके लिए पहला जिहाद माल का जिहाद (वित्तीय मदद) है और इसके बाद अगर जरूरत पड़े तो जान और शरीर का जिहाद है..."
इतना ही नहीं, इंसानी जान की कुर्बानी को सही ठहराने के लिए उन्होंने हजरत इब्राहिम द्वारा अपने बेटे की कुर्बानी की मिसाल भी दी थी.
खिलाफत आंदोलन और भारतीय मुसलमानों का पलायन
1910 से 1920 के दशक के बीच मौलाना आजाद की इन तूफानी तकरीरों और 'अल-हिलाल' के लेखों ने भारतीय मुस्लिम युवाओं के मन में खिलाफत के प्रति एक जुनूनी लगाव पैदा कर दिया था. जब ब्रिटिश हुकूमत ने प्रथम विश्वयुद्ध के बाद तुर्की के खलीफा को पद से हटाने की तैयारी की, तो भारत में 'खिलाफत आंदोलन' शुरू हुआ.
मौलाना आजाद इस आंदोलन के सबसे बड़े रणनीतिकार और झंडाबरदार थे. उनकी इस वैचारिक अपील का असर इतना गहरा हुआ कि हजारों भारतीय मुसलमानों ने भारत को 'दारुल हरब' (काफिरों की भूमि) मानकर तुर्की और अफगानिस्तान की ओर 'हिजरत' (पलायन) करना शुरू कर दिया, ताकि वे खलीफा के समर्थन में जंग लड़ सकें.
ऐतिहासिक विरोधाभास: कट्टरपंथी 'मौलाना' से राष्ट्रवादी 'आजाद' तक
इतिहास में मौलाना आजाद का यह रूप अक्सर छिपा दिया जाता है या उसे नजरअंदाज कर दिया जाता है. लेकिन सवाल यह उठता है कि क्या मौलाना आजाद जीवन भर इसी विचारधारा पर कायम रहे?
नहीं, यहीं से मौलाना आजाद का दूसरा पहलू शुरू होता है. 1920 के दशक के मध्य में जब तुर्की के महान नेता मुस्तफा कमाल अतातुर्क ने तुर्की को एक धर्मनिरपेक्ष राष्ट्र घोषित कर दिया और खलीफा के पद को पूरी तरह खत्म कर दिया, तब जाकर भारत में खिलाफत आंदोलन का गुब्बारा फूटा.
इसके बाद मौलाना आजाद के विचारों में एक बड़ा बदलाव देखा गया. वे महात्मा गांधी के करीब आए, जो खिलाफत आंदोलन में मुसलमानों का समर्थन कर रहे थे. मौलाना एक्टिव हुए, और जल्द ही भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के अग्रणी नेताओं में शामिल हो गए. वे 1923 में महज 35 साल की उम्र में कांग्रेस के सबसे युवा अध्यक्ष बने. आगे चलकर उन्होंने मोहम्मद अली जिन्ना के 'टू नेशन थ्योरी' का खुलकर विरोध किया और विभाजन के खिलाफ चट्टान बनकर खड़े रहे.
हालांकि, कहा तो ये भी जाता है कि मौलाना आजाद का विभाजन विरोध इस बात को लेकर ज्यादा था कि वे भारतीय भू-भाग में मुसलमानों का विभाजन नहीं चाहते थे. यह वही दलील है जो बंटवारे से देवबंद ने दी थी. कि यदि मुसलमान पाकिस्तान चले गए, तो भारत में मौजूद इस्लामिक धरोहरों का क्या होगा?
सवाल जो आज भी पूछे जा रहे हैं
सोशल मीडिया पर जब आनंद रंगनाथन ने मौलाना आजाद के 1914 के भाषणों को कोट किया, तो इसने भारतीय इतिहास के एक बहुत बड़े विरोधाभास को सतह पर ला खड़ा किया.
सोशल मीडिया पर छिड़ी बहस सिर्फ दो हस्तियों की जुबानी जंग नहीं है, बल्कि यह इस बात की पड़ताल है कि इतिहास के जिन नायकों को हमने पूरी तरह एक रंग से पेंट किया है, उन्होंने अपनी अतीत में कई रंग बदले हैं.
मौलाना आजाद का सफर एक कट्टरपंथी 'मौलाना' से शुरू होकर एक 'धर्मनिरपेक्ष राष्ट्रवादी' पर खत्म जरूर हुआ, लेकिन उनके अतीत के ये भाषण आज भी इतिहास प्रेमियों और विश्लेषकों के सामने कई अनसुलझे सवाल छोड़ जाते हैं.