तृणमूल कांग्रेस को जनता ने पश्चिम बंगाल चुनाव में खारिज कर दिया. और, अब टीएमसी नेता जगह जगह लोगों के गुस्से का शिकार हो रहे हैं. चुनाव बाद हुई हिंसा में मारे गए टीएमसी कार्यकर्ता के परिवार से मिलने जा रहे अभिषेक बनर्जी खुद शिकार हो जाते हैं. कल्याण बनर्जी और कई नेताओं को ऐसी स्थिति फेस करनी पड़ रही है, जिसके बारे में वे सोचे नहीं होंगे.
ममता बनर्जी और तृणमूल कांग्रेस का आरोप है कि उनके नेताओं पर हमले बीजेपी के लोग कर रहे हैं. ऐसे आरोपों को खारिज करते हुए बीजेपी पलटवार कर रही है कि लोगों का गुस्सा बाहर आ रहा है. यह भी है कि टीएमसी के जो नेता केंद्रीय सुरक्षा बलों पर बीजेपी के लिए काम करने का आरोप लगा रहे थे, अभिषेक बनर्जी को बचाने के लिए आभार जता रहे हैं.
और इसी बीच, टीएमसी के 80 में से 60 विधायकों का ममता बनर्जी की बैठक में न पहुंचना, बेहद गंभीर स्थिति की तरफ इशारा कर रहा है. और, ऐसा पहली बार नहीं हुआ है. चुनाव के बाद बुलाई गई एक मीटिंग में 35 विधायक पहुंचे ही नहीं थे.
बताया तो यही जा रहा है डायमंड हार्बर सांसद अभिषेक बनर्जी पर हुए हमले के खिलाफ विरोध प्रदर्शन की तैयारी में विधायक व्यस्त हैं, जिसकी वजह से वे मीटिंग में नहीं पहुंच सके. 2 जून को तृणमूल कांग्रेस नेता ममता बनर्जी भी कोलकाता में रानी रश्मोनी रोड पर धरना देने जा रही हैं.
विधायकों की गैर मौजूदगी का मामला गंभीर है
ममता बनर्जी का कालीघाट आवास कभी सबसे बड़ा पावर सेंटर हुआ करता था. तृणमूल कांग्रेस विधायक दल के नेता शोभनदेव चट्टोपाध्याय ने रविवार (31 मई) को दोपहर 3 बजे विधायकों की बैठक वहीं बुलाई थी. लेकिन, टीएमसी के 80 में से 20 विधायक ही वहां पहुंचे. जब ज्यादातर विधायक नहीं पहुंचे तो बैठक को टाल देना पड़ा.
सूत्रों के हवाले से आई रिपोर्ट के मुताबिक, बैठक का मकसद पश्चिम बंगाल चुनाव में मिली हार और अभिषेक बनर्जी पर हुए हमले के बाद की स्थिति की समीक्षा करना था. जब बैठक शुरू करने का वक्त हुआ, तब तक महज 20 विधायक ही मौजूद थे. बैठक में नहीं पहुंचे विधायकों से संपर्क करने की कोशिश हुई, लेकिन नेटवर्क के बाहर पाए गए.
पार्टी के बचाव में टीएमसी प्रवक्ता कुणाल घोष सामने आए. बोले, 'टीएमसी के राष्ट्रीय महासचिव अभिषेक बनर्जी और सांसद कल्याण बनर्जी पर हुए हमलों के विरोध में 1 जून को राज्यभर में प्रदर्शन होना है... सभी विधायक उसकी तैयारी में व्यस्त थे... जो विधायक नहीं पहुंचे, उन्होंने पहले ही इसकी जानकारी दे दी थी.
सवाल तृणमूल कांग्रेस का है, फिर बात तो पार्टी प्रवक्ता की ही मानी जाएगी. लेकिन, बात बेदम नहीं होनी चाहिए. अगर विधायक तैयारियों में थे, तो मीटिंग बुलाई ही क्यों गई थी. 20 विधायक तो पहुंचे ही थे, मीटिंग तो उनके साथ भी हो सकती थी, अगर पहले से ही पता था कि बाकी विधायक तैयारियों में व्यस्त हैं. अगर सबकुछ पहले से पता था, विधायकों ने भी बता ही दिया था, तो मीटिंग पहले ही क्यों नहीं टाल दी गई.
तृणमूल कांग्रेस के एक कार्यक्रम 20 मई को भी ऐसा ही हुआ था. कोलकाता में चुनाव बाद हिंसा और हॉकर्स को हटाने के अभियानों के खिलाफ टीएमसी विधायकों का धरना था. चुनावी हार के बाद तृणमूल कांग्रेस का यह पहला बड़ा विरोध प्रदर्शन था, लेकिन मौके पर केवल 35 विधायक ही पहुंचे थे.
बगावत, विरोध और बयानबाजी
कालीघाट की बैठक में फिरहाद हकीम, नयना बंदोपाध्याय, मदन मित्रा, आशिमा पात्रा और कुणाल घोष जैसे नेता जरूर मौजूद थे, लेकिन बाकी नहीं. ये नेता ममता बनर्जी के करीबी माने जाते हैं, और कई तरह की जिम्मेदारियां संभालते हैं. सुखेंदु शेखर रॉय जैसे नेता भी हैं, जिनकी बातें ममता बनर्जी को परेशान तो करती ही हैं, आगे की मुसीबतों का भी साफ संकेत देती हैं.
तृणमूल कांग्रेस नेताओं की बयानबाजी, पार्टी के भीतर घोर असंतोष, विधायकों की बगावत, कार्यक्रमों और बैठकों का बॉयकॉट - एक साथ उभर रही ये तमाम मुश्किलें टीएमसी नेतृत्व के सामने हर लेवल की चुनौती पेश कर रही हैं, और कभी कभी तो ऐसा लगता है जैसे अभिषेक बनर्जी के बचाव में ममता बनर्जी को मुसीबतें झेलनी पड़ रही हैं.
एक मीडिया रिपोर्ट में लिखा गया है, 'अभिषेक बनर्जी पर कुछ अज्ञात लोगों ने पत्थर, जूते और अंडे फेंके. कुछ लोगों ने उन्हें मारने-पीटने की भी कोशिश की. इस दौरान भीड़ 'चोर-चोर' चिल्ला रही थी.'
भीड़ तो भीड़ होती है. महत्वपूर्ण ये है कि भीड़ में लोग कौन हैं? क्या भीड़ में सिर्फ बीजेपी समर्थक थे? क्या भीड़ में आम लोग थे? या भीड़ में वे आम लोग थे, जो तृणमूल कांग्रेस के सत्ता से बेदखल होने के बाद ऐसे मौके की तलाश में थे?
अभिषेक बनर्जी और कल्याण बनर्जी को निशाना बनाए जाने को लेकर बीजेपी और तृणमूल कांग्रेस के अपने अपने दावे हैं. हमले के आरोप में 5 लोगों को गिरफ्तार किया गया है. पुलिस का कहना है कि पांच में से तीन तो तृणमूल कांग्रेस के नेताओं के ही जानने वाले हैं.
तृणमूल कांग्रेस नेतृत्व के खिलाफ चुनाव नतीजे आने के बाद बगावत भरी आवाजें लगातार सुनी जा रही हैं. पूर्व मंत्री कृष्णेंदु नारायण चौधरी तो चुनाव में टीएमसी की हार के लिए सीधे सीधे राष्ट्रीय महासचिव अभिषेक बनर्जी को जिम्मेदार ठहरा चुके हैं. ममता बनर्जी भी उनके निशाने पर हैं. महाभारत की मिसाल देते हुए कृष्णेंदु चौधरी कह चुके हैं कि ममता बनर्जी उनको 'धृतराष्ट्र' के रोल में नजर आईं, सब कुछ देखते हुए भी अनदेखा किया.
अभिषेक बनर्जी की कार्यशैली पर टीएमसी नेता आतिन घोष ने मीडिया से एक इंटरव्यू में कहा, अभिषेक बनर्जी आधुनिक नेता हैं... पार्टी को संगठित करने के लिए आधुनिक तकनीक की मदद ली है. लेकिन, आधुनिक तकनीक टीएमसी के साथ लोगों की नब्ज को नहीं समझ सकती.
सीनियर टीएमसी नेता असित मजूमदार नेतृत्व के एक हिस्से पर (आशय अभिषेक बनर्जी से है) अहंकार और प्रशासनिक निष्क्रियता का आरोप लगा चुके हैं. उनका कहना है, गुटबाजी के कारण शासन और विकास परियोजनाएं ठप हो गईं, और नतीजा सामने है.
पूर्व विधायक खगेश्वर रॉय तो मीडिया के सामने आकर टिकट के बदले पैसे मांगे जाने का भी आरोप लगा चुके हैं. अपना उदाहरण देते हुए खगेश्वर राय ने एक बार कहा था कि उम्मीदवार बनने की दौड़ में वह पैसे से हार गए.
अकेली पड़ती ममता बनर्जी
20 मई को टीएमसी सांसद काकोली घोष ने नेतृत्व से नाराज होकर बारासात जिलाध्यक्ष के पद से इस्तीफा दिया, और उसके बाद तृणमूल कांग्रेस के सभी पदों से इस्तीफा दे दिया था. काकोली घोष अपनी जगह कल्याण बनर्जी को लोकसभा में टीएमसी का नेता बनाए जाने से नाराज थीं. और, विरोध में वो मुख्यमंत्री शुभेंदु अधिकारी की प्रशासनिक बैठक में इलाके के टीएमसी विधायकों के साथ पहुंच गईं.
अपने इस्तीफे में काकोली घोष ने शिक्षक भर्ती घोटाला, भ्रष्टाचार, जेल विवाद और आरजी कर मेडिकल कॉलेज में ट्रेनी डॉक्टर के साथ गैंगरेप और हत्या मामलों का विशेष तौर पर जिक्र किया था. चुनाव कैंपेन में I-PAC के बढ़ते दखल पर सवाल उठाते हुए काकोली घोष ने कहा था, पार्टी में अनिर्वाचित लोगों का प्रभाव बढ़ रहा है, जिससे संगठन का काम प्रभावित हो रहा है.
रिपोर्ट के मुताबिक, फालता चुनाव का नतीजा आने के बाद से उत्तर और दक्षिण 24 परगना जिलों की सात नगरपालिकाओं से 100 से ज्यादा पार्षदों ने इस्तीफा दे दिया है, जिनमें अभिषेक बनर्जी के संसदीय क्षेत्र डायमंड हार्बर नगरपालिका भी शामिल है. फालता चुनाव में तो अभिषेक बनर्जी के करीबी और टीएमसी उम्मीदवार जहांगीर खान ने तो वोटिंग से ठीक पहले चुनाव लड़ने से ही मना कर दिया था.
बीजेपी नेता सौमित्र खान ने दावा किया था कि तृणमूल कांग्रेस के करीब 20 सांसद पार्टी के संपर्क में हैं, और विधायक भी. सौमित्र खान ने कहा था कि अगर बीजेपी चाहे तो कुछ दिनों में टीएमसी पूरी तरह खत्म हो सकती है. सौमित्र खान के दावे को खारिज करते हुए TMC सांसद सौगत रॉय का कहना था, बीजेपी और सौमित्र खान जो बातें फैला रहे हैं, वे पूरी तरह झूठी और बेबुनियाद हैं. ऐसा कुछ नहीं होने वाला है.
ममता बनर्जी खुद को स्ट्रीट फाइटर बताती हैं. लिहाजा प्रतिकूल परिस्थितियों में भी लड़ रही हैं. ममता बनर्जी ने पार्टी कार्यकर्ताओं से संगठन को नए सिरे से खड़ा करने की अपील की है. कहती हैं, हम पार्टी दफ्तरों को दोबारा खोलेंगे, रंगेंगे और मजबूती से काम पर लौटेंगे... जरूरत पड़ी तो मैं खुद भी दफ्तरों को पेंट करने के लिए तैयार हूं.
लगे हाथ बागियों को साफ तौर पर चेतावनी भी देती हैं, जो लोग दूसरी पार्टियों में जाना चाहते हैं, वे पूरी तरह आजाद हैं. कहती हैं कि वो किसी को भी जबरदस्ती रोक कर रखने में यकीन नहीं रखतीं. राहुल गांधी भी कई बार ऐसी बातें कर चुके हैं. तृणमूल कांग्रेस भी कांग्रेस से टूट कर बनी थी. जो हालात हैं, तृणमूल कांग्रेस के भी टूट जाने की आशंका जताई जाने लगी है.