राम मंदिर उद्घाटन समारोह का विरोध कर ममता बनर्जी ने बड़ी ही मोटी राजनीतिक रेखा खींच दी है, और ईश्वर-अल्लाह की कसम खाकर जो कुछ भी कहा है, सिर्फ कांग्रेस नेतृत्व ही नहीं, अखिलेश यादव जैसे नेताओं की राजनीतिक को तो जैसे चौराहे पर ही ला दिया है.
मंदिर मुद्दे पर ममता बनर्जी का स्टैंड INDIA ब्लॉक के उन सभी नेताओं को गले की फांस नजर आ रहा होगा, जो मौका आने पर 'सरप्राइज' देने या 'न्योता' मिलने पर जरूर पहुंचने के वादे कर रहे थे - ममता बनर्जी के साफ साफ लकीर खींच देने के बाद तो विपक्षी खेमे के सभी नेताओं को अपना रुख साफ करना ही होगा.
अयोध्या को लेकर अब न तो कोई गुगली चलेगी, और न ही किसी और तरह की चालाकी - ये तो ऐसा लगता है जैसे कांग्रेस जैसी पार्टियों को बीजेपी कठघरे में खड़ा कर पूछती है, बताओ इधर हो कि उधर... वास्तव में हो किस तरफ. ममता बनर्जी का स्टैंड भी बिलकुल ऐसा ही है.
22 जनवरी को होने जा रहे राम मंदिर उद्घाटन समारोह में शामिल होने के मुद्दे पर ममता बनर्जी ने INDIA ब्लॉक के नेताओं को पसोपेश में डाल दिया है कि वे देश के मुस्लिम समुदाय को बतायें कि हिंदुत्व की राजनीति में किस मोड़ पर खड़े हैं?
राम मंदिर उद्घाटन समारोह का बहिष्कार
कहने को तो सीपीएम महासचिव सीताराम येचुरी ने सबसे पहले राम मंदिर उद्घाटन समारोह के बहिष्कार का बिगुल बजाया था, लेकिन उनके मुंह से ममता बनर्जी की तरह ईश्वर और अल्लाह की कसम खाने जैसी कोई बात नहीं सुनने को मिली थी. सीताराम येचुरी ने उद्घाटन समारोह को धर्म के नाम पर राजनीतिक समारोह बता कर न्योता अस्वीकार कर दिया था.
पश्चिम बंगाल के जयनगर में ममता बनर्जी ने कहा, 'मुझसे राम मंदिर को लेकर पूछा गया था... मैं उस तरह के उत्सव में यकीन रखती हूं, जो सबको साथ लेकर चलता है.' बीजेपी को टारगेट करते हुए ममता बनर्जी ने कहा है, 'आपको जो करना है करिये... आप चुनाव से पहले नौटंकी कर रहे हैं... मुझे कोई दिक्कत नहीं है, लेकिन दूसरे समुदाय के लोगों की अवहेलना करना सही नहीं है.'
और फिर ममता बनर्जी ने अपने अंदाज में ऐलान-ए-जंग भी किया, 'मैं ईश्वर और अल्लाह की कसम खाकर कहती हूं... जब तक मैं रहूंगी तब तक कभी हिंदू और मुसलमान में भेदभाव करने नहीं दूंगी... मैं लोगों को धार्मिक आधार पर बांटने में विश्वास नहीं रखती.'
ममता बनर्जी की ये बातें सीताराम येचुरी से भी अलग हैं, और न तो कांग्रेस महासचिव केसी वेणुगोपाल जैसी हैं, न ही समाजवादी पार्टी के नेता अखिलेश यादव जैसी. पहले तो अखिलेश यादव ने जो कहा था वो तो सही राजनीतिक बयान भी लग रहा था, लेकिन न्योता को लेकर अब जो कुछ किया है, वो तो समाजवादी पार्टी के वोटर के लिए भी हजम करना मुश्किल हो सकता है - लेकिन ममता बनर्जी का स्टैंड तो सीधे सीधे राम मंदिर उद्घाटन समारोह का बहिष्कार ही माना जाएगा.
राम मंदिर का भी 'जय श्रीराम' जैसा विरोध
ममता बनर्जी ने अब पूरी तरह साफ कर दिया है कि उनकी नजर में राम मंदिर निर्माण और 'जय श्रीराम' के नारे लगाने में किसी तरह का कोई फर्क नहीं है. ऐसे कई मौके आये हैं जब ममता बनर्जी ने 'जय श्रीराम' के नारे को पॉलिटिकल स्लोगन कह कर कड़ा विरोध जताया है.
ममता बनर्जी शुरू से ही जय श्रीराम के नारे की विरोधी रही हैं. पहले तो यहां तक देखा गया है कि रास्ते में अगर कहीं कोई जय श्रीराम का नारा लगाने लगे तो गाड़ी से उतर कर सख्त लहजे में रिएक्ट करती हैं. पश्चिम बंगाल में तो ये कई बार देखा जा चुका है, बनारस में तो ऐसा करने वालों को ममता बनर्जी ने हमलावर ही बता डाला था.
ठीक वैसे ही, नेताजी सुभाष चंद्र बोस के स्मृति में आयोजित एक कार्यक्रम में जब कुछ बीजेपी कार्यकर्ता जय श्रीराम के नारे लगाने लगे तो भी ममता बनर्जी ने नाराजगी जाहिर की. ये पश्चिम बंगाल के पिछले विधानसभा चुनाव से पहले का वाकया है. हालांकि, तब पश्चिम बंगाल की संघ यूनिट को भी ये रास नहीं आया था, क्योंकि वो कार्यक्रम सरकारी था. मंच पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी भी मौजूद थे, लिहाजा ममता बनर्जी ने कार्यक्रम छोड़ कर तो नहीं गईं, लेकिन भाषण देने को तैयार नहीं हुईं.
राम मंदिर उद्घाटन समारोह के मामले में ममता बनर्जी के ताजा बयान से साफ है कि वो हिंदुत्व की राजनीति में INDIA ब्लॉक के बाकी नेताओं की तरह बीच का रास्ता नहीं अपनाने जा रही हैं - और ऐसा करके बाकी नेताओं को भी चुनौती दे डाली है कि वे साफ करें कि इस पार हैं या उस पार.
ममता बनर्जी ने बढ़ाई गांधी परिवार और अखिलेश यादव की मुश्किल
सीताराम येचुरी की तरह उद्धव ठाकरे की शिवसेना के नेता संजय राउत ने भी 22 जनवरी के समारोह में जाने से पहले ही इनकार कर दिया था. संजय राउत का कहना था, 'ये पूरी तरह राजनीति है... बीजेपी के समारोह में भला कौन शामिल होना चाहता है? ये कोई देश का कार्यक्रम नहीं है... ये बीजेपी की रैली है.' साथ ही, संजय राउत का कहना था कि वे लोग अयोध्या तो जाएंगे, लेकिन तब जब बीजेपी का कार्यक्रम खत्म हो जाएगा.
और कांग्रेस नेता शशि थरूर ने तो राम मंदिर उद्घाटन समारोह की राजनीति व्याख्या ही कर डाली है, 'अगर आप जाते हैं तो समझा जाएगा कि बीजेपी के हाथों में खेल रहे हैं... अगर नहीं जाते हैं तो आपको हिंदू विरोधी बताया जाएगा.'
शशि थरूर का कहना है कि लोगों को निजी तौर पर बुलाया गया है, ऐसे में उनको खुद फैसला लेना चाहिये. जो ठीक समझता है वो जाये... किसी राजनीतिक कार्यक्रम में नहीं जाने से कोई हिंदू विरोधी नहीं हो जाता.'
लेकिन सोनिया गांधी, मल्लिकार्जुन खरगे और अधीर रंजन चौधरी जैसे कांग्रेस नेताओं के अयोध्या जाने के मामले में केसी वेणुगोपाल कह चुके हैं कि मौका आने पर सभी आश्चर्यचकित रह जाएंगे - अभी तक कांग्रेस का रुख इससे ज्यादा सामने नहीं आया है. वैसे बीच में ये खबर भी आई थी कि कांग्रेस नेताओं को अयोध्या जाने से परहेज तो नहीं है, लेकिन 22 जनवरी के कार्यक्रम में वे दूरी बनाने के बारे में सोच रहे हैं. मान कर चलना चाहिये, ममता बनर्जी के ताजा बयान के बाद कांग्रेस नेतृत्व इस मुद्दे पर नये सिरे से विचार करेगा.
समाजवादी पार्टी भी अभी INDIA ब्लॉक के साथ ही है, लेकिन राम मंदिर के मुद्दे पर उसका रुख बदलता रहा है. अखिलेश यादव की ही तरह उनकी पत्नी और मैनपुरी सांसद डिंपल यादव का बयान आया था कि न्योता मिलेगा तो निश्चित तौर पर जाएंगे. डिंपल यादव ने ये भी कहा कि अगर न्योता नहीं मिला तो बाद में जाएंगे. अखिलेश यादव पहले भी कह चुके हैं कि राम मंदिर बन जाने के बाद वो पूरे परिवार के साथ अयोध्या दर्शन के लिए जाएंगे.
विश्व हिंदू परिषद की तरफ से अखिलेश यादव को न्योता दिये जाने की बात सामने आने के बाद समाजवादी नेता ने अलग ही रुख अपना लिया है. पता चला है कि अखिलेश यादव ने न्योता स्वीकार ही नहीं किया है. बताते हैं कि अखिलेश यादव को वीएचपी की तरफ से आलोक कुमार न्योता देने गये थे, लेकिन वो लेने से मना कर दिये.
खबर है कि निमंत्रण देने गये शख्स के बारे में अखिलेश यादव ने ये कहते हुए न्योता स्वीकार नहीं किया कि वो उनको नहीं जानते. अखिलेश यादव का कहना है कि जिन्हें वो नहीं जानते, उनको न निमंत्रण देते हैं, न निमंत्रण लेते हैं.
अखिलेश यादव को निजी तौर पर ही नहीं राजनीति रूप से ही पूरा अधिकार है कि न्योता स्वीकार करें या न करें. अखिलेश यादव बेशक यूपी के मुख्यमंत्री रह चुके हैं, लेकिन जो व्यक्ति निमंत्रण देने गया था, वो भी सार्वजनिक जीवन में ही है. अखिलेश यादव का ये रवैया राजनीतिक रूप से अपरिपक्व ही नहीं, बचकाना लगता है.
ऐसा तो है नहीं कि अखिलेश यादव अपने चुनाव क्षेत्र के सभी लोगों को निजी तौर पर जानते होंगे. फर्ज कीजिये आजमगढ़ का कोई व्यक्ति किसी कार्यक्रम के लिए न्योता लेकर अखिलेश यादव के पास पहुंचता है, तो क्या उसे भी बैरंग लौटा देंगे?
ऐसे देखें तो ममता बनर्जी ने अखिलेश यादव जैसे नेताओं को काफी पीछे छोड़ दिया है. ममता बनर्जी ने डंके की चोट पर पॉलिटिकल स्टैंड लिया है. ममता बनर्जी ने अपनी सधी हुई एक ही राजनीतिक चाल में विपक्षी खेमे के ज्यादातर दलों को फंसाने के साथ ही, बीजेपी को टारगेट किया है. आपको याद होगा, 2021 के पश्चिम बंगाल चुनाव के बाद बीजेपी अध्यक्ष जेपी नड्डा ने हार की समीक्षा के लिए नेताओं की एक मीटिंग बुलाई थी. मीटिंग में सभी ने माना कि पश्चिम बंगाल में मुस्लिम वोटों के ध्रुवीकरण से बीजेपी को तमाम कोशिशों के बावजूद शिकस्त झेलनी पड़ी.
ममता बनर्जी ने अपनी चाल चल दी है, और ये चाल काफी हद तक पश्चिम बंगाल में लोक सभा चुनावों को लेकर ही है. बीजेपी ने जिसे बंगाल की हार का कारण माना था, ममता बनर्जी ने एक बार फिर से 'खेला' करने की कोशिश की है. किसी को ताज्जुब नहीं होना चाहिये, बीजेपी पर वोटों के ध्रुवीकरण का इल्जाम लगाने वाली ममता बनर्जी ने खुद भी वैसा ही कर डाला है. 2019 के चुनाव में बीजेपी के 18 संसदीय सीटें झटक लेने के बाद ममता बनर्जी तृणमूल कांग्रेस के हिस्से में 22 सीटें ही बचा पाई थीं. 2024 की लड़ाई तो और भी मुश्किल होने जा रही है. बीजेपी को ममता बनर्जी से विधानसभा चुनावों की हार का बदला लेना है, और ममता बनर्जी को हर हाल में जमीन बचानी है.