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ईरान-यूएस डील के 60 दिन बाद का पर्शियन गल्फ...

109 दिनों की जंग के बाद ईरान और अमेरिका के बीच जो समझौता हुआ है, उसे कोई MoU कह रहा है, कोई पीस डील, कोई सिर्फ डील, और कोई छलावा. भरोसे का आलम है कि डील हो जाने के 24 घंटे के भीतर ही इसके छिन्न-भिन्न होने के आसार नजर आने लगे. इजरायल और हिजबुल्ला का पेंच उलझा हुआ है.

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होर्मुज स्ट्रेट में जहाजों से वसूले जाने वाले टोल को 60 दिन बाद ईरान की सिक्योरिटी सर्विस फीस कहा जाएगा. (फोटो - AI generated)
होर्मुज स्ट्रेट में जहाजों से वसूले जाने वाले टोल को 60 दिन बाद ईरान की सिक्योरिटी सर्विस फीस कहा जाएगा. (फोटो - AI generated)

ईरान और अमेरिका के बीच जो समझौता हुआ है, उसे स्थायी बनाने के लिए दोनों पक्षों ने 60 दिन का वक्त लिया है. इस दौरान और बातचीत होगी. लेकिन, जैसा दोनों के बीच ‘भरोसे’ का रिकार्ड है, 60 दिन बाद के पर्शियन गल्फ और उसके आसपास के हालात की कल्पना करना ज्यादा मुश्किल नहीं है. आगे की कहानी उसी कल्पना का विस्तार है, उसे कल्पना मानकर ही पढ़िए...

ईरान और अमेरिका के बीच हुई ऐतिहासिक 'पीस डील' को पूरे 60 दिन हो चुके हैं. जब यह डील हुई थी, तब वाशिंगटन से लेकर तेहरान तक बड़े-बड़े दावे किए गए थे. लेकिन दो महीने बाद पर्शियन गल्फ और उसके आस-पास की सियासत पूरी तरह बदल चुकी है. कूटनीति की बंद फाइलों से निकलकर अब हकीकत जमीन पर दिखने लगी है. पता चल रहा है कि डील में जो बातें तय हुई थीं, वो असलियत में कैसी शक्ल ले रही हैं. अब जाकर दुनिया को धीरे-धीरे पता चल रहा है कि ट्रंप किस तरह ईरान को इस पूरे इलाके का 'चौधरी' बनाकर चले गए हैं. आइए समझते हैं कि इस डील के बाद खाड़ी के इस पूरे इलाके में क्या-क्या खेल चल रहा है.

ईरान की ‘सिक्योरिटी सर्विस एजेंसी’

पर्शियन गल्फ का सबसे जरूरी समुद्री रास्ता है- स्ट्रेट ऑफ होर्मुज. दुनिया का एक-तिहाई तेल इसी रास्ते से होकर गुजर रहा है. डील के बाद इसे खोल तो दिया गया, मगर अब कहानी में ट्विस्ट आ चुका है. ईरान ने इस पूरे समुद्री रास्ते पर अपना कब्जा मजबूत कर लिया है. अब उसे माइंस और ड्रोन की जरूरत नहीं है. यहां से गुजरने वाले हर अंतरराष्ट्रीय ऑयल टैंकर और कमर्शियल शिप से ईरान ‘सिक्योरिटी सर्विस’ के नाम पर मोटी रकम ले रहा है.

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लेकिन जरा ठहरिए! ईरान इन जहाजों को सुरक्षा दे किससे रहा है? जवाब है- खुद से! यानी जंग के दौरान अपनाया गया आक्रामक रवैया, अब ईरान के लिए रेवेन्यू सोर्स बन गया है.

ये वसूली सिर्फ जहाजों से ही नहीं हो रही है. सबसे हैरान करने वाली बात यह है कि खाड़ी के 'जीसीसी' देश (GCC - गल्फ कोऑपरेशन काउंसिल) दुनिया के सामने अपने 'अमीर और ताकतवर ब्रांड' की इज्जत बचाए रखने के लिए ईरान की इस खुली उगाही को चुपचाप तस्लीम कर रहे हैं. वे दुनिया को दिखाना चाहते हैं कि गल्फ में सब ठीक है, भले ही इसके लिए उन्हें ईरान की शर्तों के आगे झुकना पड़ रहा हो.

‘अमन’ की खरीद-फरोख्त

इस इलाके के अमीर खाड़ी (गल्फ) देशों को हमेशा यह गुमान रहता था कि अमेरिका उनके पीछे खड़ा है. लेकिन ईरान जंग के अमेरिका से जान छुड़ाते ही सारा पासा पलट गया है. अब सऊदी अरब, यूएई और कतर जैसे देशों को समझ आ गया है कि इस इलाके में रहना है तो तेहरान के नखरे उठाने ही होंगे. अब ये देश ईरान के साथ सीधे टकराने की औकात में नहीं हैं. वे अपनी सुरक्षा और शांति बनाए रखने के लिए ईरान के सामने कूटनीतिक झोली फैलाए खड़े हैं. इसे आप सीधे शब्दों में कह सकते हैं कि खाड़ी देश अब अपनी सुख-शांति के लिए ईरान को भारी-भरकम आर्थिक रियायतें देकर 'अमन' खरीद रहे हैं, क्योंकि ट्रंप तो पहले ही ईरान को गल्फ का चौधरी बनाकर खुद किनारे हो चुके हैं.

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ट्रंप रीकंस्ट्रक्शन एंड रियल एस्टेट कंपनी प्राइवेट लिमिटेड

डील के मुताबिक, ईरान के दोबारा रीकंस्ट्रक्शन के लिए 300 अरब डॉलर का एक भारी-भरकम फंड तय हुआ था. अब खबर आ रही है कि इस फंड का एक बड़ा हिस्सा ट्रंप फैमिली के बिजनेस साम्राज्य की तिजोरी में जाने वाला है. ईरान के रीकंस्ट्रक्शन से जुड़े कुछ सबसे बड़े और आलीशान रियल एस्टेट और कंस्ट्रक्शन प्रोजेक्ट्स डोनाल्ड ट्रंप के परिवार या उनकी करीबी कंपनियों को सौंपने की तैयारी है. दुनिया सोच रही थी कि यह जंग रोकने की डील है, लेकिन यह तो 'बिजनेस डील' निकली!

न्यूक्लियर सस्पेंस

डील के वक्त ट्रंप ने ये कहते हुए अपनी पीठ थपथपाई थी कि ईरान कभी न्यूक्लियर बम नहीं बनाएगा. वह अपने खतरनाक यूरेनियम भंडार को डाउन-ब्लेंड करेगा. यानी, उसका न्यूक्लियर मटेरियल बम में इस्तेमाल होने लायक नहीं रहेगा. 60 दिन बाद ये दावा सस्पेंस में बदल गया है. जो किसी बम से कम नहीं है. डील की शर्तों में यह पहले ही शामिल हो गया था कि ईरान अपना यूरेनियम देश से बाहर नहीं भेजेगा. अब पता चल रहा है कि जो यूरेनियम अमेरिकी हमले में कथित रूप से जमींदोज हो गया था, उसकी लोकेशन रहस्य बन गई है. अंतरराष्ट्रीय निरीक्षकों के लिए ईरान में आने को लेकर अब भी वही पुरानी पाबंदियां हैं. नतीजा यह है कि पूरी दुनिया में इस बात का सस्पेंस और डर बना हुआ है कि ईरान चुपके से न्यूक्लियर बम की असेंबली लाइन पर काम कर रहा है या नहीं. खतरा टला नहीं है, बस कालीन के नीचे सरका दिया गया है.

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लेकिन इस सस्पेंस के बीच दुनिया का रुख बदल गया है. अब पूरी दुनिया को समझ आ गया है कि ट्रंप ने ईरान को इलाके का असली चौधरी बना दिया है, इसलिए अब भारत, चीन, जापान और यूरोपीय देशों समेत पूरी दुनिया इस इलाके में अपना कारोबार सुरक्षित रखने के लिए ईरान के साथ नया संतुलन (समीकरण) बैठाने में जुट गई है. अब तेहरान को नजरअंदाज करना किसी के बस की बात नहीं रही.

अमेरिकी बेस पर खुले वेपन स्टोर

अमेरिका अब गल्फ में अपनी सीधी मौजूदगी कम कर रहा है और अपने सैनिकों के बोरिया-बिस्तर समेट रहा है. लेकिन ऐसा नहीं है कि अमेरिका गल्फ से भाग रहा है. उसने यहां सिक्योरिटी गार्ड की नौकरी छोड़ी है, आर्म डीलर का बिजनेस शुरू करने के लिए. अमेरिका अब सऊदी अरब और यूएई जैसे डरे हुए देशों को अरबों डॉलर के नए और आधुनिक हथियार बेच रहा है. एयर डिफेंस सिस्टम्स, मिसाइलें, ड्रोन, फाइटर प्लेन, सबमरीन आदि.

हिजबुल्ला-ईरान से जंग अब इजरायल की

भले ही अमेरिका और ईरान के बीच कागजों पर शांति की बात लिखी गई हो, लेकिन जमीन पर बारूद अब भी सुलग रहा है. लेबनान के इलाके में हिजबुल्लाह और इजरायल के बीच जंग थमी नहीं है. ईरान ने अपने इस लाडले प्रॉक्सी को अभी हथियारों और पैसों की सप्लाई तो शुरू नहीं की है, लेकिन इजरायल को डर है कि ऐसा होने में ज्यादा दिन नहीं लगेंगे. साऊथ लेबनान में इजरायल की हिजबुल्ला से झड़पें जारी हैं. ट्रंप लगातार नेतान्याहू की टांग खींच रहे हैं. क्योंकि, उन्हें डर है कि कोई चिंगारी फिर से न भड़क जाए. ईरान लगातार इजरायल पर हमले की धमकी दे रहा है. 60 दिन पूरे होने के बाद ट्रंप को डर है कि लेबनान पर हमलों के कारण लड़ाई का दायरा फिर से फैल सकता है.

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द ग्रेट अरब डिवाइड

ईरान की इस कूटनीतिक जीत ने अरब देशों के बीच के पुराने अविश्वास के जख्मों को फिर से हरा कर दिया है. सऊदी अरब, कतर और यूएई के बीच अब इस बात की होड़ मच गई है कि तेहरान से सबसे बेहतर तालमेल किसका होगा.

यूएई और इजरायल मान रहे हैं कि ईरान और कतर के बीच ‘फिक्सिंग’ है. इजरायल तो यह भी मानता है कि जंग के दौरान ईरान का कतर के रास लफान एनर्जी हब पर हमला सिर्फ दिखावे के लिए था. ईरान को कतर से पैसे मिलते रहे हैं. और आखिर में कतर ने ही अमेरिका से ईरान की मनचाही डील करवाई. कतर के अलावा सऊदी अरब और यूएई के बीच तल्खी भी बढ़ रही है. सऊदी अरब अमेरिका, ईरान, पाकिस्तान के साथ एक अलायंस बनाकर उम्मा की सियासत में फिर से उभरना चाहता है. जबकि, इन सभी गठजोड़ को चैलेंज करते हुए यूएई अमेरिका-इजरायल और भारत जैसे देशों के साथ मिलकर अपनी लकीर लंबी करना चाहता है. और उसकी यही रणनीति उसे अपने पड़ोसियों से टकराव की स्थिति में रखे हुए है.

खाड़ी देशों की इस आपसी अदावत और रेस का ईरान मजे ले-लेकर फायदा उठा रहा है. अब वह गल्फ पॉलिटिक्स की मेनस्ट्रीम में आ गया है. हिजबुल्लाह और हुती का सरपरस्त बनकर. अरब देश जानते हैं कि ईरान के साथ तालमेल के अलावा कोई चारा नहीं है.

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