भारत चंद्रमा पर पहुंच चुका है, मंगल की कक्षा में अपना यान भेज चुका है, परमाणु ऊर्जा और अंतरिक्ष विज्ञान में महत्वपूर्ण उपलब्धियां हासिल कर चुका है. हमारे वैज्ञानिकों ने वैक्सीन से लेकर डिजिटल तकनीक तक कई क्षेत्रों में दुनिया को प्रभावित किया है, फिर भी वैश्विक स्तर पर मौलिक शोध और वैज्ञानिक खोजों की बात आती है तो भारत की मौजूदगी अपेक्षाकृत कमजोर दिखाई देती है. सवाल उठता है कि आखिर क्यों हमारे वैज्ञानिकों के नाम नोबेल पुरस्कार जीतने वालों की सूची में दिखाई नहीं देते?
हालांकि दुनिया में बहुत से असाधारण वैज्ञानिक खोज करने पर शोधकर्ताओं को नोबेल नहीं मिला है. कोई भी पुरस्कार किसी देश या शख्स की क्षमता का प्रमाणपत्र नहीं है. महात्मा गांधी को शांति का नोबेल नहीं मिला और बॉलिवुड की ऑलटाइम सुपरहिट शोले को फिल्मफेयर अवॉर्ड नहीं मिल सका था. लेकिन यह भी सच है कि लगातार नोबेल स्तर की खोजों से दूर रहना किसी देश की शोध संस्कृति पर सवाल जरूर खड़ा करता है. भारत के पास सी.वी. रमन और हरगोविंद खुराना जैसे उदाहरण हैं, जिन्होंने विश्व विज्ञान में असाधारण योगदान दिया. सवाल यह है कि उनके बाद ऐसी वैश्विक स्तर की मौलिक उपलब्धियों की निरंतर श्रृंखला क्यों नहीं बन सकी?
विडंबना यह है कि हम विश्वगुरु बनने की बात करते हैं, लेकिन ज्ञान पैदा करने की हमारी क्षमता अभी उस महत्वाकांक्षा के अनुरूप नहीं है. विश्वगुरु केवल प्राचीन ज्ञान का संदर्भ देकर नहीं बना जाता. आधुनिक दुनिया में विश्वगुरु वह है जो नए ज्ञान की रचना करता है, नई तकनीक विकसित करता है और मानवता के सामने मौजूद कठिन समस्याओं के समाधान खोजता है.
इसलिए नोबेल की घोषणा के समय केवल यह पूछना पर्याप्त नहीं कि भारत को पुरस्कार क्यों नहीं मिला? हमें यह पूछना चाहिए कि भारत में ऐसी परिस्थितियां कब बनेंगी, जहां कोई वैज्ञानिक दशकों तक किसी बड़े सवाल पर बिना राजनीतिक, प्रशासनिक या वित्तीय दबाव के काम कर सके. कब हमारे विश्वविद्यालय प्रयोगशालाओं और विचारों के केंद्र बनेंगे? कब निजी उद्योग मौलिक शोध को खर्च नहीं बल्कि भविष्य में निवेश मानेगा?
भारत के पास प्रतिभा है, बाजार है, पैसा है और महत्वाकांक्षा भी है. कमी अगर कहीं है तो वह शोध के प्रति दीर्घकालिक प्रतिबद्धता और संस्थागत संस्कृति में है. विश्वगुरु बनने का रास्ता नारों से नहीं, प्रयोगशालाओं से होकर जाता है. जिस दिन भारत दुनिया को केवल अपने बाजार और जनसंख्या के कारण नहीं, बल्कि अपने नए ज्ञान और खोजों के कारण नेतृत्व देने लगेगा, उस दिन नोबेल की सूची में अपना नाम ढूंढने की जरूरत शायद नहीं पड़ेगी. दुनिया खुद भारत की ओर देख रही होगी. पर कुछ ऐसी समस्याएं भी हैं जिन्हें हम अनदेखा नहीं कर सकते हैं.
पहली समस्या यह है कि हम अब भी शोध को शिक्षा व्यवस्था का स्वाभाविक हिस्सा नहीं बना पाए हैं. हमारे स्कूलों और कॉलेजों में सवाल पूछने से ज्यादा सही जवाब याद करने पर जोर रहता है. परीक्षा में अच्छे अंक हासिल करना प्रतिभा का सबसे बड़ा प्रमाण मान लिया जाता है. ऐसी व्यवस्था में जिज्ञासा, प्रयोग और असफल होने का साहस धीरे-धीरे कमजोर पड़ता है. जबकि बड़ी वैज्ञानिक खोजें अक्सर उन्हीं सवालों से पैदा होती हैं, जिनका तत्काल कोई उपयोगी जवाब दिखाई नहीं देता.
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भारत में पिछले दशक में आर्थिक संसाधनों की कमी भी वह बड़ी समस्या नहीं रही, जिसका हवाला देकर शोध की कमजोरी को समझाया जा सके. सरकार ने विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी के लिए संस्थागत ढांचा बनाया है, नए शोध संस्थान स्थापित हुए हैं और अंतरिक्ष, रक्षा तथा जैव प्रौद्योगिकी जैसे क्षेत्रों में निवेश बढ़ा है. समस्या कहीं अधिक गहरी है. सवाल यह है कि उपलब्ध धन का कितना हिस्सा वास्तविक और मौलिक शोध तक पहुंचता है और शोधकर्ता को कितनी स्वतंत्रता मिलती है?
भारत की विश्वविद्यालय व्यवस्था भी इस सवाल के केंद्र में है. दुनिया के शीर्ष विश्वविद्यालयों की सूची में हमारे संस्थानों की संख्या अभी भी बहुत कम है. कुछ संस्थान निश्चित रूप से शानदार काम कर रहे हैं, लेकिन देश के अधिकांश विश्वविद्यालयों में शोध की संस्कृति कमजोर है. प्रयोगशालाओं, आधुनिक उपकरणों और अंतरराष्ट्रीय सहयोग की कमी के साथ-साथ प्रशासनिक प्रक्रियाएं भी शोधकर्ताओं का काफी समय खा जाती हैं. वैज्ञानिक को प्रयोग करने से ज्यादा फाइलें पूरी करने में समय लग जाए तो मौलिक शोध की उम्मीद कैसे की जा सकती है?
शोध के मूल्यांकन का तरीका तो और गया गुजरा है. भारत में अक्सर शोध की गुणवत्ता से ज्यादा शोध-पत्रों की संख्या महत्वपूर्ण हो जाती है. कितने पेपर प्रकाशित हुए, कितने प्रमोशन मिले, कितने उद्धरण हैं? इन आंकड़ों के बीच मौलिक और दूरगामी शोध कहीं पीछे छूट जाता है. दुनिया की बड़ी वैज्ञानिक खोजों के लिए वर्षों तक धैर्य, असफल प्रयोगों और अनिश्चित परिणामों को स्वीकार करने की जरूरत होती है. हमारी व्यवस्था में इतने लंबे समय तक असफल रहने की गुंजाइश कितनी है?
निजी क्षेत्र की भूमिका भी महत्वपूर्ण है. भारत की बड़ी कंपनियां आईटी, फार्मा, ऑटोमोबाइल और डिजिटल अर्थव्यवस्था में वैश्विक स्तर पर प्रतिस्पर्धा कर रही हैं, लेकिन मौलिक वैज्ञानिक शोध पर निजी क्षेत्र का निवेश अभी भी अपेक्षाकृत सीमित है. विकसित देशों में विश्वविद्यालय, उद्योग और सरकार मिलकर रिसर्च इकोसिस्टम तैयार करते हैं. भारत में इन तीनों के बीच वैसा मजबूत और निरंतर संबंध अभी विकसित नहीं हो पाया है.
इसके साथ प्रतिभा का सवाल भी जुड़ा है. भारत में प्रतिभा की कमी नहीं है. हमारे लाखों युवा हर साल इंजीनियरिंग, चिकित्सा और विज्ञान की पढ़ाई करते हैं. बड़ी संख्या में भारतीय वैज्ञानिक और तकनीकी विशेषज्ञ दुनिया के प्रतिष्ठित संस्थानों में उत्कृष्ट काम कर रहे हैं. सवाल यह है कि उनमें से कितनों को भारत में ऐसा वातावरण मिलता है, जहां वे लंबे समय तक विश्वस्तरीय शोध कर सकें? यदि प्रतिभा विदेश जाकर बेहतर प्रयोगशाला, स्वतंत्रता और संसाधन हासिल करती है तो समस्या प्रतिभा की नहीं, व्यवस्था की है.