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व्यंग्य: सुसाइड रोकने के लिए सिर्फ सीलिंग फैन हटाने से बात नहीं बनेगी

IIT-बॉम्बे में छात्र के सुसाइड करने के बाद जो हालात बने, और फिर उस पर जिस तरह से फैसले लिए गए, उसने पूरी व्यवस्था का खोखलापन उजागर कर दिया है. अब बताइए, सुसाइड रोकने के लिए सीलिंग फैन हटा देना कहां का सॉल्यूशन हुआ?

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IIT बॉम्बे ने अपने संस्थान में सुसाइड रोकने के लिए सीलिंग फैन हटाने का फैसला लिया है.
IIT बॉम्बे ने अपने संस्थान में सुसाइड रोकने के लिए सीलिंग फैन हटाने का फैसला लिया है.

हमारे देश में जब भी कोई बड़ी समस्या आती है, तो हमारी व्यवस्था उसका हल ढूंढने के लिए दिमाग की इतनी बत्तियां जला देती है कि समस्या खुद शर्म के मारे दम तोड़ देती है. समस्या चाहे कितनी ही पेचीदा हो, हमारे पास हर चीज़ का एक ऐसा 'नायाब और सीधा' हल होता है, जिसे देखकर दुनिया के बड़े-बडे वैज्ञानिक भी अपना सिर पीट लें.

अब आप IIT बॉम्बे को ही देख लीजिए. देश का सबसे बड़ा संस्थान, जहां देश के सबसे तेज दिमाग वाले बच्चे पढ़ते हैं. जब वहां एक छात्र ने आत्महत्या कर ली, तो पूरे देश में हाहाकार मच गया. तरह-तरह की बातें हुईं. तरह-तरह के आरोप लगे. तरह-तरह के समाधान सुझाए गए.

प्रशासन ने बैठकर इस पर बहुत सोच-विचार किया. और फिर आदरणीय अफसरों ने समस्या की असली जड़ पकड़ ली. उन्होंने पाया कि डिप्रेशन, मानसिक तनाव या भेदभाव जैसी चीजें तो बस कहने-सुनने की बातें हैं, असली गुनहगार तो वो 'सीलिंग फैन' यानी छत पर टंगा पंखा है. अगर छत पर पंखा ही न होता, तो कोई उससे लटकता कैसे?

तुरंत हुक्म जारी हुआ कि हॉस्टल के सारे छत वाले पंखे उखाड़ फेंको और दीवार पर लगाने वाले पंखे (वॉल फैन) टांग दो. 'न रहेगा बांस, न बजेगी बांसुरी.'

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अब कोई इनसे पूछे कि हुजूर, अगर किसी ने जान देने की ठान ही ली है, तो क्या वो दीवार वाले पंखे को देखकर यह कहेगा— "अरे यार! सीलिंग फैन तो है ही नहीं. मरना कैंसिल. चलो चलकर पढ़ाई करते हैं."

वैसे इस ऐतिहासिक और महान फैसले को अगर थोड़ा और विस्तार दिया जाए, तो सुरक्षा के इंतजाम और भी पुख्ता हो सकते हैं. मान लीजिए, कल को कोई छात्र हॉस्टल की पांचवीं या छठी मंजिल की खिड़की से कूद जाए, तो प्रशासन का अगला कदम क्या होगा? जाहिर है, पांचवीं-छठी मंजिल को ही ढहा दिया जाएगा. सारे मल्टीस्टोरी हॉस्टलों को तोड़कर एक-एक मंजिल की 'झोपड़ी-छाप' बैरक बना दी जाएगी. ताकि अगर कोई छलांग लगाए भी, तो घुटने में थोड़ी खरोंच ही आए.

अगर कोई तौलिये या चादर का गलत इस्तेमाल कर ले, तो हॉस्टल के नियमों में लिखा जाएगा कि अब से छात्र केवल 'कागज के कपड़े' पहनेंगे. कागज फटने का डर रहता है, इसलिए सुसाइड की गुंजाइश खत्म. रस्सी, तार, यहां तक कि पानी की बाल्टी भी बैन कर देनी चाहिए, क्योंकि क्या पता कोई उसी में डुबकर जान दे दे.

अब आइए दूसरे मुद्दे पर. दूसरा बड़ा झगड़ा है जातिगत भेदभाव का.

कैंपस में आए दिन यह बात उठती है कि साहब, अमुक छात्र के साथ भेदभाव हुआ, उसे ताने मारे गए. अब व्यवस्था के सामने फिर धर्मसंकट. यह तय करना कि भेदभाव हुआ भी या नहीं. हुआ तो कितना हुआ. अदालतें थक जाएंगी, लेकिन यह साबित नहीं कर पाएंगी कि किसने किसको किस नजर से देखा.

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तो इसका भी एक बहुत सुंदर, सुलभ और 'रामबाण' इलाज हॉस्टल से सीलिंग फैन हटाने वाले कर्णधारों के पास होगा ही. आसान तो यही है कि IIT को जातियों में बांट दो.

जब झंझट ही मिटाना है, तो बीच में एक पक्की और ऊंची दीवार क्यों न खींच दी जाए? दलित और आदिवासी छात्रों के लिए एक अलग कैंपस बना दो. उनके हॉस्टल अलग, उनकी कैंटीन अलग, उनकी लाइब्रेरी अलग और उन्हें पढ़ाने वाले मास्टर साहब भी उन्हीं की जाति के. कोई सवर्ण टीचर या स्टूडेंट उस दीवार के आसपास फटके भी न.

सिंपल सॉल्यूशन- न कोई पास आएगा, न कोई ताना मारेगा, न कोई भेदभाव होगा. आजादी के सत्तर साल बाद हम जहां 'एकता' की बातें करते थकते नहीं थे, वहां समस्या सुलझाने का सबसे आसान तरीका यह है कि देश को छोटे-छोटे कमरों में बंद कर दो. जब लोग आपस में मिलेंगे ही नहीं, तो झगड़ा किस बात का? भेदभाव खत्म करने का इससे आसान 'टेक्निकल सॉल्यूशन' शायद ही दुनिया की किसी यूनिवर्सिटी के पास हो.

अब बात करते हैं IIT में पढ़ाई के 'हाई प्रेशर' की.

सब जानते हैं कि IIT में दाखिला मिलते ही बच्चे के दिमाग पर ऐसा प्रेशर कुकर चढ़ा दिया जाता है, जिसकी सीटी चार साल तक बजती ही रहती है. दिन-रात असाइनमेंट, लैब, एग्ज़ाम और ग्रेड्स की मार. बच्चा टूट जाता है.

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इस प्रेशर को कम करने का क्या तरीका हो सकता है? साइकोलॉजिस्ट कहेंगे- काउंसलिंग कराओ, सिलेबस थोड़ा आसान करो, माहौल दोस्ती वाला बनाओ.

जब देश में हाई-प्रेशर वाले IIT चल रहे हैं, तो थोड़े 'लो-प्रेशर IIT' भी खोल दो. ऐसे IIT बनाओ, जिन्हें 'अभयारण्य' कहा जा सके. यानी जहां छात्र पूरी आजादी से घूमें. अगर कोई बच्चा साल भर क्लास न जाए, तो भी कोई बात नहीं. अगर वो एग्ज़ाम में उत्तर न लिखे या फेल होने की कगार पर हो, तो उसे प्यार से बुलाकर पास की डिग्री थमा दी जाए. अगर कोई बच्चा परीक्षा में नक़ल करना चाहे, तो टीचर मुस्कुराकर कहे- बेटा, आराम से करो, मेरी गाइड बुक भी ले लो!

कितना टेंशन-फ्री माहौल होगा. न कोई टेंशन, न कोई डिप्रेशन, न कोई सुसाइड.

और जब 'लो-प्रेशर IIT' होगा, तो उसकी प्रवेश परीक्षा भी तो आसान होनी चाहिए. जिन्हें 'IIT-JEE' के नाम से ही बुखार आ जाता है. कोटा जैसी कोचिंग मंडियों में दिन-रात घिसते-पिसते बच्चों की कहानियां भी घिस चुकी हैं. जिनमें कई तो एडमिशन से पहले ही हिम्मत हार जाते हैं. इसलिए एक नया एग्ज़ाम लॉन्च किया जाना चाहिए- 'IIT-JEE लाइट'.

और आख़िर में बात प्रोटेस्ट की. जिसके बिना लगता है देश में कोई फैसला होगा ही नहीं. पिछले दस वर्षों का ट्रेंड देखें तो स्टूडेंट में सबसे बड़ी और अनूठी प्रतिभा 'प्रोटेस्ट' के रूप में ही उभरकर आई है. जेएनयू से लेकर IIT बॉम्बे तक.

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जंतर-मंतर पर Gen-Z ने साबित किया कि उनके पास आंदोलन करने का गजब का हुनर है. उनका अपना रिजल्ट जैसा भी आए, वो एक केंद्रीय मंत्री का इस्तीफा हासिल कर चुके हैं. IIT बॉम्बे के एक डीन को वे ठिकाने पर लगा चुके हैं, और डायरेक्टर साहब का इस्तीफा भी लगभग ले ही चुके थे.

जब छात्रों में यह प्रतिभा कूट-कूटकर भरी है, तो हम इसे यूं ही सड़कों पर क्यों जाया कर रहे हैं? इसके लिए तो एक अलग से 'राष्ट्रीय प्रोटेस्ट संस्थान' (National Institute of Protest) खोला जाना चाहिए.

जहां बाकायदा बी.टेक और एम.टेक की तर्ज पर 'बी.प्रोटेस्ट' और 'एम.प्रोटेस्ट' की डिग्रियां दी जाएं. वहां एक पूरा सिलेबस हो. पहले सेमेस्टर में पढ़ाया- धरने पर कैसे बैठें और लंबी भूख हड़ताल कैसे करें. दूसरे सेमेस्टर में सिखाया जाए— मुद्दे में दम हो, न हो, अपने आंदोलन को कैसे गरम रखें?

वहां रिसर्च हो, बाकायदा पीएच.डी. कराई जाए कि देश में कौन-कौन सी नई 'फॉल्ट लाइन्स' खोजी जा सकती हैं, जिन पर आंदोलन खड़ा किया जा सके. छात्रों को साम, दाम, दंड, भेद वाले सारे पैंतरे सिखाए जाएं कि कैसे एक छोटी सी बात को राष्ट्रीय मुद्दा बनाकर हुक्मरानों की कुर्सी हिलाई जा सकती है.

खैर, बात पंखे से शुरू हुई थी और क्रांति पर आकर रुकी है. हमारी व्यवस्था का बस यही कहना है कि बुनियादी समस्याओं को छूना खतरनाक है. जड़ पर वार मत करो, बस फल-फूल काटते रहो. पंखा बदलो, दीवारें उठाओ, पढ़ाई का स्तर गिराओ और जब कुछ न बने तो धरने पर बैठ जाओ. क्योंकि हमारी तरक्की इसी में है.

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