आज नरेंद्र मोदी को सत्ता में 25 साल से ज्यादा का वक्त हो चुका है. वे न सिर्फ दुनिया के सबसे ताकतवर नेताओं में गिने जाते हैं, बल्कि अपने समर्थकों के बीच एक 'कल्ट' का रूप ले चुके हैं. लेकिन जिस दमदार और मजबूत नेतृत्व को आज हम देखते हैं, उसकी शुरुआत बहुत साधारण, एवरेज और एक तरह से अस्थायी व्यवस्था के तौर पर हुई थी.
अक्टूबर 2001 में जब नरेंद्र मोदी को गुजरात का मुख्यमंत्री बनाया गया, तब वे न तो किसी सदन के सदस्य थे और न ही उनके पास सरकार चलाने का कोई पिछला प्रशासनिक अनुभव था. उस वक्त भाजपा के भीतर और गुजरात के सियासी हालात ऐसे बन चुके थे कि पार्टी के पास चेहरे और नेतृत्व को बदलने के अलावा कोई दूसरा रास्ता नहीं बचा था.
आइए जानते हैं कि 2001 में भाजपा के भीतर वे कौन सी परिस्थितियां थीं, जिन्होंने संगठन में काम करने वाले संघ के एक पुराने प्रचारक को गुजरात की कमान सौंप दी.
1. 2001 का भीषण भुज भूकंप और भाजपा सरकार की नाकामी
जनवरी 2001 में गुजरात के भुज में आए विनाशकारी भूकंप ने पूरे राज्य को हिलाकर रख दिया था. उस वक्त केशूभाई पटेल गुजरात के मुख्यमंत्री थे. भूकंप के बाद राहत और बचाव कार्य जिस सुस्ती और बदहाली से चला, उसने जनता के गुस्से को भड़का दिया.
वरिष्ठ पत्रकार और लेखक वासुदेव (जिन्होंने उस दौरान गुजरात की राजनीति को बहुत करीब से कवर किया था) अपनी रिपोर्टिंग में बताते हैं कि भुज के बाद गांवों और कस्बों में सरकार के खिलाफ जबरदस्त नाराजगी थी. अंतरराष्ट्रीय मदद और फंड आने के बाद भी लोगों तक राहत नहीं पहुंच पा रही थी. अफसरशाही पूरी तरह हावी थी और केशूभाई पटेल का स्वास्थ्य गिर रहा था, जिसके चलते वे पूरी तरह असहाय दिख रहे थे. जनता में यह संदेश चला गया था कि सरकार अब उनके किसी काम की नहीं बची है.
2. उपचुनावों में हार और सत्ता खोने का डर
भूकंप के बाद बने माहौल की सच्चाई जल्द ही चुनावी नतीजों में सामने आ गई. सितंबर-अक्टूबर 2001 में हुए उपचुनावों में भाजपा को करारी शिकस्त झेलनी पड़ी. सब्र का बांध तब टूटा जब पार्टी साबरमती विधानसभा सीट और आनंद लोकसभा सीट पर कांग्रेस से चुनाव हार गई.
वरिष्ठ पत्रकार और लेखक उदय माहूरकर अपनी किताब 'सेंटर स्टेज: हाउ नरेंद्र मोदी मॉडल ट्रांसफॉर्म्ड गुजरात' में लिखते हैं कि साबरमती भाजपा का गढ़ मानी जाती थी. वहां हारने का मतलब था कि भाजपा के हाथ से गुजरात का जनाधार पूरी तरह खिसक रहा था. उस वक्त भाजपा का केंद्रीय नेतृत्व (अटल बिहारी वाजपेयी और लालकृष्ण आडवाणी) समझ गया था कि अगर 2002 में होने वाले विधानसभा चुनावों से पहले गुजरात में नेतृत्व नहीं बदला गया, तो पार्टी का राज्य से सूपड़ा साफ होना तय है.
3. केशूभाई पटेल का घटता असर और अंदरूनी गुटबाजी
केशूभाई पटेल कभी गुजरात में भाजपा का सबसे बड़ा चेहरा हुआ करते थे, लेकिन 2001 तक आते-आते वे स्वास्थ्य संबंधी समस्याओं से जूझ रहे थे. इसके अलावा उनके इर्द-गिर्द के लोगों पर भ्रष्टाचार के आरोप लग रहे थे.
गुजरात भाजपा उस वक्त भीषण गुटबाजी का शिकार थी. एक तरफ केशूभाई का गुट था, तो दूसरी तरफ शंकरसिंह वाघेला के पार्टी छोड़ने के बाद भी उनके समर्थक और बागी सुर अंदर ही अंदर सुलग रहे थे. पार्टी के कार्यकर्ता पूरी तरह निराश हो चुके थे और संगठन बिखर रहा था. केशूभाई प्रशासनिक तौर पर बेहद ढीले साबित हो रहे थे और वे इस अंदरूनी कलह पर काबू पाने में पूरी तरह नाकाम थे.

4. मोदी का ऑर्गेनाइजेशन मैनेजमेंट और वाजपेयी-आडवाणी का भरोसा
नरेंद्र मोदी उस वक्त दिल्ली में भाजपा के राष्ट्रीय महामंत्रियों में से एक थे और हिमाचल प्रदेश, पंजाब व हरियाणा जैसे राज्यों का काम देख रहे थे. वे दिल्ली में जरूर थे, लेकिन गुजरात भाजपा की रग-रग से वाकिफ थे. 1995 में जब भाजपा ने पहली बार गुजरात में अपने दम पर पूर्ण बहुमत की सरकार बनाई थी, तब उसकी रणनीति और चुनावी ताने-बाने के पीछे नरेंद्र मोदी का ही दिमाग था.
लालकृष्ण आडवाणी ने अपनी आत्मकथा 'माई कंट्री माई लाइफ' में जिक्र किया है कि नरेंद्र मोदी का संगठन पर जबरदस्त नियंत्रण था और उनकी राजनीतिक समझ बेहद पैनी थी. आडवाणी लिखते हैं कि जब गुजरात में नेतृत्व परिवर्तन की बात शुरू हुई, तो केंद्रीय नेतृत्व को एक ऐसे व्यक्ति की तलाश थी जो न केवल प्रशासन में कसावट ला सके, बल्कि गुटबाजी में बंटी पार्टी को फिर से एक कर सके. नरेंद्र मोदी के पास राज्य के हर छोटे-बड़े कार्यकर्ता की जानकारी थी और वे इस काम के लिए सबसे मजबूत दावेदार थे.
5. उप-मुख्यमंत्री का पद ठुकराना और मोदी की शर्त
जब दिल्ली में आलाकमान ने गुजरात में चेहरा बदलने का फैसला किया, तो शुरुआत में मामला इतना सीधा नहीं था. केशूभाई पटेल आसानी से कुर्सी छोड़ने को तैयार नहीं थे. वे मोदी को मुख्यमंत्री बनाने के सख्त खिलाफ थे.
वरिष्ठ पत्रकार राजदीप सरदेसाई की किताब '2014: द इलेक्शन दैट चेंज्ड इंडिया' और कई वरिष्ठ पत्रकारों के संस्मरणों के मुताबिक, शुरुआत में मोदी को केशूभाई की सरकार में उप-मुख्यमंत्री बनाकर भेजने का प्रस्ताव दिया गया था. लेकिन मोदी ने इस आधे-अधूरे ऑफर को साफ खारिज कर दिया.
नरेंद्र मोदी ने अटल बिहारी वाजपेयी और आडवाणी से साफ कहा, "अगर मुझे जाना है, तो पूरी जिम्मेदारी के साथ जाऊंगा. आधे-अधूरे काम में मैं हाथ नहीं डालूंगा. अगर आप चाहते हैं कि मैं गुजरात संभालूं, तो मुझे काम करने की पूरी आजादी देनी होगी." मोदी जानते थे कि उप-मुख्यमंत्री बनकर वे कभी भी अपनी नई नीतियां लागू नहीं कर पाएंगे और पुरानी गुटबाजी का शिकार हो जाएंगे.
6. जब वाजपेयी ने कहा- 'पंजाबी खाना बहुत खा लिया...'
नरेंद्र मोदी को मुख्यमंत्री बनाए जाने से जुड़ा एक बेहद मशहूर किस्सा है, जिसका जिक्र खुद मोदी ने कई साक्षात्कारों में किया है. अक्टूबर 2001 की शुरुआत में जब मोदी दिल्ली में एक टीवी कैमरामैन के अंतिम संस्कार में शामिल होने गए थे, तब उन्हें अटल बिहारी वाजपेयी का फोन आया.
वाजपेयी ने उनसे मजाकिया अंदाज में कहा, "तुम दिल्ली में बहुत पंजाबी खाना खा चुके हो, अब गुजरात जाओ और वहां की संभालो." मोदी ने शुरुआत में कहा भी कि उन्होंने कभी सरकार नहीं चलाई है और वे संगठन का काम ही बेहतर समझते हैं, लेकिन वाजपेयी और आडवाणी फैसला कर चुके थे. 6 अक्टूबर 2001 को नरेंद्र मोदी अहमदाबाद पहुंचे और 7 अक्टूबर 2001 को उन्होंने पहली बार गुजरात के मुख्यमंत्री के रूप में शपथ ली.

7. अस्थायी शुरुआत से आज तक का सफर
अक्टूबर 2001 में जब मोदी ने कमान संभाली, तब राजनीतिक पंडितों का मानना था कि वे एक अस्थायी (स्टॉप-गैप) मुख्यमंत्री हैं. कहा जा रहा था कि वे 2002 के चुनाव तक सिर्फ डैमेज कंट्रोल करने आए हैं. वे खुद विधायक भी नहीं थे, इसलिए उन्हें राजकोट से उपचुनाव जीतकर विधानसभा पहुंचना पड़ा था.
लेकिन मोदी ने सत्ता में आते ही प्रशासन का हुलिया बदलना शुरू कर दिया. उन्होंने सरकारी मशीनरी में अनुशासन कायम किया, भूकंप पुनर्वास के काम में तेजी लाए और पार्टी कार्यकर्ताओं में नया जोश भर दिया. उसके बाद जो हुआ, वह भारतीय राजनीति के इतिहास का हिस्सा है.
2001 में एक बेहद नाजुक, बिखरी हुई और असंतोष से भरी राजनीतिक स्थिति के बीच 'इमरजेंसी मैनेजर' के रूप में गुजरात भेजे गए नरेंद्र मोदी ने उस मौके को किस तरह भुनाया, इसका अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि एक अस्थायी व्यवस्था के तहत गुजरात भेजे गए मोदी ने ऐसी शुरुआत की कि वे उसके बाद से आज तक कभी कोई चुनाव नहीं हारे और पिछले 25 सालों से लगातार सत्ता के केंद्र में बने हुए हैं.
चलते-चलते : मोदी के राजनीतिक सफर का विश्लेषण करने वाले उन्हें दो ताकतों का दुर्लभ मिश्रण मानते हैं. प्रशासनिक पकड़ कायम रखने के लिए CEO जैसी सूझबूझ, और साथ में जनता की नब्ज समझने वाला एक विलक्षण संवेदनशील नजरिया. गुजरात के बड़े पत्रकारों में शुमार अजय उमट याद करते हैं कि उन्होंने टाइम्स ऑफ इंडिया में एक रिपोर्ट पब्लिश की थी कि गुजरात जीडीपी के मामले में भले अव्वल राज्य हो, लेकिन ह्यूमन इंडेक्स के मामले में वह सालहवें-सत्रहवें नंबर पर आता है. इस खबर के छपने के बाद मोदी ने उन्हें अपने ऑफिस में बुलवा लिया, और कहा कि यह खबर अपनी जगह लेकिन आप मुझे कोई सॉल्यूशन भी दो. इसके मोदी अपनी पूरी कैबिनेट और अजय उमट जैसे पत्रकारों को लेकर अहमदाबाद आईआईएम में दो दिन रहे, और ह्यूमन इंडेक्स सुधारने को लेकर मंथन किया.
मोदी चाहे, मुख्यमंत्री रहे हों या आज प्रधानमंत्री, वे बखूबी जानते हैं कि अपने चिंतन को लोगों के बीच कैसे पहुंचाया जाए. हर रविवार होने वाली ‘मन की बात’ से लेकर बुधवार को दिल्ली के इंदिरा गांधी इनडोर स्टेडियम में हुई ’विकसित भारत संकल्प सभा’, प्रधानमंत्री मोदी जनता में जोश भरने के लिए "वी विल डू इट" (हम यह करके रहेंगे) जैसा नारा देते हैं. नेतृत्व के रूप में अपने 25 साल के लिए जनता का आभार मानते हैं. और फिर लगे हाथ अपने तीन लक्ष्य बताते हैं - भारत को तीसरी बड़ी अर्थव्यवस्था बनाना, आलंपिक खेलों का आयोजन और मानवरहित स्पेस मिशन.
2001 हो या 2026, मोदी के लक्ष्य हमेशा स्पष्ट रहे हैं, जिनके बल पर वे शीर्ष पर कायम हैं. उन्हें रेटिंग देने वाले ऊपर-नीचे होते रहे हैं.