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काउंटर थिंक: कारोबार में सफलता के लिए क्यों जरूरी है उलटी सोच?

कारोबार में हर बार वही तरीका काम नहीं आता, जो पहले से चला आ रहा हो. कई बार समस्या का हल खोजने के लिए उसे उलटे नजरिये से देखना पड़ता है. 'काउंटर थिंक: योर वे टू अ सक्सेसफुल बिजनेस' इसी सोच को समझाती है.

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फैसले लेने का नया नजरिया सिखाती है किताब.
फैसले लेने का नया नजरिया सिखाती है किताब.

कारोबार की दुनिया में सफलता का कोई एक तय फॉर्मूला नहीं है. एक ही बाजार में काम करने वाली दो कंपनियों के नतीजे अलग-अलग हो सकते हैं. कोई कंपनी तेजी से आगे बढ़ती है, जबकि दूसरी बेहतर संसाधन होने के बावजूद पिछड़ जाती है. इसकी एक बड़ी वजह है समस्याओं को देखने और फैसले लेने का नजरिया. काउंटर थिंक: योर वे टू अ सक्सेसफुल बिजनेस इसी बुनियादी सवाल पर ध्यान फोकस करती है. किताब का मूल विचार है कि कारोबारी सफलता के लिए केवल परंपरागत तरीके से सोचना ही पर्याप्त नहीं, बल्कि स्थापित धारणाओं पर सवाल उठाना और परिस्थितियों के दूसरे पहलुओं को समझना भी जरूरी है.

केबीआई पब्लिशर्स से आई तीन लेखकों शिलादित्य दासगुप्ता, डॉ. डिंपल भराली और अमित कुमार श्रीवास्तव की पुस्तक 'काउंटर थिंक: योर वे टू ए सक्सेसफुल बिजनेस' इसी सवाल के इर्द-गिर्द अपनी पूरी विचारधारा विकसित करती है. इस पुस्तक की प्रमुख अवधारणा 'काउंटर थिंक' है. इसका मतलब किसी स्थापित विचार का केवल विरोध करना नहीं, बल्कि किसी निर्णय या समस्या को विपरीत नजरिये से भी परखना है. उदाहरण के लिए, अगर किसी कंपनी की बिक्री लगातार घट रही है, तो प्रबंधन का पहला विचार विज्ञापन पर खर्च बढ़ाना हो सकता है. लेकिन क्या समस्या वास्तव में प्रचार की कमी है? संभव है कि प्रोडक्ट ग्राहकों की जरूरतों के मन मुताबिक न हो, कीमत प्रतिस्पर्धियों से अधिक हो या ग्राहक सेवा कमजोर पड़ गई हो.

दरअसल, कई बार जो चीज सामने से सही दिखाई देती है, उसके भीतर असफलता के बीज छिपे होते हैं. इसी तरह, जिसे हम नुकसान या संकट मान लेते हैं, उसमें भी किसी नए अवसर की संभावना मौजूद हो सकती है. लेखक पाठकों को इसी उलटकर सोचने की आदत विकसित करने के लिए प्रेरित करते हैं. इसे ही पुस्तक में 'काउंटर थिंक' कहा गया है. इस विचार को समझाने के लिए लेखक भारतीय दर्शन का भी सहारा लेते हैं. भगवद्गीता के चौथे अध्याय के 18वें श्लोक में कहा गया है कि बुद्धिमान व्यक्ति कर्म में अकर्म और अकर्म में कर्म देखता है. यह विचार पहली नजर में आध्यात्मिक लग सकता है, लेकिन लेखक इसे आधुनिक कारोबारी निर्णयों से जोड़ते हैं. उनका मानना है कि हर परिस्थिति में केवल दिखाई देने वाली गतिविधियों को ही सफलता या असफलता का आधार नहीं मानना चाहिए. कभी-कभी रुककर सोचना, किसी निर्णय को टालना या पहले से तय रणनीति पर सवाल उठाना भी सही दिशा में उठाया गया कदम हो सकता है.

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व्यावसायिक फैसलों में इसका अर्थ परिस्थितियों को केवल उनके बाहरी रूप से नहीं आंकना है. कई बार जो कदम सक्रियता का संकेत देता है, वह वास्तव में समस्या को और बढ़ा सकता है. इसके उलट, कुछ परिस्थितियों में तुरंत फैसला न लेना, उपलब्ध जानकारी का विश्लेषण करना और सही समय की प्रतीक्षा करना अधिक समझदारी भरा कदम हो सकता है. यह दृष्टिकोण कारोबारी नेतृत्व के लिए उपयोगी है, क्योंकि नेतृत्व का मतलब केवल तेजी से फैसले लेना नहीं, बल्कि सही समय पर सही फैसला लेना भी है. हालांकि, इस विचार को व्यावहारिक परिणामों में बदलने के लिए बाजार की वास्तविकताओं, आंकड़ों और परिस्थितियों का विश्लेषण जरूरी है.

पुस्तक की खासियत यह है कि यह केवल बड़े-बड़े प्रबंधन सिद्धांतों और आदर्शवादी बातों तक सीमित नहीं रहती. इसमें कारोबार की वास्तविक परिस्थितियों के माध्यम से अपने विचारों को समझाने की कोशिश की गई है. पुस्तक को तीन हिस्सों में बांटा गया है. पहला हिस्सा 'बैटल ऑफ ब्रिटेन' की ऐतिहासिक घटना से शुरू होता है. इसके जरिए लेखक यह समझाते हैं कि किसी बड़ी रणनीति की विफलता के पीछे कई बार वे खतरे होते हैं, जिन्हें समय रहते पहचाना नहीं जाता. किसी भी योजना को सफल मान लेने से पहले उसकी कमजोरियों और संभावित जोखिमों को समझना जरूरी है.

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दूसरे हिस्से में ऑटोमोबाइल उद्योग के उदाहरणों के जरिए 'काउंटर थिंक' के 12 नियम प्रस्तुत किए गए हैं. उद्योग से जुड़े मामलों के माध्यम से यह समझने का प्रयास किया गया है कि कारोबारी परिस्थितियों को अलग नजरिये से देखने पर फैसलों की गुणवत्ता कैसे बेहतर हो सकती है.

तीसरे हिस्से में सूक्ष्म, लघु और मध्यम उद्यमों से जुड़ी वास्तविक परिस्थितियों पर आधारित 15 काल्पनिक मामले शामिल हैं. यह हिस्सा खास तौर पर छोटे कारोबारियों के लिए प्रासंगिक है, क्योंकि उनके सामने पूंजी की कमी, ग्राहकों को बनाए रखने, लागत नियंत्रित करने और प्रतिस्पर्धा में टिके रहने जैसी चुनौतियां होती हैं. इन मामलों के जरिए विचारों को रोजमर्रा के कारोबारी निर्णयों से जोड़ने की कोशिश की गई है.

इस पुस्तक की सबसे बड़ी खूबी इसका नजरिया है. हालांकि, किसी कारोबारी किताब की असली परीक्षा उसके विचारों को व्यवहार में लागू करने की क्षमता है. अलग नजरिये से सोचना तभी कारगर होगा, जब उसके साथ विश्वसनीय आंकड़े, ग्राहकों की प्रतिक्रिया, वित्तीय अनुशासन और बाजार की समझ भी जुड़ी हो. हर परंपरागत तरीका गलत नहीं होता और हर नया विचार सफल साबित नहीं होता. इसलिए 'काउंटर थिंक' को स्थापित कारोबारी सिद्धांतों का विकल्प नहीं, बल्कि निर्णय लेने की प्रक्रिया को बेहतर बनाने वाले एक अतिरिक्त औजार के रूप में देखना अधिक उचित होगा.

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बुक: काउंटर थिंक: योर वे टू अ सक्सेसफुल बिजनेस
लेखक: शिलादित्य दासगुप्ता, डॉ. डिंपल भराली और अमित कुमार श्रीवास्तव
पब्लिशर: केबीआई पब्लिशर्स
दाम: 649 रुपये
 

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