कार्तिक मास की अमावस्या तिथि को दीपावली का उत्सव मनाया जाता है. यह सदियों से चली आ रही परंपरा है. पहले घर की साफ-सफाई, धनतेरस के दिन खरीदारी और फिर कार्तिक अमावस्या की शाम को दीप जलाकर प्रकाश करना और देवी लक्ष्मी की पूजा करना. यह सब हमने, हमारी पीढ़ी ने हमसे पहले की पीढ़ी को करते देखा है और उनसे सीखा है.
इस परंपरा की बात में सवाल निकलता है कि देवी लक्ष्मी की पूजा का इतिहास क्या है? दीपावली पर उनकी पूजा की परंपरा कैसे बनी है? अगर दीपावली श्रीराम के अयोध्या वापसी का ही पर्व है तो इसमें देवी लक्ष्मी की पूजा का लॉजिक क्या है? फिर सवाल ये भी है कि देवी लक्ष्मी धन की देवी कैसे बनीं?
इन सभी प्रश्नों के उत्तर खोजने चलेंगे तो जवाब दो रास्तों से मिलता है. पहला है पौराणिक रास्ता, दूसरा है लिखा हुआ, शोध किया हुआ इतिहास.
वेदों में देवी लक्ष्मी
जब हम वेदों में लक्ष्मी को खोजते हैं तो वहां सबसे पहले ‘श्री’ का जिक्र मिलता है. 'श्री'यानी तेज, सौंदर्य, तेज, प्रतिष्ठा, मंगल और ऐश्वर्य. मंत्रों में इसी 'श्री' को एक देवी के रूप में माना गया और धीरे-धीरे एक ऐसी मान्यता विकसित हुई जो ये मानती थी कि 'श्री' ही जीवन में कल्याण करती है और जीवन को संपन्न बनाती है. ऋग्वेद से जुड़े 'श्रीसूक्त' में इस मान्यता को बल मिलता है, जिसके एक मंत्र में लक्ष्मी को हिरण्यमयी यानी सोने की आभा वाली बताया गया है.
श्रीसूक्त में कहा गया है-
हिरण्यवर्णां हरिणीं सुवर्णरजतस्रजाम्.
चन्द्रां हिरण्मयीं लक्ष्मीं जातवेदो म आवह॥
यानी, हे अग्निदेव! आप सुनहरी आभा वाली, तेजस्विनी, सोने-चांदी की माला से सजी हुई और चंद्रमा जैसी सुंदर कांति वाली लक्ष्मी का मेरे लिए आवाहन करें. श्रीसूक्त में ही देवी को पशुधन, अन्न, कीर्ति और जीवन की संपन्नता की कामना पूरी करने वाली बताया गया है. इस तरह श्री और लक्ष्मी पर्याय बन जाते हैं जो जीवन को पोषण देते हैं और स्थायी संपन्नता भी देते हैं.

समुद्र मंथन की कहानी और देवी लक्ष्मी का प्रकट होना
वैदिक साहित्य में श्री और लक्ष्मी का संबंध समृद्धि तथा सौभाग्य से मिलता है. यजुर्वेदीय परंपरा में भी लक्ष्मी का उल्लेख मिलता है. आगे चलकर वैष्णव और पौराणिक साहित्य में देवी लक्ष्मी भगवान विष्णु की सहचरी के रूप में प्रतिष्ठित हुईं. इसी के साथ पौराणिक कहानियों में देवी लक्ष्मी का स्वरूप और अधिक विस्तार पाता है. खास तौर पर विष्णु पुराण और श्रीमद्भागवत महापुराण में उनके प्रकट होने की कथा, समुद्र मंथन से जुड़ी है. श्रीमद्भागवत के आठवें स्कंध में समुद्र मंथन की कहानी है, जहां अमृत पाने के क्रम में क्षीरसागर को मथकर, लक्ष्मी को 'श्रीदेवी' के रूप में पाया गया.
भगवान विष्णु संसार के पालनहार माने जाते हैं और देवी लक्ष्मी ने उन्हें अपने पति के रूप में स्वीकार किया. इस तरह देवी लक्ष्मी का एक अर्थ धन की देवी के रूप में भी लिया गया. पालन-पोषण का काम बिना धन के नहीं हो सकता है, और भगवान विष्णु इस काम को कर रहे हैं तो वह सबसे बड़े धनी हैं. वो धनी इसीलिए हैं क्योंकि उनके पास धन की देवी लक्ष्मी हैं.
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देवी लक्ष्मी की पूजा का इतिहास
देवी श्री और लक्ष्मी के मूर्तिशिल्प से जुड़े महत्वपूर्ण पुरातात्त्विक प्रमाण दूसरी-पहली शताब्दी ईसापूर्व से मिलने लगते हैं. मौर्य काल में भी 'देवी श्री' की पूजा का कहीं-कहीं जिक्र है. हालांकि उन्हें स्पष्ट रूप से लक्ष्मी नहीं कहा गया. मौर्य के बाद शुंगकाल आया. इस दौरान पत्थर पर कई तरह के चित्र उकेरे जाने लगे. स्तूपों, तोरणों और वेदिकाओं पर देवी-देवताओं का अंकन देखने को मिलता है. इनमें यक्ष, देव पुरुष और मातृ देवियों के चित्र उकेरे जाने का प्रमाण मिलता है.
कैसे सामने आया गजलक्ष्मी का स्वरूप?
शुंगकालीन भरहुत स्तूप में एक देवी की मूर्ति मिलती है, जिसके साथ 'सिरिमा देवता' का अभिलेख है. सिरिमा को 'श्री' से जुड़ी देवी माना गया है. इसी दौर की मूर्तिकला में कमल पर खड़ी या बैठी स्त्री आकृतियां भी मिलती हैं, जिनका दोनों ओर से हाथी जलाभिषेक करते दिखाई देते हैं. प्राचीन कलिंग की जैन गुफाओं में भी ऐसे चित्रण मिलते हैं.
हाथियों से अभिषेक वाली देवी का यही स्वरूप आगे चलकर 'गजलक्ष्मी' के नाम से प्रसिद्ध हुआ. इन मूर्तियों से पता चलता है कि प्राचीन भारत में 'श्री' को समृद्धि और सौभाग्य की देवी के रूप में पहचान मिलने लगी थी. ऋग्वेद से जुड़े श्रीसूक्त में भी इसी 'श्री' की स्तुति मिलती है. समय के साथ देवी लक्ष्मी का यह स्वरूप और लोकप्रिय हुआ. आज भी दीपावली पर उनकी पूजा धन, सुख, सौभाग्य और समृद्धि की देवी के रूप में की जाती है.

गुप्तकाल में राजलक्ष्मी की प्रतिष्ठा
भारतीय इतिहास में गुप्तकाल लक्ष्मी की प्रतिमा-परंपरा के विकास का एक महत्वपूर्ण चरण रहा. चौथी से छठी शताब्दी ईस्वी के दौरान जारी अनेक गुप्तकालीन स्वर्ण मुद्राओं पर देवी लक्ष्मी या श्री से संबंधित आकृतियां दिखाई देती हैं. कहीं देवी सिंहासन पर विराजमान हैं, कहीं उनके हाथ में कमल है और कहीं उनका स्वरूप राजकीय समृद्धि का प्रतीक बनकर उभरता है. यहां लक्ष्मी की अवधारणा घरेलू मंगल से आगे बढ़कर राजकीय वैभव और सत्ता की प्रतिष्ठा से भी जुड़ती दिखाई देती है. समृद्ध राज्य, अनुकूल शासन और वैभवशाली राजसत्ता की सांस्कृतिक कल्पना में श्री का महत्वपूर्ण स्थान था.
लक्ष्मी और कमल... कैसे बने सौभाग्य के प्रतीक
देवी लक्ष्मी के स्वरूप में कमल का विशेष स्थान है. वे कमल पर विराजमान दिखाई देती हैं और अनेक चित्रों तथा मूर्तियों में उनके हाथों में भी कमल होता है. भारतीय दार्शनिक और काव्यपरंपरा में कमल सौंदर्य, पवित्रता और जीवन के विकास का प्रतीक रहा है. कीचड़ में उत्पन्न होकर भी अपनी निर्मलता बनाए रखने वाला कमल एक गहरी प्रतीकात्मक अनुभूति को जन्म देता है.
लक्ष्मी के साथ इसका संबंध समृद्धि की उस कल्पना को जाहिर करता है, जो केवल भौतिक वैभव नहीं, बल्कि जीवन की शोभा और मंगलमयता भी है. इसी तरह गजलक्ष्मी के साथ हाथी वर्षा, जल और धरती के उपजाऊपन से जुड़े प्रतीक हैं. जिस समाज में कृषि जीवन का आधार रही हो, वहां जल और वर्षा की कल्पना स्वाभाविक रूप से समृद्धि के साथ जुड़ती है.
प्राचीन संस्कृत साहित्य में दीपावली
दीपावली के इतिहास की एक महत्वपूर्ण कड़ी प्राचीन संस्कृत साहित्य में मिलती है. सांस्कृतिक इतिहासकार पी. के. गोडे ने अपने शोध 'द हिस्ट्री ऑफ दिवाली फेस्टिवल' (The History of Divali Festival) में दीपावली की प्राचीन परंपराओं का अध्ययन किया है. वहीं धर्मशास्त्र के विद्वान पी. वी. काणे ने भी अपनी पुस्तक 'हिस्ट्री ऑफ धर्मशास्त्र' (History of Dharmasastra) में इस पर्व से जुड़ी धार्मिक और सामाजिक परंपराओं का उल्लेख किया है.
वात्स्यायन के कामसूत्र में 'यक्षरात्रि'
वात्स्यायन के कामसूत्र में 'यक्षरात्रि' नाम के उत्सव का उल्लेख मिलता है. यक्षों का संबंध धन के देवता कुबेर से माना जाता है. इसी कारण कुछ विद्वान यक्षरात्रि को दीपावली की शुरुआती परंपराओं से जोड़ते हैं. हालांकि इसे आज की दीपावली जैसा ही पर्व मानने के पर्याप्त प्रमाण नहीं हैं. 12वीं शताब्दी के विद्वान हेमचंद्र की 'देशीनाममाला' में भी यक्षरात्रि और दीपावली के संबंध का संकेत मिलता है.
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हर्षवर्धन के संस्कृत नाटक में दीपावली
कश्मीर के प्राचीन ग्रंथ 'नीलमतपुराण' में दीपमाला उत्सव का वर्णन है. इसमें कार्तिक अमावस्या पर दीप जलाने और लक्ष्मी की आराधना की परंपरा का उल्लेख मिलता है. यह प्रसंग महत्वपूर्ण है, क्योंकि यहां दीपों का उत्सव और देवी लक्ष्मी की पूजा एक साथ दिखाई देते हैं. सातवीं शताब्दी के सम्राट हर्षवर्धन के संस्कृत नाटक 'नागानंद' में भी दीपोत्सव का उल्लेख मिलता है. इससे पता चलता है कि प्राचीन भारत में दीप जलाकर उत्सव मनाने की परंपरा काफी पुरानी है.
इस तरह दीपावली किसी एक पौराणिक कथा से जुड़ा पर्व नहीं, बल्कि अलग-अलग धार्मिक और लोकपरंपराओं से विकसित हुआ उत्सव है. समय के साथ इसमें भगवान राम की अयोध्या वापसी, देवी लक्ष्मी की आराधना और सुख-समृद्धि की कामना जैसी मान्यताएं जुड़ती गईं. यही कारण है कि राम की अयोध्या वापसी से जुड़े दीपोत्सव में आज देवी लक्ष्मी की पूजा भी प्रमुख स्थान रखती है.
दीपावली और लक्ष्मी पूजा का संबंध
लक्ष्मी आराधना की प्राचीनता और दीपावली पर लक्ष्मी पूजा की परंपरा को एक ही ऐतिहासिक घटना समझ लेना उचित नहीं है. भारत में दीपोत्सव के साथ विभिन्न धार्मिक कथाएं जुड़ी हुई हैं. कहीं इसे भगवान राम की अयोध्या वापसी से जोड़ा जाता है, तो कहीं भगवान कृष्ण और नरकासुर की कथा से. अनेक क्षेत्रों में राजा बलि, यमदीपदान और अन्य धार्मिक परंपराएं भी दीपावली के उत्सव का हिस्सा हैं. इन्हीं विविध परंपराओं के बीच कार्तिक अमावस्या पर लक्ष्मी आराधना का विशेष महत्व विकसित हुआ.
दीपावली पर घरों की सफाई, दीप जलाना, द्वारों की सजावट और लक्ष्मी का आवाहन भारतीय लोकविश्वास में मंगल तथा समृद्धि से जुड़ गए. व्यापारिक समुदायों में बहीखातों के पूजन और आर्थिक वर्ष के आरंभ की परंपराओं ने भी इस पर्व को खास बनाया. दीपावली की वर्तमान लक्ष्मी-गणेश पूजा किस शताब्दी में पहली बार शुरू हुई, इसका कोई एक निश्चित और सर्वमान्य ऐतिहासिक प्रमाण उपलब्ध नहीं है. यह परंपरा अलग-अलग धार्मिक तथा सामाजिक धाराओं के सम्मिलन से विकसित हुई प्रतीत होती है.

लक्ष्मी के साथ गणेश पूजा की परंपरा
दीपावली पूजा में देवी लक्ष्मी के साथ भगवान गणेश की आराधना अत्यंत प्रचलित है. लक्ष्मी जहां समृद्धि और ऐश्वर्य का प्रतीक हैं, वहीं गणेश बुद्धि, विवेक, शुभारंभ तथा विघ्नों के निवारण के देवता माने जाते हैं. दोनों की संयुक्त पूजा के पीछे लोकधर्म की एक सुंदर भावना दिखाई देती है कि धन के साथ विवेक भी जरूरी है. केवल संपत्ति जीवन को पूर्ण नहीं बनाती. उसके सदुपयोग के लिए बुद्धि, संयम और मंगल की भावना भी चाहिए.
देश के अलग-अलग हिस्सों में लक्ष्मी आराधना
भारतीय सांस्कृतिक विविधता ने लक्ष्मी पूजा को अनेक रूप दिए हैं. बंगाल में कोजागरी लक्ष्मी पूजा का विशेष महत्व है. महाराष्ट्र और उत्तर भारत के अनेक क्षेत्रों में दीपावली पर लक्ष्मी पूजन प्रमुख है. दक्षिण भारत के कई समुदायों में वरलक्ष्मी व्रत की परंपरा है, जिसमें देवी से परिवार के कल्याण और सौभाग्य की कामना की जाती है. इन परंपराओं में पूजा की तिथि, विधि और स्थानीय मान्यताएं भिन्न हो सकती हैं, लेकिन सभी में लक्ष्मी का संबंध शुभता तथा समृद्धि से बना रहता है.
यह विविधता भारतीय धर्मपरंपरा की उस विशेषता को प्रकट करती है, जिसमें एक ही देवी अलग-अलग क्षेत्रों की सांस्कृतिक स्मृतियों और लोकविश्वासों में विशिष्ट रूप ग्रहण करती हैं.
शरद पूर्णिमा और बंगाल की 'कोजागरी' परंपरा
बांग्ला परंपरा में देवी लक्ष्मी पूजा का सबसे खास दिन दीपावली नहीं, बल्कि विजयादशमी के बाद आने वाली शरद पूर्णिमा है. इसे 'कोजागरी पूजा' कहते हैं. यह देवी लक्ष्मी की आराधना का प्रमुख पर्व है. यह परंपरा विशेष रूप से पश्चिम बंगाल, ओडिशा, असम और पूर्वी भारत के अन्य क्षेत्रों में प्रचलित है. मान्यता है कि इस रात देवी लक्ष्मी पृथ्वी पर विचरण करती हैं और देखती हैं कि कौन जाग रहा है. 'कोजागरी' शब्द संस्कृत के 'को जागृति' यानी 'कौन जाग रहा है' से जुड़ा है. भक्त रातभर जागरण कर देवी की पूजा करते हैं और सुख-समृद्धि की कामना करते हैं. घरों में दीप जलाए जाते हैं, अल्पना बनाई जाती है और देवी को भोग अर्पित किया जाता है.
धन से कहीं व्यापक है लक्ष्मी की अवधारणा
लक्ष्मी आराधना का सबसे महत्वपूर्ण पक्ष उसका व्यापक सांस्कृतिक अर्थ है. वैदिक साहित्य में अन्न, पशुधन और सौभाग्य की कामना से लेकर पुराणों में दिव्य श्री तथा लोकजीवन में गृहलक्ष्मी की अवधारणा तक, देवी का स्वरूप निरंतर विकसित होता रहा है. भारतीय समाज में घर की समृद्धि को केवल तिजोरी में रखी संपत्ति से नहीं मापा गया. अन्न से भरा भंडार, परिवार का सुख, कृषि की उन्नति, अतिथि का स्वागत और जीवन में मंगल की उपस्थिति भी संपन्नता के संकेत रहे हैं. इसीलिए देवी लक्ष्मी भारतीय सांस्कृतिक स्मृति में केवल धन की स्वामिनी नहीं, बल्कि जीवन को सुंदर, समर्थ और समृद्ध बनाने वाली शक्ति का प्रतीक बन गईं.
इस तरह लक्ष्मी पूजा की परंपरा भारतीय सभ्यता की उस लंबी यात्रा का हिस्सा है, जिसमें समृद्धि कभी अन्न के रूप में पूजी गई, कभी जल और उर्वरता के रूप में, तो कभी राजसत्ता और ऐश्वर्य के प्रतीक के रूप में. वेदों की 'श्री' ने पुराणों में विष्णुप्रिया का स्वरूप पाया और प्राचीन शिल्पों में गजलक्ष्मी के रूप में प्रतिष्ठा प्राप्त की.
समय के साथ दीपावली के दीपों की रोशनी में यही देवी घर-घर की आराध्य बन गईं. इसीलिए कार्तिक अमावस्या की रात लक्ष्मी पूजा केवल धन की कामना नहीं, बल्कि उस सांस्कृतिक परंपरा का उत्सव भी है, जिसने जीवन की संपूर्ण समृद्धि को देवी का स्वरूप दिया.