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CJP का प्रोटेस्ट कैसे देश भर में आरक्षण-विरोधी मुहिम के लिए बन सकता है संजीवनी

पेपर लीक के ख़िलाफ़ CJP के विरोध-प्रदर्शन ने आरक्षण-विरोधी आंदोलन को जन्म दिया है और उसके लिए एक रूपरेखा तैयार की है. यही वजह है कि NEET-UG पेपर लीक को लेकर हुए विरोध-प्रदर्शनों ने कोटा सिस्टम पर बहस को फिर से छेड़ दिया है.

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एक आंदोलन खत्म, दूसरा शुरू (Photo-ITG)
एक आंदोलन खत्म, दूसरा शुरू (Photo-ITG)

कॉकरोच जनता पार्टी को वही मिला जो वह चाहती थी शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान का इस्तीफा. नीट (NEET) पेपर लीक और परीक्षा प्रणाली में कथित अनियमितताओं को लेकर एक महीने से चला आ रहा आंदोलन अब समाप्त हो गया है. विरोध-प्रदर्शन खत्म हो चुके हैं. नई दिल्ली के जंतर-मंतर से बैरिकेड्स हटा दिए गए हैं, लेकिन CJP के इस विरोध-प्रदर्शन का ही नतीजा एक नया तूफान खड़ा कर सकता है.

CJP के विरोध-प्रदर्शन का एक अप्रत्याशित परिणाम यह रहा कि अब आरक्षण-विरोधी अभियान तेजी पकड़ रहा है. यह भारत में जातिगत आरक्षण के राजनीतिक रूप से संवेदनशील और सामाजिक रूप से विस्फोटक मुद्दे को फिर से भड़काने की चेतावनी दे रहा है.

पिछले कुछ दिनों में, CJP की शैली वाले ऑनलाइन प्लेटफॉर्म 'आरक्षण हटाओ आंदोलन' (RHA) के नेतृत्व में सोशल मीडिया पर पोस्ट्स, रील्स और अभियानों की बाढ़ आ गई है. इस इंस्टाग्राम हैंडल ने छह दिन पहले अपनी पहली पोस्ट डाली थी और अब इसके 58 लाख से अधिक (5.8 मिलियन) फॉलोअर्स हो चुके हैं. जैसा कि नाम से ही जाहिर है, यह भारत में जातिगत आरक्षण में बदलाव या इसे पूरी तरह से समाप्त करने की मांग कर रहा है.

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आरक्षण-विरोधी बहस

समय बहुत ही नाजुक है और यह कई राजनीतिक हितधारकों के लिए मुश्किलें पैदा कर सकता है. सीजेपी (CJP) के नेतृत्व में नई दिल्ली में चले उग्र विरोध-प्रदर्शनों और यूजीसी (UGC) इक्विटी नियमों के कारण देश भर में हुए असंतोष के कुछ महीनों बाद, यह आरक्षण-विरोधी आंदोलन और सुलगता ध्रुवीकरण का माहौल, सार्वजनिक बहस को और अधिक विभाजित कर सकता है. इसने निश्चित रूप से सरकार को असहज किया होगा. वह भी तब, जब उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव में महज कुछ ही महीने बाकी हैं और भारत के इस सबसे बड़े राज्य में जाति ही सर्वोपरि है.

नीट (NEET) विरोध-प्रदर्शनों के दौरान आरक्षण-विरोधी बहस को एक नया दर्शक वर्ग मिला. लोगों का दावा था कि मई में पेपर लीक होने के बाद आत्महत्या करने वाले अधिकांश नीट अभ्यर्थी सामान्य वर्ग से थे, उनका तर्क था कि आरक्षण प्रणाली ने सामान्य वर्ग के छात्रों के लिए परीक्षा को बहुत कठिन बना दिया है.

विरोध-प्रदर्शन खत्म होने के बाद भी यह आरक्षण-विरोधी बहस जारी है. भले ही सीजेपी आंदोलन को लेकर समर्थक और आलोचक आपस में भिड़ गए हों, लेकिन जातिगत आरक्षण की पुरानी दरारें फिर से उभर आई हैं. इसके अलावा, ऑनलाइन माध्यम से लोगों को जुटाने में सीजेपी की सफलता ने आरक्षण-विरोधी मांगों को बढ़ावा देने वाले अभियानों के लिए (कम से कम इंटरनेट पर) एक ढांचा तैयार कर दिया है. RHA की वेबसाइट आश्चर्यजनक रूप से CJP जैसी ही दिखती है वैसा ही रंग-संयोजन और एआई-जनरेटेड सामग्री की भरमार.

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इसे बेहतर तरीके से समझने के लिए कि अभी क्या चल रहा है और पिछले कुछ समय से क्या चल रहा है, आइए कुछ महीने पीछे चलते हैं.

क्या UGC विवाद ने आरक्षण-विरोधी माहौल की नींव रखी?

वैसे तो जातिगत आरक्षण का विरोध उतना ही पुराना है जितना कि खुद आरक्षण प्रणाली, लेकिन CJP के विरोध-प्रदर्शनों के दौरान इस बहस को एक बार फिर जगह मिली. आरक्षण की शुरुआत जातिगत भेदभाव को खत्म करने के लिए की गई थी. हालांकि, आज के आरक्षण-विरोधी पक्ष के कई लोगों का तर्क है कि खुद आरक्षण को समाप्त करने से ही जातिगत भेदभाव को खत्म करने में मदद मिलेगी. यह बहस हमेशा की तरह पेचीदा, बांटने वाली और विवादित बनी हुई है.

यह विवाद ऐसे समय में सामने आया है, जब कुछ ही महीने पहले UGC के 'उच्च शिक्षण संस्थानों में समानता को बढ़ावा देने वाले नियम, 2026' (Promotion of Equity Regulations) को लेकर देश के कई हिस्सों, खासतौर पर हिंदी भाषी राज्यों में बड़ा हंगामा हुआ था. इन नियमों के तहत परिसरों में जातिगत भेदभाव को रोकने के लिए 'इक्विटी समितियां', 'इक्विटी दस्ते' और शिकायत निवारण तंत्र बनाए गए थे.

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आरक्षित वर्गों और जातियों ने इन नियमों को उच्च शिक्षा को अधिक समावेशी बनाने की दिशा में एक बहुत पुराना और जरूरी कदम बताया. दूसरी ओर, विरोध करने वाले लोग अचानक सड़कों पर उतर आए, उनका तर्क था कि ये नियम मुख्य रूप से केवल SC, ST और OBC छात्रों के खिलाफ होने वाले भेदभाव को पहचानते हैं, और अनारक्षित वर्ग को कोई सुरक्षा नहीं देते. सामान्य वर्ग के छात्रों का कहना था कि इसके कई प्रावधान अस्पष्ट, एकतरफा और दुरुपयोग के लिए खुले हैं. इसी बीच, नई दिल्ली में UGC मुख्यालय के बाहर विरोध-प्रदर्शन शुरू हो गए और देखते ही देखते कई राज्यों के परिसरों में फैल गए.

इस विवाद का जवाब देते हुए तत्कालीन शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान ने छात्रों को भरोसा दिलाने की कोशिश की थी. उन्होंने कहा था, "नए UGC नियमों से किसी के साथ भेदभाव या अत्याचार नहीं होगा, चाहे UGC हो, केंद्र सरकार हो या राज्य सरकारें, यह सुनिश्चित करना हमारी जिम्मेदारी होगी कि कानून का दुरुपयोग न हो."

आखिरकार यह मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंचा, जनवरी में, मुख्य न्यायाधीश (CJI) सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली पीठ ने इन नियमों पर रोक लगा दी, उन्होंने टिप्पणी की कि कई प्रावधान पहली नज़र में अस्पष्ट और दुरुपयोग के योग्य प्रतीत होते हैं. हालांकि ये नियम कभी लागू नहीं हो सके, लेकिन इस विवाद ने आरक्षण की बहस को राजनीतिक रूप से जीवित रखा और सड़कों पर होने वाले संभावित आंदोलनों की आशंका को उजागर कर दिया. 

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नीट पेपर लीक पर सीजेपी के विरोध-प्रदर्शनों ने आरक्षण-विरोधी आवाज़ों को कैसे बढ़ाया?

जैसे ही फरवरी तक UGC नियमों का हंगामा शांत हुआ, एक और नया मुद्दा सामने आ गया. मई में NEET-UG पेपर लीक होने के बाद, CJP के आंदोलन ने जोर पकड़ लिया और देशभर के युवाओं व छात्रों का ध्यान अपनी ओर खींच लिया. वैसे तो इस आंदोलन की मुख्य वजह पेपर लीक और परीक्षाओं में बार-बार होने वाली गड़बड़ियां थीं, लेकिन हजारों छात्र सड़कों और सोशल मीडिया पर उतर आए और भारत की शिक्षा व्यवस्था से अपनी नाराजगी जताने लगे. जंतर-मंतर इस आंदोलन का मुख्य केंद्र बन गया, वहीं कार्यकर्ता सोनम वांगचुक की लंबी भूख हड़ताल ने इस अभियान को और ज्यादा मजबूती दी.

पेपर लीक और परीक्षा सुधारों के साथ-साथ जातिगत आरक्षण की जरूरत पर भी बहस फिर से शुरू हो गई और इसकी शुरुआत हुई CJP के अनौपचारिक गढ़, यानी जंतर-मंतर से ही. जंतर-मंतर से आ रहीं कुछ जातिवादी टिप्पणियां और पोस्ट सोशल मीडिया पर वायरल हो गईं, क्योंकि CJP का जुड़ाव 'अंबेडकरवाद' और दलित हितों से जुड़े वामपंथी संगठनों से भी था. इसके बाद कई दक्षिणपंथी सोशल मीडिया इन्फ्लुएंसर्स ने 'सामान्य वर्ग' के छात्रों से इस आंदोलन से दूर रहने की अपील की. उन्होंने CJP को मेरिट के खिलाफ और आरक्षण के समर्थन में खड़ा दिखाया. 

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आरक्षण का विरोध करने वाले लोगों ने पेपर लीक, बेरोजगारी और घटते अवसरों को सीधे देश की आरक्षण नीति से जोड़ दिया. उनका तर्क था कि बार-बार होने वाले परीक्षा घोटालों ने सामान्य वर्ग की सीटों के लिए मुकाबला और ज्यादा कठिन बना दिया है, इसी बीच, वाशिंगटन डीसी के भारतीय-अमेरिकी लेखक-पत्रकार सदानंद धुमे के 'वॉल स्ट्रीट जर्नल' में छपे एक लेख ने भारत की आरक्षण प्रणाली की तुलना चीन के 'योग्यता-आधारित मॉडल' से कर दी. इससे इस बहस को और ज्यादा हवा मिल गई. 

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आनंद रंगनाथन, हर्ष दुबे और 'ब्राह्मण जींस' ने आरक्षण की बहस को जीवित रखा

जातिगत आरक्षण के खिलाफ माहौल बनाने वाले लोगों में लेखक आनंद रंगनाथन भी शामिल थे, उनका तर्क था कि आरक्षण को पूरी तरह खत्म करने के बजाय इसे प्रति परिवार केवल एक पीढ़ी तक ही सीमित कर देना चाहिए. आरजे रौनक को दिए एक इंटरव्यू में अपना पक्ष रखते हुए उन्होंने कहा, "मैं आरक्षण का पूरा समर्थन करता हूं,  लेकिन मेरा मानना है कि यह एक परिवार में केवल एक बार ही दिया जाना चाहिए, क्योंकि कोटा की सीटें सीमित हैं. अभी अगर कोई अमीर परिवार तीन पीढ़ियों  से कोटे का इस्तेमाल कर रहा है, तो उनके पास तीन सीटें चली जाती हैं. नतीजतन, उसी समुदाय के तीन बेहद गरीब परिवारों को बिल्कुल कुछ नहीं मिल पाता."

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रंगनाथन ने आगे कहा, "इसे केवल एक पीढ़ी तक सीमित करने से यह फायदा सिर्फ ऊपर के लोगों तक ही घूमना बंद हो जाएगा और आखिरकार यह उन सबसे गरीब लोगों तक पहुंचेगा, जिन्हें वास्तव में इसकी जरूरत है."

लगभग इसी समय आरक्षण की यह बहस टीवी चैनलों तक भी पहुंच गई, एक निजी चैनल पर टीवी डिबेट के दौरान NEET अभ्यर्थी हर्ष दुबे ने भारत की जातिगत आरक्षण व्यवस्था पर बड़े भावुक होकर सवाल उठाए, माहौल काफी भावुक हो गया था. अपनी कुर्सी से खड़े होकर, हाथों से इशारा करते हुए और ऊंची आवाज में उन्होंने आरक्षण प्रणाली पर सवाल खड़े किए. कई बार NEET परीक्षा दे चुके और 627 अंक लाने के बावजूद सरकारी मेडिकल सीट पाने से चूके दुबे ने तर्क दिया कि जब देश पेपर लीक पर चर्चा कर रहा था, तब कोई भी सामान्य वर्ग के छात्रों की चुनौतियों पर बात नहीं कर रहा था.

विभिन्न वर्गों के कट-ऑफ, राज्य कोटे और दाखिले के मानकों में अंतर की तरफ इशारा करते हुए उन्होंने पूछा, "आरक्षण पर कौन बात करेगा?" इस डिबेट की क्लिप सोशल मीडिया पर वायरल हो गई और इसने प्रतियोगी व प्रवेश परीक्षाओं में समानता बनाम योग्यता की पुरानी बहस को फिर से भड़का दिया.

इसी समय के आसपास, सोशल मीडिया पर CJP समर्थकों के खिलाफ जातिवादी हमले भी तेजी से बढ़ते हुए दिखाई देने लगे. 

'BrahminGenes" सोशल मीडिया हैंडल से जुड़ीं एक प्रमुख आरक्षण-विरोधी कार्यकर्ता, अनुराधा तिवारी, CJP के विरोध-प्रदर्शनों के दौरान ही इस बहस में शामिल हो गईं. जंतर-मंतर पर मौजूद सामान्य वर्ग के प्रदर्शनकारियों से अपील करते हुए उन्होंने कहा, "मेरा सभी सामान्य वर्ग के लोगों से अनुरोध है कि यदि आप किसी छात्र आंदोलन में शामिल हो रहे हैं, तो कृपया आरक्षण का मुद्दा जरूर उठाएं. इस अवसर का लाभ उठाएं, यही आपका सही समय है."

तिवारी ने पोस्टर्स और बैनर साझा करते हुए कहा कि आरक्षण योग्यताधारी छात्रों से जुड़ा एक मुख्य मुद्दा है. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के चर्चित पहले इंस्टाग्राम वीडियो को शेयर करते हुए तिवारी ने कहा, "आप सिर्फ एक फैसले से अपनी खोई हुई पूरी साख वापस पा सकते हैं. जातिगत आरक्षण को खत्म करके आर्थिक आरक्षण लागू कर दीजिए. हो सकता है कि आप अगला चुनाव हार जाएं, लेकिन आपका नाम इतिहास में दर्ज हो जाएगा,"

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कोटा आलोचकों का दावा: आरक्षण नीति ही नीट अभ्यर्थियों की आत्महत्याओं के पीछे की वजह

सीजेपी (CJP) के विरोध-प्रदर्शनों के दौरान, कई लोगों ने यह दावा किया कि आरक्षित श्रेणियों के लिए कम कट-ऑफ ने अनुचित प्रतिस्पर्धा और हताशा का माहौल पैदा किया. नतीजतन, भारत में कई छात्रों ने शैक्षणिक दबाव और अपने साथ हुए भेदभाव के कारण आत्महत्या कर ली. भारतीय-अमेरिकी शिक्षाविद राजेश्वरी अय्यर ने X पर लिखा कि "नीट पेपर लीक के बाद 21 छात्रों ने आत्महत्या की", जिनमें से उनके अनुसार "19 छात्र सामान्य वर्ग से थे," अय्यर ने सवाल पूछा, "अगर आरक्षण का मकसद समान अवसर पैदा करना था, तो इतने सारे सामान्य वर्ग के छात्रों को क्यों लगा कि उनके पास दूसरा कोई मौका ही नहीं है?"

उन्होंने आगे कहा, "यह एक ऐसा सवाल है जो गंभीर चर्चा का हकदार है.' नई दिल्ली के चार्टर्ड अकाउंटेंट नितिन कौशिक ने दावा किया कि "आरक्षण के कारण हर साल 15,000 छात्र आत्महत्या करते हैं." नीट-यूजी (NEET-UG) पेपर लीक के बाद, आक्रोश उस तर्कहीन कट-ऑफ पर भी केंद्रित था जिसके आधार पर दाखिले होते हैं. नीट-पीजी 2025 (NEET-PG 2025) काउंसलिंग को लेकर ऐसी ही एक चिंता अंशुल सक्सेना नाम के व्यक्ति ने X पर उजागर की.

एक विस्तृत पोस्ट में, उन्होंने दावा किया कि नीट-पीजी 2025 काउंसलिंग के दौरान स्नातकोत्तर (PG) मेडिकल सीटें बेहद कम अंकों पर आवंटित की गईं. उदाहरण देते हुए उन्होंने दावा किया कि हैदराबाद के एक मेडिकल कॉलेज में एमएस ऑर्थोपेडिक्स की सीट 800 में से महज 1 अंक पर भरी गई, एक ऑर्थोपेडिक्स सीट 800 में से 4 अंक पर, जनरल सर्जरी 47 पर, प्रसूति एवं स्त्री रोग 44 पर, बायोकैमिस्ट्री -8 पर और एनाटॉमी 800 में से 11 अंकों पर आवंटित की गई, उन्होंने आगे दावा किया कि "800 में से -40 तक अंक पाने वाले उम्मीदवारों को भी पीजी काउंसलिंग में भाग लेने की अनुमति दी गई थी", और निगेटिव अंकों को भी क्वालीफाइंग मान लिया गया था."

इन आंकड़ों को "शैक्षणिक मानकों में एक गंभीर संकट" बताते हुए सक्सेना ने तर्क दिया कि "चिकित्सा शिक्षा और स्वास्थ्य सेवा प्रणाली की अखंडता बनाए रखने के लिए एक उचित न्यूनतम योग्यता अंक निश्चित होना चाहिए." उन्होंने यह भी आरोप लगाया कि "न तो सरकार और न ही विपक्ष ने एक शब्द कहा" क्योंकि यह मुद्दा उनके "राजनीतिक हितों" के अनुकूल नहीं था.

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इस पोस्ट पर प्रतिक्रिया देते हुए, बेंगलुरु के व्यवसायी मोहनदास पई ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को टैग किया और लिखा, "यह छात्रों की शिकायतों का एक बड़ा कारण है... 90%+ अंक लाने वाला सामान्य वर्ग का छात्र सीट नहीं पाता, लेकिन कम अंक पाने वाले अन्य श्रेणियों के उम्मीदवार दाखिला ले लेते हैं! इसका समाधान जरूरी है."

क्या 'आरक्षण हटाओ आंदोलन' सीजेपी के नीट प्रदर्शनों से भी बड़ी राजनीतिक परीक्षा है?

25 जुलाई को धर्मेंद्र प्रधान का इस्तीफा ऑनलाइन और ऑफलाइन अभियानों की ताकत को दर्शाता है. सीजेपी (CJP) की इस "राजनीतिक जीत" ने अन्य मुद्दों की लड़ाई के लिए भी एक मंच और अवसर प्रदान किया. नीट आंदोलन धीमा पड़ने के बाद, सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स पर "केवल योग्यता" आधारित व्यवस्था की मांगें काफी तेज हो गईं.

इसके बाद अगला चरण आया, विरोध-प्रदर्शन खत्म होने के कुछ ही दिनों के भीतर, इंस्टाग्राम-संचालित 'आरक्षण हटाओ आंदोलन' (RHA) अचानक से इंटरनेट पर छा गया, इसने महज कुछ दिनों में लाखों फॉलोअर्स हासिल कर लिए. खुद को (CJP की तरह) एक नागरिक-नेतृत्व वाला और गैर-पक्षपाती आंदोलन बताते हुए, इसने जातिगत आरक्षण को समाप्त करने, आर्थिक मानदंडों पर अधिक निर्भरता, आधिकारिक फॉर्मों से जाति की पहचान हटाने और "एक राष्ट्र, एक पहचान" के ढांचे की मांग की.

हालांकि अभी तक सड़कों पर किसी बड़े प्रदर्शन का ऐलान या आयोजन नहीं हुआ है, लेकिन ऐसा लगता है कि इस अभियान ने भी वही डिजिटल-फर्स्ट रणनीति अपनाई है, इसमें वायरल वीडियो, इन्फ्लुएंसर्स द्वारा तैयार सामग्री और सोशल मीडिया पर आरक्षण-विरोधी बातों का लगातार प्रचार शामिल है.

दूसरी ओर, आरक्षण के समर्थकों ने जातिगत आरक्षण के खिलाफ दिए जा रहे तर्कों को सिरे से खारिज कर दिया है. उनका कहना है कि आरक्षण कोई गरीबी उन्मूलन योजना नहीं है, बल्कि यह सदियों से चले आ रहे जातिगत बहिष्कार और भेदभाव को दूर करने के लिए बनाया गया एक संवैधानिक साधन है, कई विद्वानों, दलित संगठनों और सामाजिक न्याय के पैरोकारों का तर्क है कि जाति की जगह सिर्फ आर्थिक आधार अपनाना, भारत में सकारात्मक कार्रवाई के ऐतिहासिक आधार को नजरअंदाज करना होगा. वे इस बात पर भी जोर देते हैं कि सुप्रीम कोर्ट ने बार-बार आरक्षण को वास्तविक समानता लाने वाले माध्यम के रूप में स्वीकार किया है.

RHA भविष्य में चाहे जो भी रुख अपनाए या कोई भी सफलता हासिल करे, लेकिन इसका समय इसे राजनीतिक रूप से बेहद संवेदनशील बना देता है, उत्तर प्रदेश और पंजाब सहित कई राज्यों में कुछ ही महीनों में चुनाव होने वाले हैं, और चुनाव में जाति सबसे बड़े कारकों में से एक है. जैसा कि पहले भी चर्चा की जा चुकी है, आरक्षण का उद्देश्य जातिगत भेदभाव को कम करना था, इसके आलोचकों का अब तर्क है कि इसे हटाने से भी वही हासिल होगा, लेकिन शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे की CJP की मांग के विपरीत, यह एक ऐसी मांग है जिसका शायद ही कोई राजनीतिक दल खुले तौर पर समर्थन करे. जातिगत समीकरणों का दांव बहुत बड़ा है, और कोई भी राजनीतिक दल इस आग से खेलने का जोखिम नहीं उठाना चाहेगा.

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