scorecardresearch
 

चड्ढा पर चुप, जज के खिलाफ सत्याग्रह- आखिर क्या है केजरीवाल की स्ट्रैटेजी?

अरविंद केजरीवाल फिलहाल कानूनी, राजनीतिक और चुनावी मोर्चों पर एक साथ जूझ रहे हैं. राघव चड्ढा से मिले जोर के झटके से उबरने की कोशिश तो है ही, दिल्ली शराब घोटाला केस की सुनवाई के मामले में भी सत्याग्रह कर रहे हैं. चुनौती दिल्ली की राजनीति में बने रहने के साथ ही, पंजाब की सत्ता बचाए रखने की भी है.

Advertisement
X
आम आदमी पार्टी के राष्ट्रीय संयोजक अरविंद केजरीवाल. (Photo: PTI)
आम आदमी पार्टी के राष्ट्रीय संयोजक अरविंद केजरीवाल. (Photo: PTI)

अरविंद केजरीवाल की राजनीति में संघर्ष स्थाई भाव है. मुश्किलें कभी कभी ज्यादा बढ़ जाती हैं. जैसे दिल्ली चुनाव से पहले जेल जाना पड़ा था, और अब पंजाब चुनाव से पहले राघव चड्ढा सहित 7 सांसद आम आदमी पार्टी छोड़कर बीजेपी में चले गए. अचानक दिल्ली जैसा ही संकट अरविंद केजरीवाल के सामने पंजाब के मामले में भी मंडराने लगा है. पंजाब में अगले साल विधानसभा के चुनाव होने हैं.

जिस एक्साइज पॉलिसी केस को लेकर जेल जाना पड़ा था, स्पेशल कोर्ट से अरविंद केजरीवाल डिस्चार्ज भी हो गए थे. अब सीबीआई की अपील पर मामला दिल्ली हाई कोर्ट पहुंचा है. जज के रिक्यूजल की अपील खारिज हो जाने के बाद अरविंद केजरीवाल और उनके साथी सत्याग्रह कर रहे हैं. संघर्ष का एक नया मोर्चा यह भी है. 

और इसी बीच गुजरात से स्थानीय चुनाव के नतीजे भी आए हैं. अव्वल तो बीजेपी ने सभी 15 नगर निगमों में जीत हासिल की है, लेकिन आदिवासी बहुल नर्मदा जिले के नतीजे आम आदमी पार्टी के लिए वैसे ही राहत भरे हैं, जैसे 2025 में दिल्ली की हार के बाद पंजाब और गुजरात के उपचुनावों में जीत मिली थी - मौजूदा संघर्ष में अरविंद केजरीवाल हर मोर्चे पर अलग अलग तरीके से आगे बढ़ रहे हैं, जो एक खास स्ट्रैटेजी के तहत हो रहा है.  

Advertisement

चड्ढा पर चुप क्यों हैं केजरीवाल

राघव चड्ढा पर अरविंद केजरीवाल कुछ कुछ वैसे ही चुप हैं, जैसे स्वाति मालीवाल के मामले में देखे गए थे. स्वाति मालीवाल के मामले में जब पहली बार कुछ बोले, तो उसमें अपने सहयोगी बिभव कुमार का बचाव ही ज्यादा नजर आया था - और जैसे उस वक्त एक्शन से अपना इरादा जाहिर कर रहे थे, अब भी वैसा ही कर रहे हैं. 

राजघाट पर अरविंद केजरीवाल गए तो थे, सत्याग्रह के लिए. लेकिन वहां शक्ति प्रदर्शन ज्यादा नजर आया. यह चुप रहकर एक्शन से जवाब देने जैसा ही तो है. स्वाति मालीवाल वाली घटना के बाद अरविंद केजरीवाल की लखनऊ यात्रा में बिभव कुमार की तस्वीर खूब बायरल हुई थी. तब अरविंद केजरीवाल का एक्शन राजनीतिक बयान ही तो था.

सत्याग्रह के लिए राजघाट जाने का कार्यक्रम अरविंद केजरीवाल ने सोशल मीडिया पर पहले ही बता दिया था. अरविंद केजरीवाल के राजघाट पहुंचने से पहले ही मीडिया का जमावड़ा हो चुका था. अरविंद केजरीवाल के साथ दिल्ली के पूर्व डिप्टी सीएम मनीष सिसोदिया, और पूर्व मुख्यमंत्री आतिशी के अलावा बड़ी संख्या में आम आदमी पार्टी के नेता भी राजघाट पहुंचे थे - सत्याग्रह के बहाने ये सब अरविंद केजरीवाल का शक्ति प्रदर्शन नहीं तो क्या था. 

Advertisement

शक्ति प्रदर्शन में ही राघव चड्ढा को अरविंद केजरीवाल का जवाब भी था. असल में बगावत के बाद राघव चड्ढा की तरफ से दावा किया गया था कि सांसदों के अलावा आम आदमी पार्टी के और भी नेता उनके संपर्क में हैं. राजघाट की जमघट के जरिए अरविंद केजरीवाल की कोशिश यही संदेश देने की रही कि सब उनके साथ ही हैं. 

अभी तक तो राघव चड्ढा के मामले में अरविंद केजरीवाल ने अपनी तरफ से कुछ कहा नहीं है. हां, उनके मन की बात संजय सिंह ने फौरन ही मीडिया के सामने आकर सुना दी थी. बाद में भी मोर्चा संजय सिंह ही संभाले नजर आ रहे हैं. अभी तो ऐसा ही लगता है. 

जज के खिलाफ सत्याग्रह से क्या मिलेगा

दिल्ली हाई कोर्ट की जज जस्टिस स्वर्णकांता शर्मा के खिलाफ अरविंद केजरीवाल का सत्याग्रह कानूनी लड़ाई नाकाम हो जाने के बाद राजनीतिक कवायद है. वैसे जज के खिलाफ रिक्यूजल वाली याचिका पर सुनवाई के दौरान पैरवी भी तो राजनीतिक मुहिम ही थी. जस्टिस स्वर्णकांता ने भी बीच में बताया ही था कि चूंकि अरविंद केजरीवाल वकील नहीं हैं, इसलिए वो भी जिरह को वैसे ही ले रही हैं. जो भी बहस हुई, वो सब कोर्ट में बयान दर्ज कराने जैसा ही था. जस्टिस स्वर्णकांता शर्मा ने अरविंद केजरीवाल के बयान को डिक्टेट करके दर्ज भी वैसे ही कराया था - और बाद में याचिका खारिज करते हुए कहा कि सुनवाई भी खुद करेंगी. 

Advertisement

अरविंद केजरीवाल ने केस की पैरवी से पहले भी पत्र लिखे थे, याचिका खारिज होने के बाद भी लिखा है. अरविंद केजरीवाल को फॉलो करते हुए मनीष सिसोदिया और आम आदमी पार्टी के नेता दुर्गेश पाठक ने जस्टिस स्वर्णकांता शर्मा को पत्र लिखा है. अपना पत्र सोशल साइट X पर शेयर करते हुए दुर्गेश पाठक ने लिखा है, न्याय सिर्फ होना ही नहीं चाहिए, बल्कि दिखना भी चाहिए.

दुर्गेश पाठक कहते हैं, सम्मानपूर्वक और विनम्रता के साथ मैंने जस्टिस स्वर्ण कांता शर्मा को लिखा है कि मैं भी अरविंद केजरीवाल और मनीष सिसोदिया के साथ कानूनी प्रक्रिया में हिस्सा नहीं लूंगा. न तो व्यक्तिगत रूप से और न ही वकील के माध्यम से.

सत्याग्रह से पहले अरविंद केजरीवाल ने एक्स पर एक वीडियो पोस्ट किया, और कहा, जस्टिस स्वर्णकांता शर्मा जी से न्याय मिलने की मेरी उम्मीद टूट चुकी है... अपनी अंतरात्मा की आवाज सुनते हुए, गांधी जी के सिद्धांतों को मानते हुए और सत्याग्रह की भावना के साथ, मैंने फैसला किया है कि मैं इस केस में उनके सामने पेश नहीं होऊंगा और कोई दलील भी नहीं रखूंगा.

अरविंद केजरीवाल के स्टैंड को कानून के कई जानकार सही नहीं मानते, लेकिन आम आदमी पार्टी के संस्थापकों में शुमार रहे, जाने माने वकील प्रशांत भूषण पुराने सहयोगी का सपोर्ट किया है. प्रशांत भूषण को योगेंद्र यादव के साथ ही आम आदमी पार्टी से बाहर कर दिया गया था. 

Advertisement

सोशल साइट X पर अरविंद केजरीवाल का पत्र शेयर करते हुए प्रशांत भूषण ने लिखा है, जस्टिस स्वर्णकांता शर्मा की अदालत में, सीबीआई की अपील पर, जिसमें उनको डिस्चार्ज किए जाने को चैलेंज किया गया है, सुनवाई में हिस्सा न लेने का अरविंद केजरीवाल का फैसला सही और न्यायोचित है. निस्संदेह, इस मामले के तथ्यों को देखते हुए उन्हें पक्षपात की आशंका का उचित आधार है. मैं कहूंगा कि उनकी यह आशंका पूरी तरह जायज है.

यह मामला न्यायपालिका और विधायिका के टकराव का तो नहीं है, लेकिन हाई कोर्ट के एक जज और एक पूर्व मुख्यमंत्री के बीच का मामला होने, और कानूनी से ज्यादा राजनीतिक हो जाने से अहम तो हो ही गया है. अपना स्टैंड साफ करते हुए अरविंद केजरीवाल का कहना है कि यह मुश्किल फैसला उनको इसलिए लेना पड़ा क्योंकि उनको साफ तौर पर लगा है कि कोर्ट में चल रही कार्यवाही उस मूल सिद्धांत के पैमानों पर नहीं टिक रही जिसमें कहा गया है कि इंसाफ सिर्फ होना ही नहीं चाहिए, इंसाफ होता हुआ नजर भी आना चाहिए. 

गुजरात से AAP को क्या उम्मीद है

दिल्ली चुनाव में हार के ठीक बाद अरविंद केजरीवाल और उनकी टीम को जीत का स्वाद चखने का मौका गुजरात में विसावदर और पंजाब में लुधियाना वेस्ट उपचुनाव में ही मिला था. उपचुनाव से पहले तो अरविंद केजरीवाल का ज्यादा जोर पंजाब पर ही था, लेकिन नतीजे आने के बाद गुजरात पर भी गंभीर होकर ध्यान देने लगे. इतना ध्यान कि दिल्ली जैसे छूटी हुई लग रही थी. 

Advertisement

गुजरात से आम आदमी पार्टी को काफी उम्मीदें हैं. गुजरात में भी 2027 में ही विधानसभा के लिए चुनाव होने हैं, लेकिन पंजाब के बाद. 26 अप्रैल को गुजरात में हुए निकाय चुनाव नतीजे अरविंद केजरीवाल के लिए झटका माने जा रहे हैं, क्योंकि आम आदमी पार्टी जगह जगह कांग्रेस से भी पिछड़ गई है. असल में 2022 के विधानसभा चुनाव में आम आदमी पार्टी को 5 सीटें मिल जाने के बाद कांग्रेस के लिए गुजरात का मैदान मुश्किल लगने लगा था. 

गुजरात के स्थानीय निकाय चुनावों में बीजेपी को 937, कांग्रेस को 95 और आम आदमी पार्टी को 10 सीटें मिली हैं. नगर पालिका में बीजेपी ने 1988, कांग्रेस ने 459 और आम आदमी पार्टी ने 48 सीटें जीती हैं. जिला पंचायत चुनावों में बीजेपी को 887, कांग्रेस को 136 जबकि AAP को 57 सीटें मिली हैं. तालुका पंचायत चुनाव के नतीजों में बीजेपी ने 3667, कांग्रेस ने 1050, और AAP ने 397 सीटें जीत ली हैं. 

2021 में आम आदमी पार्टी को सूरत में 27 सीटें जीती थी, और नेता विपक्ष पद हासिल किया था. 2022 के विधानसभा चुनाव में यही जीत आम आदमी पार्टी के आगे बढ़कर देखने का आधार बनी थी. उस जीत में मनोज सोरठिया की बड़ी भूमिका मानी गई थी, लेकिन इस बार पाटीदार समुदाय से आने वाले मनोज सोरठिया की हार ने आम आदमी पार्टी को तगड़ा झटका दिया है. मनोज सोरठिया संगठन मंत्री के रूप में गुजरात में मोर्चा संभालते आ रहे हैं. मनोज सोरठिया के चुनाव प्रचार के लिए मनीष सिसोदिया और संजय सिंह ने खूब मेहनत की थी, लेकिन बात नहीं बनी. 

Advertisement

फिर भी आपदा में अवसर की तरह आदिवासी बहुल नर्मदा जिले में आम आदमी पार्टी के प्रदर्शन में उम्मीद की बड़ी किरण दिखाई दे रही है. नर्मदा जिला पंचायत की 22 में से 15 सीटों पर AAP का कब्जा और 6 में से 4 तालुका पंचायतों में मिली जीत ने आम आदमी पार्टी का जोश कायम रखा है. 

नर्मदा में आम आदमी पार्टी को मिली सफलता के पीछे विधायक चैतर वसावा की मेहनत को श्रेय दिया जा रहा है. आदिवासी अधिकारों के साथ जंगल और जमीन के मुद्दों पर लगातार आवाज उठाने वाले चैतर वसावा ने जनता के बीच जो भरोसा बनाया है, जीत उसी का रिजल्ट है. 

चौतरफा चुनौतियों के बीच केजरीवाल के लिए क्या है?

बेशक अरविंद केजरीवाल चौतरफा चुनौतियों से जूझ रहे हैं, लेकिन हर मोर्चे पर डटे हुए देखे जा सकते हैं. दिल्ली शराब घोटाला केस में कानूनी लड़ाई को भी अरविंद केजरीवाल राजनीति तरीके से लड़ रहे हैं. दिल्ली हाई कोर्ट में जज के रिक्यूजल पर फैसले के दिन अरविंद केजरीवाल चेन्नई वर्चुअल माध्यम से पेश हुए थे - और बाकी समय तमिलनाडु के मुख्यमंत्री एमके स्टालिन के लिए चुनाव प्रचार कर रहे थे. 

वैसे ही ममता बनर्जी के लिए वोट मांगने अरविंद केजरीवाल पश्चिम बंगाल भी गए थे. दिल्ली विधानसभा चुनाव में तृणमूल कांग्रेस और समाजवादी पार्टी ने अरविंद केजरीवाल को समर्थन दिया था. अखिलेश यादव ने तो दिल्ली में चुनाव प्रचार भी किया था. 

विपक्षी गठबंधन INDIA ब्लॉक से दूरी बनाते हुए अरविंद केजरीवाल अपनी पसंद के हिसाब से साथी दलों के सपोर्ट में अक्सर खड़े नजर आते हैं. करीब करीब वैसे ही जैसे ममता बनर्जी इंडिया ब्लॉक में होती भी हैं, और नहीं भी - सत्याग्रह अपनी जगह है, लेकिन अरविंद केजरीवाल के सामने तो सबसे बड़ा चैलेंज पंजाब विधानसभा चुनाव ही है. 

पंजाब में सत्ता में वापसी की कोशिश के साथ साथ अरविंद केजरीवाल के जो भी कदम हैं, चाहे गुजरात में चुनावी गतिविधि या फिर जस्टिस स्वर्णकांता शर्मा के खिलाफ सत्याग्रह - अरविंद केजरीवाल के निशाने पर तो प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ही हैं.

---- समाप्त ----
Live TV

Advertisement
Advertisement