के. अन्नामलाई जब चेन्नई एयरपोर्ट पर पहुंचे तो एक बात ने सबका ध्यान खींचा, उनकी गाड़ी पर बीजेपी का झंडा नहीं लगा था. के. अन्नामलाई दिल्ली में हैं. बीजेपी अध्यक्ष नितिन नवीन और राष्ट्रीय महासचिव बीएल संतोष से उनकी मुलाकात हो गई है. वे गृह मंत्री अमित शाह से भी मिलेंगे.
दिल्ली रवाना होते वक्त चेन्नई एयरपोर्ट पर जब अन्नामलाई से बीजेपी छोड़ने और नई पार्टी बनाने की चर्चाओं के बारे में पूछा गया तो छोटा सा जवाब था, 'इंतजार कीजिए. दो दिन बाद बैठकर बात करेंगे.' ध्यान देने वाली बात यह है कि अन्नामलाई ने अभी तक बीजेपी छोड़ने या अपनी नई पार्टी बनाने को लेकर कोई औपचारिक घोषणा नहीं की है. अन्नामलाई के समर्थकों ने पोस्टर लगाकर अपने और अपने नेता के मन की बात बताने की कोशिश जरूर की है.
4 जून को अन्नामलाई के जन्मदिन से पहले चेन्नई के कई इलाकों में समर्थकों ने पोस्टर लगाया है. लिखा है, 'हमारे नेता, आइए और नेतृत्व कीजिए' (Our Leader, Come and Lead Us). ऐसे ही कोयम्बटूर की सड़कों पर 'अन्नामलाई आर्मी' की तरफ से पोस्टर लगाए गए हैं, और लिखा है - 'निडर सोच की कोई सीमा नहीं होती.'
अन्नामलाई 2011 बैच के आईपीएस अधिकारी रहे हैं. लेकिन, इस्तीफा दे चुके हैं. तमिलनाडु बीजेपी के अध्यक्ष पद से उनको हटा दिया गया था. 2021 का तमिलनाडु विधानसभा चुनाव हार गए थे. 2024 के लोकसभा चुनाव में भी हार गए, और 2026 के विधानसभा चुनाव में उम्मीदवार तक नहीं थे - लेकिन, तमिलनाडु की राजनीति में महत्वपूर्ण और फिलहाल सुर्खियों में बने हुए हैं.
अन्नामलाई की पार्टी का बीजेपी और बाकी पार्टियों से क्या रिश्ता होगा?
सूत्रों के हवाले से खबर आई है कि अन्नामलाई बीजेपी से बगैर किसी टकराव के एक सम्मानजनक विदाई चाहते हैं. अन्नामलाई तमिलनाडु में पहले गैर-राजनीतिक आंदोलन शुरू करना चाहते हैं. यह आंदोलन 'राष्ट्रवादी तमिल दर्शन' पर आधारित हो सकता है. और, बाद में उसे राजनीतिक दल के रूप में तब्दील किया जा सकता है. बताते हैं, 7 जून को अन्नामलाई अपने समर्थकों के साथ मीटिंग के बाद अपनी रणनीति बता सकते हैं.
तमिलनाडु के युवाओं में खासी पैठ रखने वाले अन्नामलाई के लिए सब कुछ काफी जोखिमभरा है, लेकिन बीजेपी के लिए भी उनका अलग होना झटका है. रिपोर्ट के मुताबिक, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ बस इतना ही चाहता है कि अन्नामलाई सार्वजनिक जीवन में सक्रिय रहें. संघ, असल में, हिंदुत्व की राजनीति करने वाले उद्धव ठाकरे और योगी आदित्यनाथ जैसे नेताओं को विशेष रूप से पसंद करता है, और कई बार लगता है कि अरविंद केजरीवाल की लाइन भी संघ को पसंद आती है.
थलपति विजय ने तमिलनाडु में द्रविड़ राजनीति को शिकस्त दी है. डीएमके और AIADMK दोनों ही को खूब नुकसान पहुंचाया है. डीएमके के मुकाबले AIADMK की चुनौतियां ज्यादा हैं. रिपोर्ट के अनुसार, अन्नामलाई को लगता है कि विजय की टीवीके को चैलेंज करने का यह सबसे सही वक्त है - क्योंकि, तमिलनाडु की राजनीति में फिलहाल कोई मजबूत चेहरा सामने नजर नहीं आ रहा है.
हालांकि, नई राजनीतिक पार्टी बनाने में भी जोखिम कोई स्टार्ट-अप शुरू करने जैसा ही है. और, इस मामले में सामने दो प्रत्यक्ष उदाहरण हैं. एक, तमिलनाडु में मुख्यमंत्री सी. जोसेफ विजय की पार्टी टीवीके. और दूसरी, बिहार में प्रशांत किशोर की जन सुराज पार्टी. दोनों का चुनावी प्रदर्शन सबके सामने है.
अब अगर विजय और प्रशांत किशोर से तुलना करें, तो अन्नामलाई का मामला थोड़ा अलग हो जाता है. विजय और प्रशांत किशोर कभी किसी पार्टी से नहीं जुड़े थे, और सब कुछ नए सिरे से अपने बूते खड़ा किया. अन्नामलाई के साथ एक खास बात है कि उन पर बीजेपी का राजनीतिक ठप्पा लग चुका है. एक बार राजनीतिक ठप्पा लग जाने के बाद खुद को अलग पेश कर पाना काफी मुश्किल होता है.
बाबूलाल मरांडी ऐसी राजनीति के सबसे सटीक उदाहरण हैं. झारखंड के पहले मुख्यमंत्री रहे बाबूलाल मरांडी ने झारखंड विकास मोर्चा (प्रजातांत्रिक) के नाम से अपनी पार्टी बनाई. लंबे समय तक पूरे झारखंड में पदयात्रा करते रहे, और आखिरकार थक हारकर बीजेपी में ही पार्टी का विलय भी कर दिया. फिलहाल वो झारखंड विधानसभा में विपक्ष के नेता हैं.
सीनियर आदिवासी नेता बाबूलाल मरांडी के फेल हो जाने की असली वजह यही रही कि पूरी यात्रा के दौरान और जब अपने बूते चुनाव लड़े तब भी, लोगों को कभी समझा ही नहीं पाए कि वो अलग कैसे हैं? लोग हमेशा बाबूलाल मरांडी में बीजेपी नेता की ही छवि देखते थे, और वोट देते वक्त कमल के निशान से उनको अलग पाकर उनका साथ छोड़ देते थे - अन्नामलाई पर भी यह खतरा अभी से मंडरा रहा है.
अन्नामलाई और बीजेपी का रिश्ता
एक दौर था जब अन्नामलाई को तमिलनाडु में बीजेपी का भविष्य माना जाता था. करीब पांच साल तक बिल्कुल ऐसा ही था. 2026 के तमिलनाडु विधानसभा चुनाव से पहले अन्नामलाई की जगह नैनार नागेंद्रन को तमिलनाडु बीजेपी का अध्यक्ष बना दिया गया. असल में, अन्नामलाई तमिलनाडु में बीजेपी के AIADMK के साथ चुनावी गठबंधन के खिलाफ थे. और, AIADMK नेता एडप्पाडी के पलानीस्वामी को अन्नामलाई पसंद नहीं थे. चुनावी गठबंधन में आड़े आ रहे अन्नामलाई को रास्ते से ही हटा दिया गया. अन्नामलाई विधानसभा चुनाव भी नहीं लड़े, लेकिन बाद में एनडीए के लिए चुनाव प्रचार जरूर किया था.
अन्नामलाई एनडीए के सबसे लोकप्रिय चुनाव प्रचारकों में से एक बने रहे. क्योंकि, AIADMK नेता एडप्पाडी के पलानीस्वामी के बाद अन्नामलाई की रैलियों में ही भीड़ जुटती थी. संयोग से दोनों तमिलनाडु के एक ही गौंडर समुदाय से आते हैं, जो ओबीसी कैटेगरी है. इंडियन एक्सप्रेस के मुताबिक, अन्नामलाई समर्थकों के बीच यह तर्क और मजबूत हो गया है कि उनकी व्यक्तिगत राजनीतिक अहमियत तमिलनाडु में बीजेपी की जमीनी ताकत से कहीं अधिक है - मतलब, अन्नामलाई को गंवाकर बीजेपी नुकसान में जा सकती है.
हाल ही में, अन्नामलाई ने CBSE के त्रिभाषा फॉर्मूले मौजूदा सत्र से लागू करने पर सवाल उठाया था. अन्नामलाई की मांग है कि शिक्षा मंत्रालय इसे 2029-30 के शैक्षणिक सत्र से लागू करे - अन्नामलाई की नाराजगी अपनी जगह है, लेकिन यह ऐसा मसला है जो अन्नामलाई और बीजेपी आलाकमान के बीच टकराव की बड़ी वजह हो सकती है.
1. एक रिपोर्ट के मुताबिक, अन्नामलाई के आक्रामक 'एन मन्न मक्कल' पदयात्रा की बदौलत 2021 के विधानसभा चुनाव के वोट शेयर 3 फीसदी से बढ़कर 2024 में बीजेपी का वोट शेयर 11 फीसदी तक पहुंच गया था, जो 2026 में फिर से 3 फीसदी पर आ गया है. यह तो बीजेपी के लिए साफ तौर पर घाटे का संकेत दे रहा है.
2. तमिलनाडु के एक सीनियर बीजेपी नेता ने इंडियन एक्सप्रेस से बातचीत में निजी तौर पर तर्क दिया है कि दिल्ली ने चुनाव के दौरान तमिलनाडु को ठीक से नहीं समझा. नेता का कहना है कि अगर अन्नामलाई को अधिक स्वायत्तता और महत्व दिया गया होता, तो विजय तमिलनाडु में राजनीतिक परिवर्तन का अकेला प्रतीक नहीं बन पाते.
3. अन्नामलाई की राजनीति को कई पर्यवेक्षक कट्टर हिंदुत्व की तुलना में महत्वाकांक्षी द्रविड़ राजनीति के ज्यादा नजदीक पाते हैं. अन्नामलाई के समर्थक मानते हैं कि वो किसी आइडियोलॉजी का बचाव करने में कम, और कुछ नया करने के लिए मौके हासिल करने में ज्यादा दिलचस्पी लेते हैं.
अन्नामलाई को लेकर बीजेपी के भीतर भी ऊहापोह जैसी स्थिति है. क्या अन्नामलाई नाराज हैं? नाराज तो तमाम नेता होते हैं, और खामोश रहते हैं. अन्नामलाई आखिर चाहते क्या हैं? इंडियन एक्सप्रेस को बीजेपी के आंतरिक मामलों से वाकिफ कई नेताओं ने बताया कि अन्नामलाई ने राष्ट्रीय नेतृत्व को जो संदेश दिया था, वह दो विकल्पों तक सीमित था. एक, या तो उन्हें कोई ऐसी जिम्मेदारी दी जाए जहां वो कम से कम सात साल के लिए स्वायत्तता और अधिकार के साथ तमिलनाडु में बीजेपी का नेतृत्व करें. या फिर, उन्हें अलग राजनीतिक राह अख्तियार करने की अनुमति दी जाए.
पूरे घटनाक्रम से परिचित एक व्यक्ति ने बताया है, वह आईपीएस से इस्तीफा देने के बाद बीजेपी से मिले राजनीतिक अवसरों, अनुभवों और राजनीतिक सफर के लिए पार्टी नेतृत्व को धन्यवाद देना चाहते हैं.