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बेगानी शादी में... आमिर खान की 'आजादी' से आखिर दिक्कत क्या है?

आमिर खान ने गौरी स्प्रैट से पांच जुलाई को एक निजी समारोह में शादी की. ये उनकी तीसरी शादी है. इससे पहले वह रीना दत्ता और किरण राव से शादी कर चुके हैं. लेकिन 61 के आमिर की तीसरी शादी कई लोगों को रास नहीं आई और फिर शुरू हुआ ट्रोलिंग और कैरेक्टर असैसिनेशन का लंबा दौर.

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आमिर खान की तीसरी शादी पर खूब हंगामा बरपा. (Photo: PTI)
आमिर खान की तीसरी शादी पर खूब हंगामा बरपा. (Photo: PTI)

बस इतना सा हुआ कि आमिर खान ने 61 साल की उम्र में तीसरी शादी कर ली. हंगामा इतना बरपा मानो संविधान में संशोधन हो गया. इस शादी से सबसे ज्यादा बेचैनी उन लोगों को हुई जिनका दूर-दूर तक इससे कोई राब्ता नहीं था. सोशल मीडिया ने हर इंसान को अपनी बात कहने का मंच तो दे दिया, लेकिन शायद वह समझ अब तक पैदा नहीं हो सकी जो यह सिखा सके कि हर वक्त, हर मसले पर बोलना जरूरी नहीं. अफसोस है कि हम ऐसे समाज का हिस्सा हैं जहां खामोशी को कमजोरी और हर विषय पर राय देना कर्तव्य समझ लिया गया है. 

आमिर की तीसरी शादी को लेकर असहमति कम और उपहास अधिक था. आलोचना कम और चरित्र हनन बेशुमार था. लेकिन ट्रोलिंग का सबसे भद्दा हिस्सा गौरी स्प्रैट के हिस्से आया. उनके पुराने रिश्तों को उधेड़ा गया, उनके चरित्र पर फब्तियां कसी गईं, उनकी नीयत पर सवाल उठाए गए. हमारे समाज में जब भी किसी चर्चित पुरुष के साथ अपेक्षाकृत सामान्य महिला का नाम जुड़ता है तो पुरुषों के मुकाबले महिलाओं को इस ट्रोलिंग का ज्यादा सामना करना पड़ता है. मतलब पुरुष के फैसले की आलोचना भी हो, तो पहले महिला के जीवन की बघिया उधेड़ी जाती है. 

यह केवल ट्रोलिंग नहीं थी, यह हमारे सामाजिक चरित्र का आईना था. अगर कोई शख्स किसी असफल रिश्ते के बाद दोबारा शादी करता है तो उसमें दिक्कत क्या है? क्या प्यार या शादी करने का कोई निर्धारित कोटा है? किसी रिश्ते के खत्म हो जाने के बाद उस व्यक्ति से क्यों अपेक्षा की जाए कि वो ताउम्र अकेला ही रहे.

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दोनों परिवारों की मौजूदगी में खुशी से शादी के बंधन में बंधे आमिर खान और गौरी स्प्रैट. (Photo: PTI)

हम सफल शादी का जश्न मनाते हैं लेकिन असफल शादी को अपराध मान लेते हैं. यही कारण है कि हजारों लोग हिंसक, अपमानजनक और दमघोंटू रिश्तों में ताउम्र बंधे रहते हैं. हमने विवाह को इतना पवित्र बना दिया है कि उसमें इंसान की प्राथमिकताएं कहीं खो गई हैं. रिश्ता बचा रहना चाहिए, चाहे उसमें सम्मान बिल्कुल ना बचा हो. 

मनोविज्ञान में इसे मोरल ग्रैंडस्टैंडिंग कहा गया है यानी सार्वजनिक स्तर पर अपनी नैतिक श्रेष्ठता को जाहिर करने की प्रवृत्ति. जब भी किसी लोकप्रिय शख्सियत के जीवन से जुड़ा कोई विवाद सामने आता है, तो हम अक्सर अपनी नैतिकता को जाहिर करने के लिए सबसे कठोर भाषा का इस्तेमाल करते हैं. इससे हमे संतुष्टि मिलती है कि हम खुद को दूसरों से कहीं अधिक सही और अधिक नैतिक साबित कर रहे हैं.

डिजिटल दुनिया ने हमें अभिव्यक्ति की आजादी तो दे दी लेकिन संवेदनशीलता हम कहां से लेकर आएंगे? किसी और की निजी जिंदगी पर टिप्पणी करना, अपनी खुद की जिंदगी के मुश्किल सवालों का सामना करने से आसान है. पर असली दिक्कत कुंठा में है. हम अक्सर इसे संस्कृति, परंपरा या नैतिकता का नाम देते हैं, लेकिन कई बार इसके पीछे सिर्फ कुंठा होती है.

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जब कोई व्यक्ति अपनी शर्तों पर जीवन जीता है, गलतियां करता है, उनसे निकलता है और फिर आगे बढ़ता है तो वह उन लोगों को असहज करता है जिन्होंने अपना पूरा जीवन बंधे-बंधाए ढांचे के भीतर गुजार दिया है. ऐसे में मजाक, तंज और ट्रोलिंग एक तरह का हथियार बन जाते हैं. हम ये भूल जाते हैं कि हमारे पास आलोचना का अधिकार है लेकिन अपमान करने का नहीं. किसी भी शख्स के फैसले से असहमति हो सकती है लेकिन उस शख्स या उसके परिवार को अपमानित करना अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता नहीं, सामाजिक हिंसा है.

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शादी के बाद खुशी जाहिर करतीं गौरी स्प्रैट (Photo: PTI)

इस पूरे विवाद में सबसे चिंताजनक था गौरी का अपमान. किसी महिला के बारे में बिना तथ्य, बिना प्रमाण और बिना किसी जानकारी के अपमानजनक टिप्पणियां की गईं. यह दरअसल उस सामाजिक सोच को दर्शाता है, जिसमें किसी भी चर्चित पुरुष के साथ जुड़ी महिला सबसे आसान निशाना बन जाती है. यहां एक गहरा भेदभाव भी नजर आता है. समाज अक्सर महिलाओं का मूल्यांकन उनके व्यक्तित्व, काम या विचारों से कम और उनके निजी संबंधों से अधिक करता है. अगर कोई महिला किसी चर्चित पुरुष के जीवन में आती है, तो सबसे पहले उसकी मंशा पर सवाल उठाए जाते हैं. उसके फैसले को किसी स्वार्थ से जोड़कर देखा जाता है.

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दिलचस्प बात यह है कि हम शादी को पवित्र संस्था मानते हैं, लेकिन तलाक, पुनर्विवाह और व्यक्तिगत स्वतंत्रता को लेकर हमारे भीतर गहरा विरोधाभास भी मौजूद है. हम मानते हैं कि हर व्यक्ति को अपनी जिंदगी अपने तरीके से जीने का अधिकार है, लेकिन जब कोई वास्तव में ऐसा करता है तो हम उसे सामाजिक स्वीकृति देने में हिचकिचाते हैं.

किसी को यह शादी पसंद नहीं भी हो सकती है. किसी को आमिर का तीन शादी करना नागवार भी गुजर सकता है. यह पूरी तरह से व्यक्तिगत मत है और लोकतांत्रिक समाज में यह जायज भी है पर किसी के फैसले से असहमत होना और सार्वजनिक तौर पर उसका अपमान करना इन दोनों के बीच अंतर है. हमारी सबसे बड़ी समस्या यह नहीं है कि हम अधिक आलोचना करने लगे हैं. समस्या ये है कि आलोचना का स्थान उपहास ने ले लिया है और तर्क का स्थान व्यंग्य ने. 

हम ये तय करने पर तुले हैं कि किसे किससे प्रेम करना चाहिए? किससे शादी करनी चाहिए? किस उम्र में करनी चाहिए? कितनी बार करनी चाहिए. किस धर्म में करनी चाहिए. किस जाति में करनी चाहिए. यह कैसी विडंबना है कि हम अपने लिए स्वतंत्रता चाहते हैं, लेकिन दूसरों पर नियंत्रण? समस्या भी इसी नियंत्रण की इच्छा में है. हमें दूसरों की जिंदगी नियंत्रित करने में आनंद आता है. यानी हमें विविधता पसंद है, बशर्ते वह हमारे घर तक न पहुंचे. हमें आजादी पसंद है, बशर्ते उसका इस्तेमाल कोई और ना करे. हमें अधिकार पसंद हैं, बशर्ते वे सिर्फ हमारे पास हों. हम अपनी कुंठाओं, असुरक्षाओं और अधूरेपन को दूसरों की जिंदगी पर प्रोजेक्ट करते हैं. शायद यही हमारे समय की सबसे बड़ी त्रासदी भी है कि हम आजाद माहौल में अपने हिसाब से रहना चाहते हैं लेकिन दूसरों की आजादी, उनकी पसंद को स्वीकार करना हम अब तक नहीं सीख पाएं हैं.

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