पुरी के जगन्नाथ मंदिर में रथयात्रा की तैयारियां जारी हैं. इस समय भगवान श्रीमंदिर में एकांतवास में हैं. इस एकांतवास को 'अनासर' विधान कहते हैं. जगन्नाथ मंदिर में रथयात्रा के अलावा जो एक और बात प्रसिद्ध है वह है यहां का 'महाभोग प्रसाद'. पुरी में मान्यता है कि महाभोग का महाप्रसाद खुद देवी लक्ष्मी तैयार करती हैं.
इसी तमाम चमत्कारिक और जादुई बातें पुरी की लोककथाओं में मशहूर हैं, लेकिन एक खास बात और इस महाप्रसाद से जुड़ी है. वह है इससे जुड़ी एक देवी की कहानी. जैसे पुरी में जगन्नाथजी का भोग उनके भोजन से महाप्रसाद बन जाता है, वैसे ही इस देवी को बिना भोग लगाए भी भगवान जगन्नाथ भी अपना प्रसाद नहीं चख सकते हैं.
कहानी कुछ ऐसी है कि जगन्नाथ जी का महाभोग पहले सिर्फ भगवान विष्णु के लिए था. एक बार देवर्षि नारद ने किसी तरह देवी लक्ष्मी को मनाकर उनसे वो प्रसाद पा लिया. लेकिन देवी लक्ष्मी ने एक शर्त रखी थी कि वह किसी को इस प्रसाद पाने के बारे में बताएंगे नहीं. लेकिन प्रसाद चखने के बाद नारद मुनि को इतना आनंद हुआ कि वह देवी लक्ष्मी की शर्त को भूल गए और नाचते-गाते कैलास पहुंच गए.
वहां सभी ने उनका सत्कार किया, फिर चर्चा शुरू हुई. इस दौरान महादेव ने कहा, ये तो बड़े आनंद की बात है कि धरती पर जगन्नाथ धाम है और श्रद्धालुओं को धरती पर ही वैकुंठ का सुख मिल रहा है, क्या इससे भी बड़े आनंद की बात हो सकती है? देवर्षि नारद, जो कि अभी तक महाभोज के स्वाद में ही डूबे हुए थे, अचानक ही बोल पड़े, 'हो सकती है महादेव... बिल्कुल हो सकती है...अगर आपने जगन्नाथ धाम का महाभोज चखा हो तो...' ये सुनकर शिवजी समेत सभी लोग सकपका गए. वहीं, नारद मुनि भी घबरा गए कि अनजाने में उन्होंने ये क्या बोल दिया. इसे तो गुप्त रखना था.
अब उनकी बात सुनकर शिवजी ने पूछा कि क्या आपने महाप्रसाद चखा है? अब नारद मुनि फंस चुके थे, झूठ नहीं बोल सकते थे. इसलिए उन्होंने सारी बात बताई और ये भी बता दिया कि वह थोड़ा प्रसाद लेकर भी आए हैं. ये सुनकर शिवजी ने कहा, मुझे भी वह प्रसाद दीजिए. नारद मुनि को वो प्रसाद उनके साथ बांटना पड़ा. इसे चखकर महादेव भी भाव विह्वल हो गए और आनंद तांडव करने लगे.
शिवजी के आनंद तांडव से जब सारा कैलास डगमगाने लगा, तो पार्वती दौड़ीं आईं. उन्होंने शिवजी से इतने आनंद का रहस्य पूछा. शिवजी ने बताया कि उन्होंने महाप्रभु जगन्नाथ का महाप्रसाद चख लिया है. इस पर पार्वती जी ने कहा, मुझे भी खिलाइए. शिवजी ने कहा कि, नहीं मेरे पास अब प्रसाद नहीं बचा है. इस पर पार्वतीजी गुस्सा गईं, और बोलीं कि आपने अकेले ही प्रसाद चख लिया. अब ये प्रसाद सारे संसार को मिलेगा. चलिए मेरे साथ.
ऐसा कहकर पार्वतीजी और शिवजी जगन्नाथ धाम को चले. पार्वती एक रिश्ते में विष्णुजी की बहन भी लगती हैं, इसलिए आज वह इसी अधिकार से पहुंची थीं. जैसे एक रूठी हुई बहन, भाई से अपनी बात मनवाने के लिए जाती है. पार्वतीजी को इतने गुस्से में देखकर लक्ष्मीजी कुछ कह नहीं पाईं और जगन्नाथ जी भी नजरें चुराने लगे. इस पर पार्वतीजी ने ही मौन तोड़ते हुए, लक्ष्मीजी को भाभी कहकर संबोधित किया और बोलीं, क्यों भाभी... मुझे कुछ खिलाओगी नहीं, कितने दिन बाद मायके आई हूं? लक्ष्मी जी ये सुनकर तुरंत ही फल-मिठाइयां ले आईं.
तब पार्वतीजी ने कहा, दोपहर हो रही है, भोजन का समय है, आप फल-मिठाइयां खिलाएंगी. भोजन नहीं बना? ये सुनकर लक्ष्मी ने जगन्नाथ जी की ओर देखा. वह नजरें चुराते हुए मुस्कुराने लगे. इतने में नारद मुनि भी आ गए, लेकिन सबके सामने जाने से बचने लगे. तब जगन्नाथ जी ने कहा, ये सारा किया-धरा आपका ही है, सामने आइए... सारा क्रोध अकेले मैं क्यों सहूं?
तब देवी पार्वती ने क्रोधित हुए कहा कि आपने महाभोग खुद तक ही सीमित क्यों रखा? ये तो जगत के नाथ के लिए अच्छी बात नहीं है. जगन्नाथ भगवान विष्णु ने कहा कि देवी लक्ष्मी के बने हाथ के भोज का प्रसाद पाने से सभी कर्म के सिद्धांत से विमुख हो सकते थे, इस तरह पाप-पुण्य का संतुलन बिगड़ जाता, इसलिए मैंने इसे सीमित कर रखा था, लेकिन अब आप कहती हैं तो मैं इसे आज से ही सार्वजनिक करता हूं. अब से जगन्नाथ के लिए जो भी महाभोग तैयार होगा, वह पहले आपको ही चढ़ाया जाएगा, उसके बाद ही मैं उसका भोग लगाऊंगा.
आप अपनी संतानों से कितने स्वच्छ-विमल भाव से प्रेम करती हैं, इसलिए आज से आप भी देवी बिमला के नाम से जगन्नाथ धाम में ही निवास करेंगी. इसे बिमला शक्ति पीठ के नाम से जाना जाएगा. महादेव भी अपने भैरव स्वरूप जगत के नाम से यहां निवास करेंगे और मेरे जगन्नाथ नाम को सार्थक करेंगे.
इसके साथ ही जो भी श्रद्धालु केवल श्रद्धा और भक्ति भाव से आपका और मेरा दर्शन कर इसी भाव से प्रसाद को स्वीकार करेंगे, वह अपने बंधनों से मुक्त हो जाएंगे, लेकिन प्रसाद ग्रहण करते हुए अगर वह स्वाद, गंध, कामना या किसी अन्य सांसारिक विषयों के बारे में सोचेंगे तो उनके लिए यह केवल व्यंजन भर रह जाएगा. इसीलिए कहते भी हैं कि प्रसाद को प्रभु के साक्षात दर्शन के तौर पर देखना चाहिए और उसे ग्रहण करते समय केवल भक्ति भाव ही रखना चाहिए. इसलिए जगन्नाथ मंदिर में देवी बिमला का शक्तिपीठ भी स्थापित है, जहां भोग लगने के बाद ही प्रसाद 'महाप्रसाद' बन जाता है.