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चंपत 'बाइज्जत दोषी', सिस्टम बरी कैसे?

राम मंदिर चढ़ावा चोरी पर गठित SIT की रिपोर्ट आने के बाद मंदिर ट्रस्ट की बैठक में लिए गए फैसलों ने सिस्टम की खामी को उजागर कर दिया है. यह पक्के तौर पर नहीं कहा जा सकता कि अब राम मंदिर में गड़बड़ी नहीं होगी. ट्रस्ट अब भी बड़े मंदिरों वाले प्रोफेशनल ट्रस्ट से नहीं सीख रहा है.

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राम मंदिर ट्रस्ट के महासचिव रहे चंपत राय के इस्तीफे को ही कार्रवाई मान लिया है.
राम मंदिर ट्रस्ट के महासचिव रहे चंपत राय के इस्तीफे को ही कार्रवाई मान लिया है.

श्रीराम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट के कोषाध्यक्ष हैं गोविंद देव गिरी. राम मंदिर चढ़ावा चोरी पर SIT की रिपोर्ट आने के बाद हुई ट्रस्ट की बैठक के बारे में इन्होंने ही सारी जानकारी मीडिया से साझा की. लेकिन, कोषाध्यक्ष के नाते अपनी भूमिका स्पष्ट नहीं की. जब कोषाध्यक्ष गोविंद देव गिरी थी, तो कोष महासचिव चंपत राय और ट्रस्ट के सदस्य मात्र अनिल मिश्रा कैसे संभाल रहे थे? कोषाध्यक्ष के रूप में अपनी जिम्मेदारी निभाने में असमर्थ रहने के बावजूद वे चंपत राय को क्लीनचिट कैसे दे पा रहे थे?

राम मंदिर ट्रस्ट ने जिस तरह आनन-फानन में आपातकालीन बैठक बुलाई और चंपत राय और अनिल मिश्रा जैसे बड़े पदाधिकारियों के इस्तीफे स्वीकार किए, वह यह दिखाता है कि ट्रस्ट अपनी छवि को लेकर कितना दबाव में था. लेकिन इस पूरे घटनाक्रम को अगर गहराई से देखा जाए, तो एक बड़ा और बुनियादी सवाल खड़ा होता है कि क्या यह गड़बड़ी वाकई सिर्फ कुछ व्यक्तियों की लापरवाही का नतीजा थी, या फिर असल खराबी खुद ट्रस्ट के पूरे सिस्टम (ढांचे) में छिपी हुई है?

यदि हम SIT के खुलासों और उसके बाद ट्रस्ट द्वारा की गई कार्रवाइयों की समीक्षा करें, तो यह साफ हो जाता है कि समस्या व्यक्तियों को बदलने से नहीं, बल्कि पूरे सिस्टम को बदलने से सुलझेगी. क्योंकि कारण साफ हैं:

1. प्रायवेट ट्रस्ट : नियंत्रण और वैधानिक ढांचे का अभाव

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श्रीराम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट का गठन सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद केंद्र सरकार द्वारा एक स्वतंत्र प्राइवेट ट्रस्ट के रूप में किया गया था. इस ट्रस्ट के पास कोई कड़ा वैधानिक या अर्ध-सरकारी प्रशासनिक ढांचा नहीं है. यहां फैसले मुख्य रूप से कुछ चुनिंदा संतों, धार्मिक नेताओं और ट्रस्टियों द्वारा आपसी सहमति से लिए जाते हैं.

खामी कहां है? प्रोफेशनल ब्यूरोक्रेट्स या एडमिनिस्ट्रेटिव एक्सपर्ट्स की कमी है, जिसके कारण वित्तीय मामलों में वह कड़ाई नहीं आ पाती जो एक सरकारी या अर्ध-सरकारी बोर्ड में होती है. तिरुपति देवस्थानम या वैष्णो देवी जैसे मंदिर किसी स्वायत्त ट्रस्ट के बजाय राज्य सरकार के विशेष कानूनों (विशेष अधिनियमों) के तहत रेगुलेट होते हैं. उदाहरण के लिए, तिरुपति मंदिर 'आंध्र प्रदेश धर्मार्थ और हिंदू धार्मिक संस्थान और बंदोबस्त अधिनियम' के तहत काम करता है. इसमें एक IAS स्तर का अधिकारी मुख्य कार्यकारी अधिकारी (CEO) होता है. इसके चलते मंदिर का प्रशासन पूरी तरह से सरकारी नियमों, पारदर्शिता और जवाबदेही के दायरे में रहता है. ना कि राम मंदिर ट्रस्ट की तरह, जहां एक महासचिव और एक मेंबर ट्रस्ट के अध्यक्ष, सीईओ और कोषाध्यक्ष की तरह काम कर रहे थे.

2. बिना लिखित आदेश के शक्तियां सौंपना: सिस्टम की ढिलाई

SIT की रिपोर्ट में सामने आया कि चंपत राय के करीबी राम शंकर यादव उर्फ 'टिन्नू' के पास बिना किसी आधिकारिक या लिखित आदेश के मंदिर के सभी दानपात्रों (donation box) की चाबियां रहती थीं. यहां सवाल यह उठता है कि एक ऐसा ट्रस्ट, जिसके पास देश-विदेश से करोड़ों का चढ़ावा आ रहा है, वहां इतनी महत्वपूर्ण जिम्मेदारी मौखिक आधार पर कैसे दी जा सकती है?

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खामी कहां है? यह किसी एक व्यक्ति की गलती नहीं है, बल्कि यह 'इंटरनल चेक्स एंड बैलेंसेज' की कमी है. एक मजबूत प्रशासनिक ढांचे में किसी भी व्यक्ति को वित्तीय जिम्मेदारी देने के लिए एक तय लिखित प्रक्रिया (SOP) होती है, जिसकी इस ट्रस्ट में काफी कमी दिखी. यहां तक की कई नियुक्तियां ट्रस्ट के वरिष्ठ पदाधिकारियों ने अपने रसूख का इस्तेमाल करते हुए नियमों को ताक पर रख कर की. जबकि देश के बड़े मंदिरों में ट्रस्ट के भीतर एक HR की व्यवस्था होती है.

3. बार-बार चेतावनी के बाद भी सुधार न होना

SIT ने अपनी रिपोर्ट में ट्रस्टी अनिल मिश्रा को जिम्मेदार ठहराया कि बैंकों द्वारा बार-बार सुरक्षा और गिनती की प्रक्रिया में कमियां बताए जाने के बावजूद उन्होंने कोई कड़ा कदम नहीं उठाया.

खामी कहां है? जब किसी संस्था का पूरा नियंत्रण एक या दो व्यक्तियों के हाथों में केंद्रित हो जाता है, तो वहां जवाबदेही तय करना मुश्किल होता है. यदि राम मंदिर ट्रस्ट में तिरुपति या वैष्णो देवी श्राइन बोर्ड की तरह एक स्वतंत्र प्रशासनिक काउंसिल या प्रोफेशनल ब्यूरोक्रेट होते, तो बैंकों की चेतावनियों पर तुरंत एक्शन लिया जाता. कुछ खास व्यक्तियों पर जरूरत से ज्यादा निर्भरता ही इस सिस्टम की सबसे बड़ी कमजोरी साबित हुई.

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4. गिनती और सिक्योरिटी का कोई प्रोफेशनल मॉडल न होना

SIT की रिपोर्ट के मुताबिक, नोटों की गिनती करने वाले कर्मचारी अपने मोजों, जूतों और कपड़ों में पैसे छिपाकर ले जा रहे थे क्योंकि काउंटिंग रूम से निकलते वक्त उनकी कोई सख्त तलाशी नहीं होती थी.

खामी कहां है? यह सुरक्षा में चूक किसी कर्मचारी की चालाकी से ज्यादा ट्रस्ट के लचर सुरक्षा सिस्टम को उजागर करती है. देश के अन्य बड़े मंदिरों में पैसे गिनने की प्रक्रिया पूरी तरह से आधुनिक तकनीकों, बायोमेट्रिक स्कैनिंग और बाहरी सुरक्षा बलों की निगरानी में होती है. राम मंदिर ट्रस्ट ने इतने बड़े स्तर के वित्तीय लेन-देन को संभालने के लिए कोई प्रोफेशनल और माडर्न स्ट्रक्चर तैयार ही नहीं किया.

5. रोजाना खातों का मिलान न होना

रिपोर्ट में आशंका जताई गई है कि यह चोरी पिछले कई महीनों या सालों से चल रही थी और घोटाला करोड़ों रुपये का हो सकता है.

खामी कहां है? अगर महीनों तक करोड़ों रुपये गायब होते रहे और ट्रस्ट को इसका पता नहीं चला, तो इसका सीधा मतलब है कि वहां दैनिक या साप्ताहिक स्तर पर 'इंटर्नल ऑडिट' की कोई व्यवस्था ही नहीं थी. एक मजबूत फाइनेंशियल सिस्टम में रोजाना दानपात्र से निकले कैश और बैंक में जमा रकम का मिलान कंप्यूटर सिस्टम के जरिए किया जाता है. ट्रस्ट का अकाउंटिंग सिस्टम इस बुनियादी कसौटी पर भी फेल रहा. देश के बड़े मंदिर ट्रस्ट के खजाने का भारत के नियंत्रक और महालेखा परीक्षक (CAG) या सरकार द्वारा मान्यता प्राप्त बड़े चार्टर्ड अकाउंटेंट फर्मों द्वारा सालाना ऑडिट कराना अनिवार्य होता है.

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चेहरे बदलने से नहीं, सिस्टम बदलने से होगा सुधार

ट्रस्ट की बैठक में पदाधिकारियों को हटाकर एक नई समिति का गठन करना और सुरक्षा बढ़ाने की बात करना महज एक 'स्टॉप-गैप अरेंजमेंट' जैसा लगता है. असल सवाल यह है कि क्या नया नेतृत्व आने के बाद ये ढांचागत कमियां दूर हो जाएंगी?

जब तक राम मंदिर ट्रस्ट अपने पुराने ढांचे को छोड़कर तिरुपति देवस्थानम या माता वैष्णो देवी श्राइन बोर्ड की तरह एक प्रोफेशनल, पारदर्शी और लीगल कॉर्पोरेट मॉडल नहीं अपनाता, तब तक ऐसी गड़बड़ियों की गुंजाइश बनी रहेगी. खामी व्यक्तियों में ढूंढने के बजाय ट्रस्ट को यह मानना होगा कि उनका पूरा 'मैनेजमेंट सिस्टम' इस विशाल फाइनेंशियल और प्रशासनिक जिम्मेदारी को संभालने के लिए तैयार नहीं था. सुधार की शुरुआत व्यक्तियों को बदलने से नहीं, बल्कि एक फुल-प्रूफ और अभेद्य सिस्टम बनाने से होनी चाहिए.

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