थर्ड डिग्री टॉर्चर और सख्त से सख्त पुलिसिया कार्रवाई में भी जिन शातिर और दुर्दांत अपराधियों की आंखों से आंसू नहीं निकलते, वे अपने मासूम बच्चों का निश्छल प्यार पाकर फफक-फफक कर रो पड़े. राष्ट्रपिता महात्मा गांधी की जयंती पर मध्य प्रदेश की खंडवा जिला जेल में यह दृश्य दिखाई दिया.
गांधी जयंती (2 अक्टूबर) के पावन अवसर पर खंडवा जिला जेल प्रबंधन ने एक भावुक और प्रभावी नवाचार किया. जेल प्रशासन ने ऐसे 120 बंदियों को चिह्नित किया, जो वर्षों से जेल में कैद हैं और जिनके 3 से 10 वर्ष की उम्र के छोटे-छोटे बच्चे हैं. इन सभी 120 बंदियों की उनके बच्चों से प्रत्यक्ष (फेस-टू-फेस) मुलाकात कराई गई.
बच्चों ने पिता को बनाया घोड़ा
जेल परिसर के मुलाकात कक्ष को इस तरह से सजाया गया था कि बच्चों को जेल का भय न सताए और उन्हें किसी उत्सव जैसा माहौल महसूस हो. मुलाकात के दौरान बच्चे अपने पिता की गोद में खेलते और चहकते नजर आए.
किसी मासूम ने अपने पिता या दादा को घोड़ा बनाकर उनकी पीठ पर बैठने की हसरत पूरी की, तो किसी बेटी ने अपने पिता को स्कूल में सीखा गरबा करके दिखाया.
चॉकलेट खिलाकर शेयर की खुशियां
छोटे बच्चे जेल प्रबंधन द्वारा मिली चॉकलेट्स और गुब्बारे अपने पिता के साथ बांटते दिखे. वहीं, जो बच्चे थोड़े समझदार थे, वे अपने पिता से लिपटकर पूछते नजर आए, "पापा, आपने ऐसा क्यों किया? सबके पापा घर पर रहते हैं, आप क्यों नहीं?"
वो मासूमों के प्यार ने कर दिखाया
बच्चों के इन मासूम सवालों और निश्छल स्नेह ने सख्त सजा काट रहे कैदियों के दिलों को पूरी तरह पिघला दिया. बंदियों के मन में अपने किए अपराधों के प्रति गहरे पश्चाताप का भाव जाग उठा. बिना कुछ कहे वे अपने आंसुओं से अपनी पुरानी गलतियों का प्रायश्चित करते और मन ही मन आगे कभी अपराध न करने का संकल्प लेते दिखे.
इस विशेष अवसर पर जेल प्रबंधन की ओर से बंदियों व उनके परिजनों के लिए एक विशेष स्वास्थ्य जांच शिविर का भी आयोजन किया गया.
इस भावुक और मानवीय पहल को लेकर खंडवा जिला जेल अधीक्षक देवेंद्र कुमार सारस ने बताया, ''गांधी जयंती के अवसर पर हमने ऐसे 120 बंदियों को चिह्नित किया था, जो कई वर्षों से अपने 3 से 10 वर्ष के छोटे बच्चों से प्रत्यक्ष रूप से नहीं मिल पाए थे. राष्ट्रपिता महात्मा गांधी के सिद्धांत 'अपराध से घृणा करो, अपराधी से नहीं' को आत्मसात करते हुए यह मुलाकात आयोजित की गई.
बच्चों से मिलकर बंदियों की आंखों में पश्चाताप और परिजनों के पास रहने की तड़प साफ नजर आई. यह नवाचार बंदियों में सकारात्मक बदलाव लाने और उन्हें अपराध की राह से दूर करने में बेहद कारगर साबित हुआ है.''
'किट्टू बेटा, अच्छे से एग्जाम देना...': विदाई का सबसे भावुक पल
मुलाकात की समय सीमा समाप्त होने के बाद जब विदाई की घड़ी आई, तो पूरे जेल परिसर में माहौल गमगीन हो गया. कई बच्चियों की अगले दिन (3 अक्टूबर) से स्कूल की परीक्षाएं शुरू होने वाली थीं. जब बच्चे रोते हुए जेल के मुख्य द्वार से बाहर निकल रहे थे, तभी सलाखों के पीछे खड़े एक पिता ने रुंधे गले से भावुक आवाज लगाई "किट्टू... ओ किट्टू बेटा, पेपर अच्छे से देना, बेस्ट ऑफ लक!" देखें VIDEO:-
पिता के इन आखिरी शब्दों ने वहां मौजूद अधिकारियों, कर्मचारियों और परिजनों सभी की आंखें नम कर दीं.