मध्य प्रदेश की सियासत में पूर्व गृहमंत्री नरोत्तम मिश्रा तो बीजेपी का 'संकटमोचक' भी कहा जाता है, लेकिन अब उनकी ही राजनीति पर संकट गहरा गया है. उन्हें एक समय एमपी का सीएम चेहरा तक माना जाने लगा था, लेकिन सियासत ने ऐसी करवट ली कि वो अपनी परंपरागत सीट दतिया से टिकट तक नहीं पा सके. दतिया उपचुनाव में बीजेपी ने उनकी जगह पर आशुतोष तिवारी को उम्मीदवार बनाया है, जो नरोत्तम मिश्रा के लिए बड़ा सियासी झटका है.
गृह मंत्री रहते हुए 'बुलडोजर मैन'के नाम से पहचान बनाने वाले नरोत्तम मिश्रा अपने बयानों, सख्त तेवरों और फैसलों के कारण वे अक्सर सुर्खियों में बने रहे. ऐसे में उनका नाता 'विकास' कार्यों से ज्यादा उनके 'विवादों' ने सुर्खियां बटोरीं. इसका ही नतीजा था कि बीजेपी की लहर में भी नरोत्तम मिश्रा 2023 का विधानसभा चुनाव नहीं जीत सके.
दतिया विधानसभा सीट से नरोत्तम मिश्रा लगातार तीन बार विधायक रहे, लेकिन 2023 में अपना चुनाव कांग्रेस के उम्मीदवार राजेंद्र भारती से 7,500 से अधिक वोटों से हार गए. राजेंद्र भारती की सदस्यता जाने के बाद अब उपचुनाव हो रहे हैं तो बीजेपी ने उन्हें टिकट न देकर आशुतोष तिवारी जैसे नए चेहरे को उतारा है. माना जा रहा कि उनके विवादित छवि के चलते बीजेपी ने उनकी जगह पर आशुतोष तिवारी पर भरोसा जताया है. नरोत्तम मिश्रा के लिए लगातार तीसरा बड़ा झटका है?
नरोत्तम मिश्रा की सियासत अर्श से फर्श पर पहुंची
मध्य प्रदेश की सियासत में नरोत्तम मिश्रा ने बहुत तेजी से बढ़ी. नरोत्तम मिश्रा ने 1970 के दशक में छात्र राजनीति के जरिए कदम रखा. वो जिवाजी विश्वविद्यालय में छात्र संघ के सचिव चुने गए थे.इसी दौरान वो भाजपा युवा मोर्चा से जुड़े. मध्य प्रदेश में उस समय ब्राह्मण नेताओं का जबरदस्त वर्चस्व हुआ करता था. अटल बिहारी वाजपेयी से लेकर श्यामा चरण शुक्ल तक ब्राह्मण राजनीति के धुरी थे. साल 1990 में नरोत्तम मिश्रा पहली बार डाबरा विधानसभा सीट से चुनाव लड़े और विधायक चुने गए. इसके बाद साल 1998 और 2003 में भी वो डाबरा सीट से जीते.
परिसीमन के बाद उनकी सीट बदल गई. नरोत्तम मिश्रा ने दतिया को अपनी कर्मभूमि बनाया. 2008 में दतिया से चुनाव लड़े और विधायक बने. इसके बाद से 2018 तक दतिया सीट से लगातार तीन बार विधायक बने. इसके बदौलत नरोत्तम मिश्रा सूबे की सियासत के प्रमुख चेहरा माने जाने लगे. इस दौरान उन्होंने शहरी विकास, स्वास्थ्य, कानून आदि कई मंत्री पद संभाले.
शिवराज सरकार में नंबर दो और अब हाशिए पर खड़े
मध्य प्रदेश में शिवराज सरकार में उनकी हैसियत नंबर दो की थी. शिवराज कैबिनेट में सबसे ताकतवर शख्स के रूप में पहचाने जाते थे. मध्य प्रदेश के गृहमंत्री का पद मिला, उन्होंने योगी सरकार के तर्ज पर मध्य प्रदेश में बुलडोजर एक्शन शुरू कर दिया और अपने विवादित बयानों के चलते अक्सर सुर्खियों में रहने लगे. यही से उनकी उल्टी गिनती शुरू हो गई.
नरोत्तम मिश्रा को सबसे बड़ा डेंट 2023 के विधानसभा चुनाव में लगा, जब दतिया विधानसभा सीट पर चुनावी मात खानी पड़ी. कांग्रेस के राजेंद्र भारती ने नरोत्तम मिश्रा को 7742 वोटों से हरा दिया. हालांकि, इस चुनाव में बीजेपी की जबरदस्त लहर थी, सके बाद भी नहीं जीत सके और नरोत्तम मिश्रा का डाउनफाल शुरू हो गया.
राजेंद्र भारती से हारने के बाद नरोत्तम मिश्रा पार्टी में किनारे लग गए. मध्य प्रदेश में जब मोहन यादव की सरकार बनी तब भी उन्हें पार्टी ने ना तो कैबिनेट में लाने की कोशिश की और ना ही किसी और तरीके से उनके कद को तरजीह दी. इतना ही नहीं लोकसभा चुनाव लड़ने की तैयारी कर रहे थे, लेकिन पार्टी ने टिकट ही नहीं दिया. इसके धीरे-धीरे पार्टी से साइडलाइन होते नरोत्तम मिश्रा को इस बार दतिया विधानसभा उपचुनाव में भी पार्टी ने टिकट नहीं दिया, जिसके चलते अब उनकी सियासत पूरी तरह बुलडोज हो गई.
विकास से नहीं विवादों से नरोत्तम मिश्रा का नाता
मध्य प्रदेश की सियासत में नरोत्तम मिश्रा भले ही ब्राह्मण चेहरे के तौर पर अपनी जगह बनाने में कामयाब रहे हों, लेकिन विकास से ज्यादा विवादों में रहे. मध्य प्रदेश के गृह मंत्री रहते हुए नरोत्तम मिश्रा अपने विवादित बयानों, फिल्मों पर दिये गए अपने उटपटांग तर्कों से लगातार चर्चा का केंद्र बने रहे.मध्य प्रदेश में अपराधियों के घरों पर बुलडोजर एक्शन शुरू किया. सांप्रदायिक तनाव की घटनाओं के बाद उनके बयानों को अक्सर एकतरफा और भड़काऊ माना गया. खरगोन दंगों के बाद उन्होंने बयान दिया था कि "जिस घर से पत्थर आए हैं, उस घर को पत्थरों का ही ढेर बनाएंगे.
नरोत्तम मिश्रा पर पीएम मोदी तक को बयान देने पड़ गए थे. एक बार पीएम मोदी ने उन्हें सोच समझकर बोलने की नसीहत तक थी. गृहमंत्री रहते हुए नरोत्तम मिश्रा का सबसे ज्यादा विवादित और चर्चित रूप फिल्मों और विज्ञापनों पर उनकी तीखी टिप्पणियों के दौरान दिखा. उन्होंने एक तरह एमपी में फिल्मों के लिए 'अघोषित मोरल पुलिसिंग' शुरू कर दी थी. 'पठान' फिल्म का 'बेशर्म रंग' गाना पर दीपिका पादुकोण की भगवा रंग की बिकिनी पर उन्होंने कड़ी आपत्ति जताई और इसे 'दूषित मानसिकता' कहा था.
उन्होंने फिल्म को एमपी में बैन करने तक की चेतावनी दे दी थी.'आदिपुरुष' फिल्म के टीज़र में हनुमान जी के लुक और चमड़े के वस्त्रों पर उन्होंने आपत्ति जताई और लीगल एक्शन की बात कही. जनवरी 2023 में बीजेपी की राष्ट्रीय कार्यकारिणी की बैठक में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने पार्टी नेताओं को फिल्मों और कलाकारों पर अनावश्यक व गलत बयानबाजी करने से बचने की नसीहत दी थी. पीएम यह नसीहत विशेष रूप से एमपी के तत्कालीन गृह मंत्री नरोत्तम मिश्रा को दी गई थी.
विवाद ही क्या बने नरोत्तम मिश्रा की राह में बाधा
नरोत्तम मिश्रा के विवाद ही उनकी सियासी राह के बाधा बने हैं. पार्टी आलाकमान, मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव और प्रदेश संगठन के वरिष्ठ नेताओं (जैसे पूर्व सीएम शिवराज सिंह चौहान) के बीच हुई बैठकों में यह तय किया गया कि हारे हुए चेहरों को दोबारा मौका देने से जनता में नकारात्मक संदेश जा सकता है. नरोत्तम मिश्रा दतिया में एक लंबे समय से सक्रिय थे और उनके कड़े तेवरों के कारण स्थानीय स्तर पर एक बड़े वर्ग में उनके खिलाफ नाराजगी भी थी.
पार्टी का मानना था कि किसी नए और विवाद-रहित स्थानीय चेहरे को उतारने से कांग्रेस के खिलाफ लड़ाई आसान होगी, जिसके चलते ही उनके नरोत्तम मिश्रा का टिकट काटकर नए चेहरे पर दांव लगाया है. आशुतोष तिवारी को एक साफ-सुथरे विकल्प के रूप में चुना गया. इसके अलावा दूसरा सबसे कारण यह था कि पार्टी कोई नया पावर सेंटर नहीं स्थापित करना चाहती है.
डॉ. नरोत्तम मिश्रा यदि उपचुनाव जीतकर विधानसभा पहुंचते तो उनके मंत्री बनने और महत्वपूर्ण विभाग मिलने की संभावनाएं थी. जाहिर है कि इससे बीजेपी और सरकार में एक नया शक्ति केंद्र बनता. एमपी बीजेपी में पहले से सीएम मोहन यादव के अलावा शिवराज सिंह चौहान, ज्योतिरादित्य सिंधिया, कैलाश विजयवर्गीय, प्रहलाद पटेल, राकेश सिंह और नरेंद्र सिंह तोमर जैसे कई शक्ति केंद्र है.
माना जा रहा है कि बीजेपी आलाकमान किसी नए शक्ति केंद्र के बनने से बच रहा था और इसी रणनीतिक संतुलन को ध्यान में रखते हुए आशुतोष तिवारी को टिकट दिया जो संभागीय संगठन प्रभारी रह चुके हैं. बीजेपी ने एक ब्राह्मण नरोत्तम मिश्रा का टिकट काटकर दूसरे ब्राह्मण आशुतोष तिवारी को टिकट दिया. इससे जातिगत और सामाजिक संतुलन यथावत है.