IPL में श्रेयस अय्यर का कप्तानी रिकॉर्ड शानदार है. दिल्ली कैपिटल्स को फाइनल, कोलकाता नाइट राइडर्स को चैम्पियन और पंजाब किंग्स को फाइनल तक पहुंचाने वाले श्रेयस जब भारत के टी20 कप्तान बने तो फैसला बिल्कुल सही लगा. लेकिन UK दौरे पर सिर्फ 7 मैचों में तस्वीर बदल गई. आयरलैंड के खिलाफ 0-2 और इंग्लैंड के खिलाफ 0-4... यानी छह हार और एक बेनतीजा मुकाबला. सवाल सिर्फ हार का नहीं, बल्कि यह है कि क्या IPL में सफल कप्तान होना इंटरनेशनल क्रिकेट में भी सफलता की गारंटी है?
श्रेयस अय्यर की कप्तानी पर सवाल इसलिए नहीं उठ रहे कि भारत 6 मैच हार गया. सवाल इसलिए उठ रहे हैं क्योंकि इस दौरे ने IPL और इंटरनेशनल क्रिकेट की कप्तानी के बीच सबसे बड़ा अंतर सामने ला दिया.
IPL में कप्तान को लगभग तैयार टीम मिलती है. नीलामी में जरूरत के हिसाब से खिलाड़ी खरीदे जाते हैं. पावरप्ले अटैकर चाहिए तो खरीदिए, डेथ ओवर स्पेशलिस्ट चाहिए तो खरीदिए, मिडिल ओवर का लेग स्पिनर चाहिए तो खरीदिए. कप्तान का काम उन खिलाड़ियों का सबसे बेहतर इस्तेमाल करना होता है.
लेकिन इंटरनेशनल क्रिकेट में ऐसा नहीं होता. यहां कप्तान अपनी पसंद के खिलाड़ी नहीं खरीद सकता. उसे वही खिलाड़ी मिलते हैं जो उपलब्ध हैं और उन्हीं से संतुलित टीम बनानी होती है.
यही चुनौती श्रेयस अय्यर के सामने UK दौरे पर आई.
भारत के पास अभिषेक शर्मा, संजू सैमसन, ईशान किशन और वैभव सूर्यवंशी जैसे टॉप ऑर्डर बल्लेबाज थे, लेकिन हार्दिक पंड्या जैसा तेज गेंदबाजी ऑलराउंडर नहीं था. जसप्रीत बुमराह भी टीम में नहीं थे. यानी प्रतिभा तो थी, लेकिन संतुलन नहीं.
सबसे ज्यादा भ्रम ओपनिंग कॉम्बिनेशन में दिखा. कभी संजू सैमसन खेले, फिर वैभव सूर्यवंशी को मौका मिला, फिर आखिरी मैच में संजू लौट आए. इससे साफ नहीं हो पाया कि टीम भविष्य के लिए किसे तैयार कर रही है.
इसी तरह बल्लेबाजी क्रम भी लगातार बदलता रहा. ब्रिस्टल टी20 में शिवम दुबे को तिलक वर्मा से ऊपर भेजा गया. रणनीति गलत नहीं थी, लेकिन सवाल यह था कि क्या खिलाड़ियों की भूमिकाएं पहले से तय थीं या मैच के दौरान बनाई जा रही थीं?
अंतरराष्ट्रीय कप्तानी की सबसे बड़ी जिम्मेदारी यही होती है कि हर खिलाड़ी को अपनी भूमिका पहले से पता हो. उसे यह मालूम होना चाहिए कि उसे पावरप्ले में आक्रामक खेलना है, मिडिल ओवर संभालने हैं या आखिर में तेजी से रन बनाने हैं.
गेंदबाजी में भी यही समस्या दिखाई दी. अर्शदीप सिंह के अलावा दबाव बनाने वाला दूसरा भरोसेमंद गेंदबाज नहीं मिला. ओल्ड ट्रैफर्ड में रवि बिश्नोई के एक ओवर में 29 रन ने मैच पलट दिया. यह गलती बिश्नोई की थी, लेकिन सवाल यह भी था कि मुश्किल ओवर किसे फेंकने हैं और किस गेंदबाज की क्या भूमिका है?
ट्रेंट ब्रिज में भारत 76 रनों पर सिमट गया, जबकि आखिरी टी20 में इंग्लैंड ने 257 रन ठोक दिए. पूरी सीरीज में ऐसा लगा कि टीम पहले प्रयोग कर रही है और बाद में तय कर रही है कि किस खिलाड़ी की जगह आखिर है कहां.
यहीं IPL और इंटरनेशनल क्रिकेट का सबसे बड़ा फर्क सामने आता है. IPL में टीम पहले बनती है, फिर कप्तान उसे चलाता है. इंटरनेशनल क्रिकेट में कप्तान को उपलब्ध खिलाड़ियों से टीम बनानी पड़ती है.
इस दौरे की हार का पूरा दोष श्रेयस अय्यर पर नहीं डाला जा सकता. चयनकर्ताओं ने टीम चुनी, कोचिंग स्टाफ ने रणनीति बनाई और खिलाड़ियों ने भी कई मौकों पर निराश किया. बुमराह और हार्दिक जैसे खिलाड़ियों की गैरमौजूदगी ने भी टीम का संतुलन बिगाड़ा.
फिर भी श्रेयस के लिए यह दौरा एक बड़ा सबक बन गया. IPL में उनकी कप्तानी की सफलता पर कोई सवाल नहीं है, लेकिन अब उन्हें यह साबित करना होगा कि वे सिर्फ तैयार टीम के कप्तान नहीं, बल्कि मुश्किल परिस्थितियों में नई टीम गढ़ने वाले अंतरराष्ट्रीय कप्तान भी बन सकते हैं.