शाम का वक्त है. मध्य प्रदेश के आगर मालवा के तनोडिया कस्बे में लोग धीरे-धीरे रामलीला चौक की तरफ बढ़ रहे हैं. किसी के साथ बच्चे हैं, कोई परिवार के साथ आया है और कोई दोस्तों के साथ. चौक पर पहुंचते ही नजर मंच पर जाती है. रोशनी जगमगा रही है. मंच तैयार है. सामने दर्शकों की भीड़ जमा होने लगी है.
फिर पर्दा उठता है. कुछ ही देर में मंच पर राम दिखाई देते हैं. लक्ष्मण हैं. भरत हैं. दशरथ हैं. जटायु हैं. दूसरी तरफ रावण और मेघनाथ भी अपने किरदार में उतर चुके हैं. इनमें से ज्यादातर कलाकार किसी मुंबई, दिल्ली या भोपाल की थिएटर टीम से नहीं आए हैं. ये उसी तनोडिया कस्बे के लोग हैं. कोई शिक्षक है, कोई स्थानीय युवा और कोई ग्रामीण. और ये सिर्फ एक रात का कार्यक्रम नहीं है.
यहां देखें Video
गणेश चतुर्थी से लेकर अनंत चतुर्दशी तक पूरे 10 दिन यहां रामायण की कहानी मंच पर उतारी जाती है. अब जरा कैलेंडर पीछे पलटिए. ये परंपरा आज से 75 साल से भी ज्यादा पहले शुरू हुई थी. साल था 1951... तब देश को आजाद हुए महज चार साल हुए थे.
उस वक्त तनोडिया में रामलीला का पहला मंच सजा था. लोगों ने रामायण के किरदार निभाए और कस्बे के लोग उन्हें देखने जुटे. उस दिन से शुरू हुआ सिलसिला आज भी जारी है. यानी 1951 में जिस मंच पर रामायण की कहानी शुरू हुई थी, 75 साल बाद भी उसी परंपरा की रोशनी जल रही है.
तनोडिया में गणेश उत्सव सिर्फ गणपति की स्थापना और विसर्जन तक सीमित नहीं है. इसके साथ एक और पुरानी परंपरा जुड़ी हुई है. रामलीला... गणेश चतुर्थी से 10 दिवसीय रामलीला का मंचन शुरू होता है. हर दिन रामायण के अलग-अलग प्रसंग मंच पर दिखाए जाते हैं. फिर अनंत चतुर्दशी के दिन श्रीराम के राज्याभिषेक के साथ इस आयोजन का समापन होता है. इस दौरान रामलीला चौक में शाम होते ही माहौल बदल जाता है.
मंच पर कलाकार तैयार होते हैं. दर्शक अपनी जगह तलाशते हैं. बच्चे आगे बैठने की कोशिश करते हैं. बुजुर्ग पीछे या किनारे से पूरा मंच देखते हैं. फिर जैसे ही अभिनय शुरू होता है, चौक में बैठे लोगों के लिए कुछ देर के लिए मोबाइल, टीवी और रोजमर्रा की जिंदगी पीछे छूट जाती है. सामने रामायण चल रही होती है.

यहां राम से लेकर रावण तक, सब अपने लोग हैं
तनोडिया की रामलीला की सबसे खास बात इसके कलाकार हैं. राम कौन बनेंगे? कस्बे का ही कोई व्यक्ति. लक्ष्मण? स्थानीय शिक्षक. रावण? वही शिक्षक जो दिन में बच्चों को पढ़ाते हैं. भरत, शत्रुघ्न, दशरथ, जटायु, मेघनाथ और विभीषण जैसे किरदार भी स्थानीय लोग निभाते हैं. यानी मंच पर जिस किरदार को दर्शक देख रहे हैं, संभव है कि कुछ घंटे पहले वही व्यक्ति कस्बे की किसी दुकान पर खड़ा दिखाई दिया हो या दिन में स्कूल में बच्चों को पढ़ा रहा हो.
रावण का किरदार निभाने वाले शिक्षक धर्मेंद्र सिंह राठौर भी इसी परंपरा का हिस्सा हैं. उनका कहना है कि यह उनके गांव की सांस्कृतिक धरोहर है. आज की पीढ़ी इस परंपरा से रूबरू हो, इसलिए वे इसमें हिस्सा लेते हैं. यानी यहां रावण बनना सिर्फ एक अभिनय नहीं है. यह उस परंपरा को आगे बढ़ाने का एक तरीका भी है, जो उनके बुजुर्गों से उन्हें मिली है.

यह भी पढ़ें: मंथरा, रावण, कुंभकर्ण...'रामायण' के 11 सितारों ने छोड़ी दुनिया, एक की मौत आज भी मिस्ट्री
रामलीला में लक्ष्मण का किरदार निभाने वाले शिक्षक सर्वेश घोंसले की भी अपनी भूमिका है. दिन में वह शिक्षक हैं. लेकिन रामलीला के दिनों में शाम होते ही वह लक्ष्मण बन जाते हैं. उनके लिए रामायण सिर्फ एक धार्मिक कथा नहीं है. उनका कहना है कि रामायण के चरित्र लोगों को आदर्श जीवन जीने की सीख देते हैं. और यही बात इस पूरी रामलीला को आज के समय में भी खास बनाती है. यहां मोबाइल और AI के दौर में लोग अब भी शाम को रामलीला देखने निकलते हैं. यहां लोग कहानी देखने आते हैं, लेकिन साथ में अपनी पुरानी यादों से भी मिलने आते हैं.
AI के दौर में गांव का मंच
आज मनोरंजन आपकी जेब में है. मोबाइल उठाइए और दुनिया की कोई भी फिल्म, सीरीज या वीडियो देख लीजिए. लेकिन तनोडिया में हर साल लोग एक अलग रास्ता चुनते हैं. वे घर से निकलते हैं. रामलीला चौक पहुंचते हैं. सामने मंच पर अपने ही कस्बे के लोगों को रामायण के किरदार निभाते देखते हैं.

शिक्षक अभिनय कर रहे हैं. ग्रामीण अलग-अलग पात्रों में नजर आ रहे हैं. बच्चे सामने बैठे हैं. बुजुर्ग पूरे मंचन को गौर से देख रहे हैं. यानी यहां रामलीला सिर्फ मंच पर होने वाली घटना नहीं है. यह पूरा कस्बा मिलकर करता है. शायद इसी वजह से शिक्षक सर्वेश घोंसले इसे आज के AI दौर में भारतीय संस्कृति और विरासत को बचाए रखने वाला आयोजन मानते हैं.
रामलीला के मुख्य किरदार भले ही स्थानीय लोग निभाते हों, लेकिन मंच को पूरा रंग देने के लिए बाहर से भी कुछ कलाकार बुलाए जाते हैं. हारमोनियम और ढोलक बजाने वाले कलाकार आते हैं. नृत्य करने वाले कलाकार भी शामिल होते हैं. उनका पारिश्रमिक सार्वजनिक गणेशोत्सव समिति की तरफ से दिया जाता है. इससे मंचन में संगीत और नृत्य का रंग भी जुड़ जाता है. लेकिन कहानी का असली चेहरा वही रहता है. तनोडिया के लोग.
75 साल में पीढ़ियां बदलीं, रामलीला नहीं
सोचिए, 1951 में जब पहली बार यह मंच सजा होगा तो उस समय जिन लोगों ने रामलीला देखी होगी, उनमें से शायद बहुत कम लोग आज इस दुनिया में होंगे. उनके बच्चे आए होंगे. फिर उनके बच्चे. और अब उनकी अगली पीढ़ी. किसी ने अपने पिता को मंच पर देखा होगा. किसी ने अपने दादा को रावण या राम का किरदार निभाते देखा होगा.
किसी ने बचपन में दर्शक बनकर रामलीला देखी होगी और बड़ा होकर खुद मंच पर उतर गया होगा. यही किसी परंपरा के जिंदा होने की असली तस्वीर है. क्योंकि परंपरा सिर्फ किताबों में लिखी रहे तो वह इतिहास बन जाती है. लेकिन जब एक पीढ़ी अगली पीढ़ी को उसे करके दिखाती है, तो वह परंपरा बनकर जिंदा रहती है. तनोडिया की रामलीला के साथ भी यही हुआ है.

दस दिन के लिए पूरा कस्बा रामायण में उतर जाता है
गणेश चतुर्थी से अनंत चतुर्दशी तक चलने वाले इन दस दिनों में रामलीला चौक सिर्फ एक मंच नहीं रहता. यह तनोडिया का सांस्कृतिक मिलन स्थल बन जाता है. दूर-दूर के गांवों से लोग आते हैं. स्थानीय लोग अपने परिचितों को मंच पर देखते हैं. बच्चे नए किरदारों को पहचानते हैं. बुजुर्ग पुरानी रामलीलाओं को याद करते हैं. और मंच पर कहानी आगे बढ़ती रहती है. वनवास से लेकर युद्ध तक और फिर श्रीराम के राज्याभिषेक तक.
हर साल कहानी वही होती है. लेकिन देखने वाले चेहरे बदलते रहते हैं. कलाकार बदलते रहते हैं. पीढ़ियां बदलती रहती हैं. बस एक चीज नहीं बदलती. रामलीला चौक की वह रोशनी. 1951 में जो मंच सजा था, वह आज भी सजा है.
75 साल से ज्यादा वक्त बीत गया. देश बदला, कस्बा बदला, लोगों की जिंदगी बदली, मनोरंजन बदल गया. लेकिन तनोडिया की रामलीला अब भी हर गणेशोत्सव पर लोगों को उसी चौक तक खींच लाती है. और शायद यही इस कहानी की सबसे खूबसूरत बात है. यहां रामायण सिर्फ सुनाई नहीं जाती. इसे हर साल तनोडिया के लोग मिलकर फिर से जीते हैं.