किसी को गिरफ्तार करने के बाद पुलिस उसे कितने दिन अपनी हिरासत में रख सकती है? आरोपी को जेल भेजने का फैसला कौन करता है? चार्जशीट दाखिल करने में देरी हो तो क्या जमानत मिल सकती है? सौरव दास और आशुतोष रांका की हिरासत का मामला इन सवालों को समझने का मौका देता है.
दिल्ली पुलिस ने विशेष कार्यकारी मजिस्ट्रेट (SEM) से सौरव दास और आशुतोष रांका को कम से कम तीन दिन और न्यायिक हिरासत में रखने की मांग की है. पुलिस की अर्जी पर 14 अक्टूबर को पांच दिन और 19 अक्टूबर को दो दिन की हिरासत का आदेश दिया गया था. अब पुलिस उनकी हिरासत आगे बढ़ाना चाहती है.
इस मामले को समझने के लिए यह जानना जरूरी है कि पुलिस हिरासत, न्यायिक हिरासत और जमानत तीन अलग-अलग चीजें हैं. इनके नियम भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS) में बताए गए हैं.
पुलिस हिरासत और न्यायिक हिरासत में क्या फर्क है?
पुलिस हिरासत का मतलब है कि आरोपी पुलिस की निगरानी में रहता है. इस दौरान पुलिस उससे पूछताछ कर सकती है. न्यायिक हिरासत में आरोपी जेल में रहता है और उसकी हिरासत अदालत के आदेश के तहत होती है.
BNSS की धारा 187 के मुताबिक, पुलिस किसी आरोपी को कुल 15 दिन तक अपनी हिरासत में रख सकती है. ये 15 दिन एक साथ लेना जरूरी नहीं है. कानून के तहत पुलिस सामान्य मामलों में गिरफ्तारी के शुरुआती 40 दिनों के भीतर, जबकि गंभीर अपराधों में शुरुआती 60 दिनों के भीतर अलग-अलग समय पर हिरासत मांग सकती है. इसके लिए मजिस्ट्रेट की मंजूरी जरूरी है. वहीं, किसी भी गिरफ्तार व्यक्ति को यात्रा में लगने वाला समय छोड़कर 24 घंटे के भीतर मजिस्ट्रेट के सामने पेश करना जरूरी है.
कितने दिन तक जेल में रह सकता है आरोपी?
न्यायिक हिरासत की अवधि मामले और अदालत के आदेश पर निर्भर करती है. इसे एक तय अवधि के बाद अपने आप खत्म नहीं माना जा सकता. मजिस्ट्रेट कानून के मुताबिक हिरासत बढ़ा सकता है. आम तौर पर लोग पुलिस हिरासत और जेल में रहने की अवधि को एक ही समझ लेते हैं, लेकिन दोनों में फर्क है. पुलिस हिरासत में पूछताछ की जाती है, जबकि न्यायिक हिरासत में आरोपी जेल में रहता है. दोनों के लिए अलग-अलग कानूनी नियम हैं.
60 या 90 दिन में चार्जशीट नहीं तो क्या होगा?
जांच पूरी करने और चार्जशीट दाखिल करने के लिए कानून में समय-सीमा तय है. BNSS के तहत, कुछ मामलों में यह अवधि 60 दिन है, जबकि गंभीर अपराधों में 90 दिन तक होती है.
ऐसे में अगर तय समय के भीतर चार्जशीट दाखिल नहीं होती और आरोपी जमानत की जरूरी शर्तें पूरी करते हुए आवेदन करता है, तो उसे डिफॉल्ट बेल यानी वैधानिक जमानत पाने का अधिकार हो सकता है. यह जमानत अपने आप नहीं मिलती. आरोपी को इसके लिए कानूनी प्रक्रिया पूरी करनी होती है.
क्या हर आरोपी को जमानत मिल जाती है?
नहीं. जमानत का फैसला अपराध की प्रकृति, मामले के तथ्यों और कानून में दी गई शर्तों के आधार पर होता है. डिफॉल्ट बेल का नियम भी तभी लागू होता है, जब जांच की तय समय-सीमा पूरी हो जाए और चार्जशीट दाखिल न की गई हो.
सौरव दास और आशुतोष रांका के मामले में फिलहाल मुख्य सवाल उनकी न्यायिक हिरासत बढ़ाने की मांग का है. पुलिस की मांग और हिरासत बढ़ाने के आदेश में फर्क है. आगे कितने दिन हिरासत रहेगी, यह संबंधित मजिस्ट्रेट के आदेश पर निर्भर करेगा.