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'हर टूटी शादी को क्रिमिनल केस न बनाएं', इलाहाबाद HC ने खारिज की दहेज उत्पीड़न की FIR, दी बड़ी चेतावनी

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने ढाई महीने चली शादी के बाद दर्ज कराई गई दहेज उत्पीड़न और हत्या के प्रयास की FIR को रद्द कर दिया है. कोर्ट ने कहा कि हर टूटती शादी को आपराधिक केस में बदलने से विवाह जैसी संस्था प्रभावित होगी और तलाक की अर्जी के बाद दर्ज FIR कानून का दुरुपयोग दर्शाती है.

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पति-पत्नी के विवाद में क्रिमिनल लॉ के गलत इस्तेमाल पर हाईकोर्ट सख्त (File Photo: ITG)
पति-पत्नी के विवाद में क्रिमिनल लॉ के गलत इस्तेमाल पर हाईकोर्ट सख्त (File Photo: ITG)

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कम समय में टूटने वाली शादियों में आपसी विवाद को आपराधिक मामले में बदलने की प्रवृत्ति पर चिंता जताई है. अदालत ने दहेज उत्पीड़न, शारीरिक हिंसा और गला दबाकर मारने की कोशिश जैसे आरोपों से जुड़ी प्राथमिकी (FIR) रद्द करते हुए कहा कि हर परेशान या असफल वैवाहिक रिश्ते को नियमित रूप से आपराधिक मामले में बदलना विवाह संस्था की बुनियाद को प्रभावित कर सकता है.

जस्टिस चंद्र धारी सिंह और जस्टिस तरुण सक्सेना की खंडपीठ ने यह फैसला गौरव जैन और उनके परिवार के सदस्यों की याचिका पर सुनाया. अदालत ने आगरा के हरिपर्वत थाने में भारतीय न्याय संहिता और दहेज रोधी अधिनियम की विभिन्न धाराओं के तहत दर्ज प्राथमिकी को रद्द कर दिया.

अदालत ने वैवाहिक विवादों में आपराधिक कानून के संभावित दुरुपयोग के प्रति आगाह करते हुए कहा कि वैवाहिक मतभेद को अपने आप अपराध नहीं माना जा सकता. आपराधिक कार्यवाही का इस्तेमाल वैवाहिक अदालत में होने वाले कानूनी निर्णय की जगह लेने के लिए भी नहीं किया जाना चाहिए.

करीब ढाई महीने ही साथ रहे पति-पत्नी

मामले के तथ्यों के अनुसार, संबंधित दंपती की शादी 12 नवंबर 2024 को हुई थी. शादी के लगभग ढाई महीने बाद, 3 फरवरी 2025 को पत्नी अपने मायके चली गई. इसके बाद पति ने 3 मई 2025 को तलाक की अर्जी दाखिल की. तलाक की याचिका दायर होने के कुछ समय बाद 30 जून 2025 को पत्नी ने पति और उसके परिजनों पर दहेज प्रताड़ना, मारपीट, भूखा रखने और गला दबाकर जान से मारने के प्रयास जैसी गंभीर धाराओं में एफआईआर दर्ज करवा दी.

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हाईकोर्ट ने अपने आदेश में कहा कि वैवाहिक जीवन के दौरान कथित घटनाओं को लेकर घरेलू हिंसा की कोई शिकायत, पुलिस नियंत्रण कक्ष में फोन करने या उसी समय पुलिस के हस्तक्षेप का रिकॉर्ड अदालत के सामने पेश नहीं किया गया था.हालांकि, अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि महिलाओं को दहेज संबंधी हिंसा और क्रूरता से बचाना कानून तथा संविधान के तहत जरूरी है. इसके साथ ही आपराधिक कानून के दुरुपयोग की आशंका को भी नजरअंदाज नहीं किया जा सकता.

अदालत ने कहा कि वैवाहिक विवाद और आपराधिक कृत्य के बीच अंतर करना जरूरी है. केवल वैवाहिक रिश्ता बिगड़ने के आधार पर आपराधिक कार्यवाही को उचित नहीं ठहराया जा सकता.

हाईकोर्ट की चेतावनी

 हाईकोर्ट ने चेतावनी दी कि यदि हर असफल या तनावपूर्ण शादी को नियमित रूप से एफआईआर में बदल दिया गया और पक्षकारों को आपराधिक कानून की कठोर प्रक्रिया से गुजरना पड़ा, तो इसका असर विवाह संस्था की बुनियाद पर पड़ सकता है. अपने फैसले में अदालत ने यह भी साफ किया कि प्राथमिकी रद्द करने का अर्थ लंबित वैवाहिक मुकदमे के गुण-दोष पर फैसला देना नहीं है. दोनों पक्ष सक्षम वैवाहिक अदालत में अपने कानूनी उपाय अपना सकते हैं.

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अदालत ने यह भी कहा कि शिकायतकर्ता किसी अलग कारण या स्वतंत्र शिकायत के संबंध में कानून के तहत उपलब्ध उपाय अपना सकती हैं, बशर्ते वे संबंधित कानूनी शर्तों को पूरा करती हों. 

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