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ऊंट कटा हुआ, हाथी चपटा... शतरंज की मोहरों की डिजाइन की क्या है कहानी?

शतरंज बोर्ड पर ऊंट, हाथी, घोड़ा, राजा और वजीर की मोहरें तो आपने खूब देखी होंगी, लेकिन क्या कभी सोचा है कि इनका आकार ऐसा क्यों होता है? ऊंट की मोहर असल में ऊंट जैसी क्यों नहीं दिखती और हाथी का मोहरा किले जैसा क्यों नजर आता है?

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जानिए शतरंज की मोहरों की डिजाइन के पीछे छिपी दिलचस्प कहानी. ( Photo: ITG)
जानिए शतरंज की मोहरों की डिजाइन के पीछे छिपी दिलचस्प कहानी. ( Photo: ITG)

शतरंज के बोर्ड पर राजा, वजीर, हाथी, घोड़ा, ऊंट और प्यादे तो आपने जरूर देखे होंगे. लेकिन क्या कभी आपने सोचा है कि इन मोहरों के नाम और उनकी शक्ल के बीच इतना फर्क क्यों है? घोड़े को देखकर तुरंत समझ आ जाता है कि वह घोड़ा है, लेकिन जिसे हम ऊंट कहते हैं, वह ऊंट जैसा दिखता ही नहीं. इसी तरह शतरंज का हाथी भी असली हाथी जैसा नजर नहीं आता. दरअसल, इन मोहरों को समझने के लिए सिर्फ शतरंज का बोर्ड देखना काफी नहीं है. इनके पीछे करीब डेढ़ हजार साल से ज्यादा पुरानी कहानी है. यह खेल भारत से शुरू होकर फारस, मुस्लिम दुनिया और फिर यूरोप तक पहुंचा. इस सफर में इसके नियम बदले, मोहरों की चाल बदली और उनके नाम व रूप भी बदलते गए.

भारत के चतुरंग से शुरू हुई कहानी
Chess.com वेबसाइट के मुताबिक, शतरंज की शुरुआती कहानी भारत के प्राचीन खेल चतुरंग से जुड़ी मानी जाती है. करीब 6वीं शताब्दी में खेले जाने वाले इस खेल में उस समय की सेना की अलग-अलग यूनिट को दिखाया जाता था. चतुरंग में सेना के चार प्रमुख हिस्से थे. पैदल सैनिक, घोड़े, हाथी और रथ. यही चार सैन्य इकाइयां आगे चलकर आधुनिक शतरंज के प्यादा, घोड़ा, ऊंट और हाथी यानी Bishop और Rook से जुड़ीं. यानी आज हम जिन मोहरों से शतरंज खेलते हैं, उनके पीछे पुराने समय की युद्ध व्यवस्था की कहानी छिपी हुई है.

भारत से फारस और फिर यूरोप पहुंचा खेल
भारत से यह खेल फारस पहुंचा. वहां इसके नाम और नियमों में बदलाव हुए. इसके बाद यह मुस्लिम दुनिया में फैला और फिर यूरोप पहुंचा. हर जगह शतरंज को वहां की भाषा और संस्कृति का असर मिला. इसी वजह से एक ही मोहरे को अलग-अलग जगहों पर अलग नाम से जाना जाने लगा. समय के साथ इन मोहरों की चाल भी बदलती गई. जो मोहरा कभी किसी खास सैन्य यूनिट का प्रतिनिधित्व करता था, वह आगे चलकर एक बिल्कुल अलग नाम और रूप में नजर आने लगा.

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जिसे हम ऊंट कहते हैं, वह कभी हाथी था
अब आते हैं सबसे दिलचस्प मोहरे पर. आज भारत में जिसे आम तौर पर ऊंट कहा जाता है, उसकी कहानी असल में ऊंट से शुरू नहीं होती. प्राचीन चतुरंग में यह मोहरा हाथी को दर्शाता था. फारस और पश्चिमी शतरंज की परंपरा में भी यह हाथी वाले मोहरे के रूप में मौजूद रहा. बाद में यूरोप में यही मोहरा बिशप (Bishop) बन गया.
यानी जिस मोहरे को आज हम बिशप कहते हैं, उसकी ऐतिहासिक जड़ पुराने हाथी वाले मोहरे में मिलती है. इसमें एक और दिलचस्प बात है. पुराने फारसी और पश्चिमी शतरंज में यह मोहरा आज के बिशप की तरह पूरी बिसात में तिरछा नहीं चलता था. इसकी चाल सीमित थी. यह दो खाने तिरछे चल सकता था और बीच में कोई मोहरा होने पर उसके ऊपर से छलांग भी लगा सकता था. बाद में यूरोप में इसके नियम बदले और बिशप की चाल आज वाली हो गई.

फिर इसका नाम ऊंट कैसे पड़ा?
समय के साथ इस मोहरे के नाम अलग-अलग जगहों पर बदलते गए. Chess.com के इतिहास के मुताबिक, भारत के कुछ हिस्सों में हाथी वाले इस मोहरे को ऊंट ( Camel) के नाम से भी जाना जाने लगा. यानी यहां नाम और पुराने प्रतीक के बीच एक बड़ा अंतर पैदा हो गया. इसलिए आज जब हम शतरंज के बोर्ड पर ऊंट की मोहर देखते हैं और सोचते हैं कि यह आखिर ऊंट जैसी क्यों नहीं दिखती, तो इसका जवाब इसके लंबे इतिहास में मिलता है. यह मोहरा अलग-अलग देशों और भाषाओं से गुजरते हुए कई नामों और रूपों से जुड़ा.

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हाथी कहलाने वाला मोहरा असल में रथ से आया
अब उस मोहरे की बात जिसे भारत में आम तौर पर हाथी कहा जाता है. यहां कहानी और भी दिलचस्प है. प्राचीन चतुरंग में यह मोहरा हाथी नहीं बल्कि रथ(Chariot) को दर्शाता था. यही मोहरा आगे चलकर फारसी और फिर यूरोपीय शतरंज में बदलते हुए रुक (Rook) बना. इसलिए अंग्रेजी के रुक और भारत में बोले जाने वाले 'हाथी' के बीच नाम को लेकर भ्रम हो सकता है. इतिहास में इसकी जड़ पुराने रथ से जुड़ी है. यानी शतरंज के बोर्ड पर जिस मोहरे को हम आज हाथी कहते हैं, उसका सफर असल में एक रथ से शुरू हुआ था.

चतुरंग में घोड़ा भी सेना की एक अहम इकाई था. यही आगे चलकर आधुनिक शतरंज का (नाईट) Knight बना. घोड़े की पहचान दूसरे मोहरों की तुलना में ज्यादा आसानी से बनी रही. इसकी चाल भी बाकी मोहरों से अलग रही. आधुनिक शतरंज में नाईट दूसरे मोहरों के ऊपर से छलांग लगाकर चलता है और इसकी चाल 'L' जैसी होती है. हालांकि शुरुआती चतुरंग और बाद के शतरंज में इसकी चाल में कुछ अंतर थे, लेकिन घुड़सवार सैनिक से जुड़ी इसकी पहचान बनी रही.

राजा तो रहा, लेकिन वजीर क्वीन बन गया
शतरंज में राजा सबसे महत्वपूर्ण मोहरा है. लेकिन आज का सबसे ताकतवर मोहरा क्वीन है. दिलचस्प बात यह है कि पुराने शतरंज में आज की क्वीन जैसी ताकतवर मोहरा मौजूद ही नहीं थी. चतुरंग में राजा के साथ एक सलाहकार होता था. शुरुआती शतरंज में यह मोहरा सिर्फ एक खाना तिरछा चल सकता था. यूरोप में शतरंज के नियमों में बदलाव के साथ इस मोहरे की ताकत भी बढ़ती गई. धीरे-धीरे इसकी चाल इतनी शक्तिशाली हो गई कि यह आज की क्वीन बन गई. अब  क्वीन सीधी और तिरछी दोनों दिशाओं में कितने भी खाने चल सकती है. यही वजह है कि आधुनिक शतरंज में  क्वीन सबसे ताकतवर मोहरा बन गई.

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प्यादा छोटा क्यों होता है?
चतुरंग में पैदल सैनिक भी सेना का हिस्सा थे. यही आगे चलकर आधुनिक शतरंज के प्यादे (Pawn) बने. पैदल सैनिक सेना की बड़ी संख्या का हिस्सा होते थे, इसलिए बोर्ड पर प्यादों की संख्या भी बाकी मोहरों से ज्यादा होती है. हालांकि पुराने चतुरंग में प्यादे की चाल आज के प्यादे जैसी पूरी तरह नहीं थी. समय के साथ इसके नियमों में भी बदलाव हुए. आज प्यादा आम तौर पर एक खाना आगे बढ़ता है और खास स्थिति में पहली चाल में दो खाने भी आगे जा सकता है. अगर वह बोर्ड की आखिरी पंक्ति तक पहुंच जाए तो उसे किसी दूसरे ताकतवर मोहरे में बदला जा सकता है. इसे प्रमोशन कहा जाता है.
 
मोहरों की असली शक्ल आखिर गायब कैसे हुई?
अब सवाल आता है कि अगर पुराने शतरंज में हाथी, घोड़ा और रथ जैसी सैन्य इकाइयां थीं, तो आज के मोहरे इतने अलग क्यों दिखते हैं? इसका संबंध शतरंज के अलग-अलग देशों तक पहुंचने से है. जब शतरंज मुस्लिम दुनिया में पहुंचा तो मोहरों की शक्ल में बड़ा बदलाव आया. उस दौर की इस्लामी कला और धार्मिक मान्यताओं के प्रभाव के कारण इंसानों और जानवरों की वास्तविक आकृतियों की जगह अमूर्त ( Abstract) आकार का इस्तेमाल बढ़ा. इसलिए पुराने हाथी या घोड़े को बिल्कुल वैसा दिखाने वाली मूर्ति बनाने के बजाय मोहरों को सरल और प्रतीकात्मक आकार दिया जाने लगा. यही वजह है कि शतरंज के मोहरे समय के साथ अपनी मूल सैन्य आकार से काफी अलग नजर आने लगे.

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यूरोप में पहुंचकर शतरंज और बदला
शतरंज जब यूरोप पहुंचा तो इसके नियमों में कई बड़े बदलाव हुए. खासकर 15वीं सदी के आसपास क्वीन और बिशप की चाल में बड़े बदलाव हुए और खेल काफी तेज हो गया. धीरे-धीरे शतरंज उस रूप के करीब पहुंचने लगा जिसे हम आज जानते हैं. इस तरह शतरंज की मौजूदा बिसात अचानक नहीं बनी. इसके पीछे भारत के चतुरंग से लेकर फारस, मुस्लिम दुनिया और यूरोप तक का लंबा सफर है.

तो ऊंट और हाथी की शक्ल का राज क्या है?
अब शुरुआत वाले सवाल पर वापस आते हैं. ऊंट ऊंट जैसा क्यों नहीं दिखता? क्योंकि जिस मोहरे को आज भारत में ऊंट कहा जाता है, उसकी ऐतिहासिक जड़ पुराने हाथी वाले मोहरे में है और यूरोप में वही मोहरा आगे चलकर बिशप बना. हाथी हाथी जैसा क्यों नहीं दिखता? क्योंकि इसका ऐतिहासिक संबंध हाथी से नहीं बल्कि प्राचीन चतुरंग के रथ से है, जो आगे चलकर रुक (Rook) बना. और यही शतरंज की सबसे दिलचस्प बात है. आज के मोहरों के नाम और आकार को समझने के लिए उनके पुराने रूपों और अलग-अलग देशों की यात्रा को समझना पड़ता है.

शतरंज बोर्ड पर रखे ये छोटे-छोटे मोहरे सिर्फ खेल के हिस्से नहीं हैं. इनके पीछे भारत के प्राचीन चतुरंग से लेकर फारस, मुस्लिम दुनिया और यूरोप तक की लंबी ऐतिहासिक यात्रा छिपी है. 

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