29 अगस्त 1949 को कजाकिस्तान के सेमिपालातिंस्क स्थित एक टेस्टिंग साइट पर सोवियत रूस ने अपने पहले परमाणु बम का सफल विस्फोट किया. इसका कोड नेम 'फर्स्ट लाइटनिंग' था. विस्फोट के प्रभावों का आकलन करने के लिए, सोवियत वैज्ञानिकों ने बम के आसपास इमारतें, पुल और अन्य नागरिक संरचनाएं बनाईं. उन्होंने पास में ही पिंजरों में जानवर भी रखे ताकि वे मानव जैसे स्तनधारियों पर रेडिएशन के प्रभावों को टेस्ट कर सकें.
20 किलोटन की यह परमाणु विस्फोट, लगभग अमेरिका के पहले परमाणु विस्फोट 'ट्रिनिटी' के बराबर था. इसने उन संरचनाओं को नष्ट कर दिया और जानवरों को जलाकर राख कर दिया. 3 सितंबर को साइबेरिया के तट पर उड़ रहे एक अमेरिकी जासूसी विमान को विस्फोट से रेडियोएक्टिव रेडिएशन के सबूत मिले थे. उसी महीने के अंत में, राष्ट्रपति हैरी एस. ट्रूमैन ने अमेरिकी जनता को बताया कि सोवियत संघ के पास भी परमाणु बम है.
तीन महीने बाद, क्लॉस फुक्स नाम के एक जर्मन मूल के भौतिक विज्ञानी को अमेरिका ने गिरफ्तार कर लिया. उसने अमेरिका को अपने पहले परमाणु बम बनाने में मदद की थी. उस पर आरोप लगा कि उसी ने सोवियत संघ को परमाणु बम बनाने का सीक्रेट फॉर्मूला दिया है.
द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान अमेरिकी परमाणु विकास मुख्यालय में तैनात रहते हुए , फुक्स ने सोवियत संघ को अमेरिकी परमाणु कार्यक्रम के बारे में सटीक जानकारी दी थी. इसमें जापान पर गिराए गए "फैट मैन" परमाणु बम का खाका और हाइड्रोजन बम की परिकल्पना के बारे में लॉस अलामोस के वैज्ञानिकों को मालूम सभी जानकारी शामिल थी.
फुक्स की जासूसी के खुलासे और अमेरिकी परमाणु वर्चस्व के पतन के कारण राष्ट्रपति ट्रूमैन ने हाइड्रोजन बम के विकास का आदेश दिया. एक ऐसा हथियार जिसके बारे में यह सिद्धांत दिया गया था कि यह जापान पर गिराए गए परमाणु बमों से सैकड़ों गुना अधिक शक्तिशाली होगा.