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जब साउथ अफ्रीका में बोअर युद्ध शुरू हुआ, सोने और हीरे के लिए हुई थी लड़ाई

आज के दिन ही साउथ अफ्रीका में बोअर युद्ध शुरू हुआ था. यह युद्ध करीब ढाई साल तक चला. यह लड़ाई असल में कीमती खनिजों के भंडार पर कब्जे के लिए ही हुआ था.

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आज के दिन ही बोअर युद्ध की शुरुआत हुई थी (Photo - Pexels)
आज के दिन ही बोअर युद्ध की शुरुआत हुई थी (Photo - Pexels)

11 अक्टूबर 1899 को दक्षिण अफ्रीका में ब्रिटिश साम्राज्य और बोअर समुदाय के बीच एक बड़ा युद्ध शुरू हुआ था. इसे बोअर युद्ध या दूसरा बोअर युद्ध कहा जाता है. इस लड़ाई में एक तरफ दुनिया की बड़ी ताकत ब्रिटेन था, तो दूसरी तरफ ट्रांसवाल और ऑरेंज फ्री स्टेट नाम के दो स्वतंत्र बोअर गणराज्य थे. शुरुआत में यह लड़ाई जमीन और राजनीतिक अधिकारों को लेकर थी, लेकिन इलाके में सोने और हीरे की खोज ने तनाव को और बढ़ा दिया. युद्ध करीब ढाई साल तक चला और इसमें हजारों लोगों की जिंदगी प्रभावित हुई.

बोअर, जिन्हें अफ्रीकानेर भी कहा जाता है, दक्षिण अफ्रीका में बसे शुरुआती डच लोगों के वंशज थे. उनके पूर्वज 17वीं सदी से इस इलाके में रह रहे थे. साल 1806 में नेपोलियन युद्धों के दौरान ब्रिटेन ने डच केप कॉलोनी पर कब्जा कर लिया. इसके बाद ब्रिटिश शासन और बोअर समुदाय के बीच तनाव बढ़ने लगा.

बोअर लोग अपनी अलग पहचान और आजादी बनाए रखना चाहते थे. उन्हें ब्रिटिश शासन की नीतियां पसंद नहीं थीं. अंग्रेजी भाषा और संस्कृति को बढ़ावा देने की कोशिशों के साथ-साथ गुलामी खत्म करने की ब्रिटिश नीति को लेकर भी उनके बीच नाराजगी थी.

1830 के दशक में बड़ी संख्या में बोअर लोगों ने ब्रिटिश नियंत्रण वाले इलाकों को छोड़कर दक्षिण अफ्रीका के अंदरूनी हिस्सों की ओर जाना शुरू किया. इस दौरान उन्होंने अफ्रीकी समुदायों के क्षेत्रों में अपने नए ठिकाने बनाए. आगे चलकर ट्रांसवाल और ऑरेंज फ्री स्टेट नाम के दो गणराज्य अस्तित्व में आए.

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काफी समय तक ब्रिटेन और बोअर गणराज्यों के बीच संबंध सामान्य रहे. लेकिन 1867 में दक्षिण अफ्रीका में हीरे मिलने और बाद के वर्षों में सोने के बड़े भंडार सामने आने के बाद हालात बदलने लगे.

इन खनिजों की वजह से इस इलाके का आर्थिक महत्व तेजी से बढ़ गया. ब्रिटेन इस क्षेत्र पर अपना प्रभाव बढ़ाना चाहता था, जबकि बोअर गणराज्य अपनी स्वतंत्रता बनाए रखना चाहते थे. दोनों के हित टकराने लगे और राजनीतिक तनाव बढ़ता गया. 1890 के दशक में ब्रिटेन और बोअर समुदाय के बीच छोटी-मोटी झड़पें होने लगीं. आखिरकार 11 अक्टूबर 1899 को यह तनाव बड़े युद्ध में बदल गया.

युद्ध शुरू होने के बाद ब्रिटिश सेना और बोअर लड़ाकों के बीच कई मोर्चों पर संघर्ष हुआ. जून 1900 के मध्य तक ब्रिटिश सेना ने बोअर क्षेत्रों के कई बड़े शहरों पर कब्जा कर लिया. ब्रिटेन ने ट्रांसवाल और ऑरेंज फ्री स्टेट को अपने नियंत्रण में लेने की घोषणा भी कर दी.

लेकिन कहानी यहीं खत्म नहीं हुई. बोअर लड़ाकों ने सीधे मुकाबले के बजाय गुरिल्ला युद्ध शुरू कर दिया. वे छोटे समूहों में हमला करते, ब्रिटिश सेना को नुकसान पहुंचाते और फिर वहां से निकल जाते थे. इस रणनीति ने ब्रिटिश सेना के लिए मुश्किलें बढ़ा दीं.

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बोअर लड़ाकों के गुरिल्ला हमलों से परेशान ब्रिटिश सेना ने 1901 से उन्हें रोकने के लिए सख्त रणनीति अपनानी शुरू की. सेना ने उन इलाकों की तलाशी ली, जहां गुरिल्ला लड़ाकों के छिपे होने की आशंका थी. उनके ठिकानों और संसाधनों को नष्ट किया जाने लगा.

इसके साथ ही बोअर सैनिकों के परिवारों को उनके घरों से हटाकर शिविरों में रखा गया. इन शिविरों को कॉन्सन्ट्रेशन कैंप कहा जाता था. वहां रहने वाले लोगों को भोजन, साफ-सफाई और स्वास्थ्य सुविधाओं की कमी जैसी गंभीर परेशानियों का सामना करना पड़ा. इन परिस्थितियों में बड़ी संख्या में लोगों की मौत हुई. इस तरह युद्ध का असर सिर्फ सैनिकों तक सीमित नहीं रहा, बल्कि आम परिवार भी इसकी चपेट में आ गए.

लंबे संघर्ष के बाद ब्रिटिश सेना बोअर प्रतिरोध को दबाने में सफल रही. 31 मई 1902 को पीस ऑफ वेरेनिगिंग नाम के समझौते पर हस्ताक्षर किए गए. इसके साथ ही युद्ध समाप्त हो गया. समझौते के तहत ट्रांसवाल और ऑरेंज फ्री स्टेट पर ब्रिटिश सैन्य प्रशासन को मान्यता मिली. साथ ही बोअर लड़ाकों के लिए आम माफी का प्रावधान भी किया गया.

हालांकि, युद्ध खत्म होने के बाद भी दक्षिण अफ्रीका में राजनीतिक बदलाव जारी रहे. साल 1910 में ब्रिटिश साम्राज्य के अधीन स्वशासित यूनियन ऑफ साउथ अफ्रीका बनाया गया. इसमें ट्रांसवाल, ऑरेंज फ्री स्टेट, केप ऑफ गुड होप और नेटाल को प्रांतों के रूप में शामिल किया गया.

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11 अक्टूबर 1899 को शुरू हुआ बोअर युद्ध इस बात की मिसाल बना कि किस तरह राजनीतिक नियंत्रण, आजादी की मांग और सोने-हीरे जैसे प्राकृतिक संसाधनों पर अधिकार की लड़ाई एक बड़े संघर्ष में बदल सकती है. इस युद्ध ने दक्षिण अफ्रीका के भविष्य और वहां की राजनीति को लंबे समय तक प्रभावित किया.

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