'वन किडनी विलेज' या 'एक- गुर्दा गांव'... यह सुनकर थोड़ा अजीब लग सकता है. लेकिन, हकीकत यही है. एक ऐसा गांव जहां अधिकतर लोगों के एक ही किडनी है. ऐसा नहीं है कि इस गांव में लोग किसी रहस्यमय बीमारी या डिसऑर्डर से ग्रसित हैं. यहां भी पूरी तरह से स्वस्थ्य बच्चे जन्म लेते हैं और लोगों में दो किनडियां होती हैं. फिर कुछ ऐसे हालात बनते हैं कि यहां 10 में से 8 व्यस्क को अपनी किडनी निकलवानी पड़ती है. चलिए जानते हैं ये 'वन किडनी विलेज' आखिर है कहां?
वन किडनी विलेज अफगानिस्तान का एक छोटा सा कस्बा है. यहां के अधिकतर पुरुष और महिलाएं अपनी एक किडनी निकलवा चुके हैं. ऐसे किसी बीमारी या डिसऑर्डर की वजह से नहीं किया है. यहां के लोग अपनी किडनी बेच देते हैं. सिर्फ अपने बच्चों के पेट पालने के लिए इन्हें मजबूरी में अपनी किडनी बेचनी पड़ती है.
कहां हैं वन किडनी विलेज?
अल जजीरा की रिपोर्ट के मुताबिक, पश्चिमी अफगानिस्तान के हेरात के बाहरी इलाके में सायशानबा बाजार नाम का एक गांव है. एक ऐसा गांव है जहां ऐसे लोग भरे पड़े हैं, जो वर्षों तक रोजी- रोटी के लिए संघर्ष करने के बाद यहां विस्थापित होकर रह रहे हैं. यह गांव 'एक-गुर्दा गांव' के नाम से जाना जाता है. यहां हर घर से एक शख्स अपनी किडनी बेच चुका है. क्योंकि गरीब परिवारों के बीच इससे होने वाली कमाई के बारे में बात फैल गई थी.
एक ही परिवार के पांच भाइयों ने पिछले चार वर्षों में गरीबी से बचने की उम्मीद में अपनी एक-एक किडनी बेच दी. उत्तरी शहर मजार-ए-शरीफ के एक अस्पताल के पूर्व सर्जन बताया कि अंगों के दान या बिक्री को कंट्रोल करने के लिए कोई कानून नहीं है, लेकिन डोरन की सहमति जरूरी है.
डोनर के परमिशन की होती है वीडियो रिकॉर्डिंग
हेरात में होने वाले अधिकांश ट्रांसप्लांट जिन दो अस्पतालों में किए जाते हैं. उनमें से एक में सर्जन ने भी इसकी पुष्टि की. उन्होंने कहा कि बस डोनर की सहमति ही सबसे जरूरी होती है. उन्होंने कहा कि हम उनसे लिखित परमिशन लेते हैं और एक वीडियो रिकॉर्डिंग लेते हैं . पिछले पांच वर्षों में हेरात में सैकड़ों सर्जरी की गई हैं. हमने कभी इस बात की जांच नहीं की है कि मरीज या डोनर कहां से आता है या कैसे आता है. यह हमारा काम नहीं है.
दिसंबर 2021 तक संयुक्त राष्ट्र स्वास्थ्य आयोग (UNHCR) का अनुमान था कि अफगानिस्तान की 55% आबादी यानी लगभग 23 मिलियन लोग अत्यधिक भुखमरी का सामना कर रही है. संगठन ने यह भी अनुमान लगाया था कि इन 23 मिलियन लोगों में से 9 मिलियन लोगों को अकाल का सामना करने का खतरा है.
द गार्जियन की रिपोर्ट के मुताबिक, तालिबान के सत्ता संभालने से बहुत पहले ही अफगानिस्तान में गुर्दे यानी किडनी का व्यापार एक समस्या थी. लेकिन सत्ता पर कब्जा करने के बाद से यह ट्रेंड न केवल 'एक गुर्दा गांव' में, बल्कि अफगानिस्तान के सारे इलाकों में बढ़ गया. यानी अब अफगानिस्तान में सिर्फ एक वन किडनी विलेज नहीं है. स्वेच्छा से अपना अंग बेचने की इच्छा जताने वालों की संख्या में भारी इजाफा हुआ है.
सस्ती हो गई है किडनी की कीमत
यही वजह है कि एक समय जो जिस किडनी के बदले 2023 तक 3,000 से 4,000 डॉलर मिल जाते थे. अब 1,500 डॉलर में भी लोग अपने किडनी को बेचने लगे हैं. अफगानिस्तान के हेरात प्रांत के एक सार्वजनिक स्वास्थ्य अधिकारी के अनुसार, पिछले पांच वर्षों में हेरात प्रांत के अस्पतालों में लगभग 250 आधिकारिक किडनी ट्रांसप्लांट हुआ है. इनमें से बहुत कम मामलों में परिवार के सदस्यों ने अपना अंग दान किए हैं. किडनी ट्रांसप्लांट का खर्च 400,000 अफगानी है. साथ ही गुर्दे की कीमत भी अलग से लगती है.
लेकिन किडनी ट्रांसप्लांट की वास्तविक संख्या इससे कहीं अधिक हो सकती है. एक डॉक्टर, जो उन अस्पतालों में काम करते हैं, जहां अधिकतर अनऑफिशियल ट्रांसप्लांट होते हैं. उसने नाम न छापने की शर्त पर बताया कि हेरात में किडनी बेचने वालों की संख्या बढ़ गई है और उनमें से अधिकतर विस्थापित शिविरों में रहते हैं. या फिर हेरात की झुग्गी-झोपड़ियों में रहते हैं. ग्राहक भी सस्ती किडनी की तलाश में विस्थापित शिविरों में जाते रहते हैं.