हमारे आसपास कुछ लोग ऐसे होते हैं, जो अपनी जिंदगी में होने वाली लगभग हर चीज को किस्मत से जोड़कर देखते हैं. नौकरी मिल गई तो कहते हैं- किस्मत अच्छी थी. पैसा मिला तो कहते हैं- भाग्य साथ दे रहा है. वहीं अगर कोई काम खराब हो जाए तो तुरंत कहते हैं-मेरी किस्मत ही खराब है. ऐसे लोगों के लिए किस्मत जिंदगी का बहुत बड़ा हिस्सा बन जाती है. साइकोलॉजी के अनुसार, किसी व्यक्ति का किस्मत पर भरोसा सिर्फ उसकी अपनी सोच से नहीं बनता. इसके पीछे उसका बचपन, परिवार, आसपास का माहौल और जिंदगी के अनुभव भी बड़ी भूमिका निभा सकते हैं.
कई बार बच्चे अपने घर में बार-बार ऐसी बातें सुनते हुए बड़े होते हैं, जैसे सब किस्मत का खेल है, जिसकी किस्मत में होगा, उसे मिल जाएगा या मेहनत से ज्यादा भाग्य जरूरी है. जब बच्चा इन बातों को लगातार सुनता है, तो धीरे-धीरे उसके दिमाग में यह बात बैठ सकती है कि जिंदगी में सबसे बड़ी चीज किस्मत ही है. बाद में यही सोच उसकी आदत का हिस्सा बन सकती है. वह हर काम शुरू करने से पहले यह सोचने लगता है कि पता नहीं किस्मत साथ देगी या नहीं.
हर काम का जिम्मेदार किस्मत को मानना
किस्मत पर भरोसा करना अपने आप में गलत नहीं है. समस्या तब शुरू होती है, जब इंसान अपनी मेहनत और फैसलों की जिम्मेदारी भी किस्मत पर डालने लगता है. ऐसा व्यक्ति परीक्षा में अच्छे नंबर आए तो कह सकता है- मेरी किस्मत अच्छी थी. लेकिन नंबर कम आए तो वह यह देखने की कोशिश नहीं करता कि पढ़ाई में कहां कमी रह गई. वह सिर्फ कह देता है- मेरी किस्मत खराब थी. धीरे-धीरे ऐसी सोच इंसान को अपनी गलतियों से सीखने से रोक सकती है.
अगर कोई व्यक्ति लंबे समय तक यह मानता रहे कि उसके जीवन में सब कुछ किस्मत से ही होगा, तो उसका खुद पर भरोसा कम हो सकता है. उसे लगने लगता है कि वह चाहे जितनी कोशिश कर ले, असली फैसला तो किस्मत ही करेगी. यहीं से आत्मविश्वास कमजोर होने की शुरुआत हो सकती है. व्यक्ति अपने फैसले लेने से डर सकता है और बार-बार दूसरों से पूछ सकता है कि “मेरी किस्मत में यह है या नहीं? ऐसी स्थिति में मेहनत करने के बजाय इंतजार करने की आदत बढ़ सकती है.
कुछ लोग असुरक्षित भी महसूस कर सकते हैं
किस्मत पर बहुत ज्यादा निर्भर रहने के पीछे कई बार असुरक्षा की भावना भी हो सकती है. जब व्यक्ति को अपने फैसलों और क्षमताओं पर पूरा भरोसा नहीं होता, तो वह बाहरी चीजों को जिम्मेदार मानकर खुद को समझाने की कोशिश कर सकता है. उदाहरण के लिए, अगर किसी को नौकरी नहीं मिली तो वह अपनी तैयारी, अनुभव या इंटरव्यू की गलतियों को देखने के बजाय कह सकता है- शायद यह नौकरी मेरी किस्मत में ही नहीं थी. इससे उस समय उसे थोड़ी राहत जरूर मिल सकती है, लेकिन समस्या का असली कारण समझने में देरी हो सकती है.
किस्मत पर विश्वास केवल व्यक्ति के दिमाग से नहीं आता. परिवार और आसपास का माहौल भी इसका बड़ा कारण हो सकता है. अगर किसी घर में हर छोटी-बड़ी घटना को भाग्य से जोड़कर देखा जाता है, तो बच्चे भी वैसा ही सोच सकते हैं. इसी तरह समाज और आसपास के लोगों की बातें भी हमारी सोच को प्रभावित करती हैं. इसलिए किसी व्यक्ति को सिर्फ यह कहकर गलत नहीं ठहराया जा सकता कि वह किस्मत पर भरोसा करता है. यह समझना भी जरूरी है कि उसकी यह सोच बनी कैसे. यह बात भी समझना जरूरी है कि किस्मत पर विश्वास करने वाले हर व्यक्ति का आत्मविश्वास कम हो, ऐसा जरूरी नहीं है. बहुत से लोग भाग्य में विश्वास करते हुए भी मेहनत करते हैं और अपने फैसलों की जिम्मेदारी लेते हैं. फर्क सिर्फ इतना है कि वे किस्मत को एक संभावना मानते हैं, अपनी मेहनत का विकल्प नहीं.