लद्दाख की ऊंची पहाड़ियों पर देश की सुरक्षा करना आसान नहीं है. यहां कड़ाके की ठंड पड़ती है, चारों तरफ बर्फ दिखाई देती है और ऊंचाई बढ़ने के साथ हवा में ऑक्सीजन भी कम हो जाती है. ऐसे मुश्किल हालात में भारतीय सेना के जवानों के साथ खास तौर पर प्रशिक्षित कुत्ते भी सुरक्षा की जिम्मेदारी निभाते हैं. ये कुत्ते सिर्फ गश्त लगाने में ही मदद नहीं करते, बल्कि संदिग्ध लोगों का पता लगाने, विस्फोटक खोजने और सीमावर्ती इलाकों पर नजर रखने जैसे काम भी करते हैं. लेकिन सवाल यह है कि आखिर इन कुत्तों को 14,000 फीट की ऊंचाई पर काम करने के लिए कैसे तैयार किया जाता है? क्या इन्हें भी इंसानों की तरह खास ट्रेनिंग से गुजरना पड़ता है?
रिपोर्ट के मुताबिक, भारतीय सेना और भारत-तिब्बत सीमा पुलिस (ITBP) लद्दाख जैसे मुश्किल इलाकों में निगरानी और सुरक्षा के लिए खास तौर पर प्रशिक्षित कुत्तों ( Trained dogs) की मदद लेती हैं. इनमें बखरवाल और तिब्बती मास्टिफ जैसी पहाड़ी नस्लों के कुत्ते भी शामिल हैं.
14,000 फीट की ऊंचाई पर क्या होती है परेशानी?
लद्दाख जैसे ऊंचे इलाकों में काम करना कुत्तों के लिए भी बड़ा चैलेंज है. यहां सामान्य जगहों के मुकाबले ऑक्सीजन कम होती है. ऐसे में कुत्ते जल्दी थक सकते हैं और उन्हें सांस लेने में परेशानी हो सकती है. इसके अलावा, बर्फीली जमीन, तेज ठंडी हवाएं और पथरीले रास्ते भी मुश्किलें बढ़ाते हैं. लंबे समय तक बर्फ पर चलने से उनके पंजों में चोट लग सकती है. ज्यादा ठंड में शरीर का तापमान गिरने और पंजों की त्वचा को नुकसान पहुंचने का खतरा भी रहता है.
यही वजह है कि इन कुत्तों को सीधे ऊंचाई वाले इलाकों में ले जाकर कठिन ड्यूटी पर नहीं लगा दिया जाता. पहले उन्हें वहां के मौसम और वातावरण के अनुकूल बनाया जाता है. इस प्रक्रिया को एक्लाइमेटाइजेशन (Acclimatization) कहते हैं. आसान भाषा में समझें तो इसका मतलब है शरीर को नई परिस्थितियों के हिसाब से ढालना.
कैसे शुरू होती है इन कुत्तों की ट्रेनिंग?
इन कुत्तों की ट्रेनिंग धीरे-धीरे आगे बढ़ाई जाती है. शुरुआत में उनसे ज्यादा दौड़ने या कठिन रास्तों पर चलने की उम्मीद नहीं की जाती. पहले उन्हें ऊंचाई, ठंड और कम ऑक्सीजन वाले वातावरण में रहने का समय दिया जाता है. इसके बाद उनकी शारीरिक क्षमता के हिसाब से एक्सरसाइज और काम का समय बढ़ाया जाता है. ट्रेनिंग के दौरान यह भी देखा जाता है कि कुत्ता कितनी जल्दी थक रहा है, उसकी सांस सामान्य है या नहीं और काम करने के बाद वह कितनी देर में सामान्य हो रहा है. जरूरत पड़ने पर उसे ज्यादा आराम दिया जाता है और ट्रेनिंग की कठिनाई कम कर दी जाती है. इस तरह कुत्ते का शरीर धीरे-धीरे ऊंचाई पर काम करने के लिए तैयार होता है. इस प्रक्रिया में कई हफ्ते भी लग सकते हैं.
सिर्फ दौड़ना नहीं, मुश्किल हालात में भी काम करना जरूरी
सेना के कुत्तों को केवल शारीरिक रूप से मजबूत बनाना ही काफी नहीं है. उन्हें अपने हैंडलर यानी उस जवान के निर्देशों को समझना और मुश्किल परिस्थितियों में भी अपने काम पर ध्यान लगाए रखना सिखाया जाता है. इनका काम सिर्फ पहाड़ी रास्तों पर चलना नहीं होता. इन्हें संदिग्ध चीजों की पहचान करने, स्मेल के सहारे किसी चीज का पता लगाने और सुरक्षा से जुड़े अभियानों में मदद करने की ट्रेनिंग भी दी जाती है. ऊंचाई पर इन कामों को करना ज्यादा मुश्किल हो सकता है, क्योंकि कम ऑक्सीजन के कारण कुत्ते जल्दी थक सकते हैं. इसलिए उनकी क्षमता के हिसाब से काम और आराम के बीच संतुलन बनाए रखना जरूरी होता है.
पंजों से लेकर खाने-पीने तक का रखा जाता है ध्यान
लद्दाख में तैनात कुत्तों की देखभाल में उनके पंजों, शरीर और खाने-पीने पर खास ध्यान देना पड़ता है. बर्फ और पत्थरों पर लगातार चलने से उनके पंजों में दरारें या चोट लग सकती हैं. इसलिए समय-समय पर उनके पंजों की जांच की जाती है और जरूरत के मुताबिक सुरक्षा के साधनों का इस्तेमाल किया जा सकता है. ठंडे मौसम में शरीर को गर्म रखने और लंबे समय तक काम करने के लिए सही मात्रा में भोजन मिलना भी जरूरी है. इसके साथ पर्याप्त पानी देना भी महत्वपूर्ण है. ऊंचाई पर सूखी हवा और लगातार मेहनत करने से शरीर में पानी की कमी हो सकती है. अगर कोई कुत्ता असामान्य रूप से हांफने लगे, बहुत जल्दी थक जाए या काम के बाद सामान्य होने में ज्यादा समय ले, तो उसकी सेहत की जांच करना और काम का बोझ कम करना जरूरी होता है.
बखरवाल और तिब्बती मास्टिफ जैसी नस्लें क्यों हैं खास?
बखरवाल और तिब्बती मास्टिफ हिमालयी क्षेत्रों से जुड़ी नस्लें हैं. इनका इस्तेमाल ऊंचाई वाले इलाकों में सुरक्षा और निगरानी के कामों के लिए किया जा सकता है. इनकी बनावट और घने बाल ठंडे वातावरण में मददगार हो सकते हैं. हालांकि, किसी पहाड़ी नस्ल का होना अपने आप में यह गारंटी नहीं है कि कुत्ता हर ऊंचाई और मौसम में आसानी से काम कर लेगा. इसके लिए सही ट्रेनिंग, धीरे-धीरे वातावरण के अनुकूल बनाना, पौष्टिक भोजन और नियमित देखभाल जरूरी है.
लद्दाख जैसे दुर्गम इलाकों में सेना के इन कुत्तों की भूमिका दिखाती है कि सीमा की सुरक्षा में सिर्फ जवान ही नहीं, बल्कि ट्रेंड जानलर भी अहम योगदान देते हैं. मुश्किल रास्तों और बेहद ठंडे मौसम में ड्यूटी करने के लिए इन कुत्तों को तैयार करने के पीछे लंबी ट्रेनिंग और लगातार देखभाल की जरूरत होती है.