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20-25 पैसे किलो टमाटर, सड़क पर फेंकने को मजबूर किसान

नोटबंदी ने किसानों का पहले ही बुरा हाल कर रखा था. बेमौसम की बरसात ने रही-सही कसर और पूरी कर दी. किसान औने-पौने दाम पर फसल बेच रहे हैं.

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दाम सस्ते होने से किसान परेशान
दाम सस्ते होने से किसान परेशान

नोटबंदी ने किसानों का पहले ही बुरा हाल कर रखा था. बेमौसम की बरसात ने रही-सही कसर और पूरी कर दी. किसान औने-पौने दाम पर फसल बेच रहे हैं. हालत इतने खराब हैं कि किसानों को अपने उत्पाद सड़कों पर फेंकने के लिए मजबूर होना पड़ रहा है. झारखंड और मध्य प्रदेश में ऐसे ही हालात हैं. यहां टमाटर और मटर उत्पादक किसानों को दो जून की रोटी का जुगाड़ करना मुश्किल हो गया है.

झारखंड
झारखंड की राजधानी रांची को जमशेदपुर से जोड़ने वाले नेशनल हाईवे के साथ लगते पटमदा इलाके में अजब हाल दिखा. यहां सड़क टमाटरों से अटी पड़ी थी. आते-जाते बाइक सवार टमाटरों पर फिसल रहे थे. यहां कोई स्पेन जैसा नहीं हो रहा था. बल्कि ये किसानों की मजबूरी का नतीजा था. किसानों को टमाटरों को सड़क पर ही फेंकना पड़ रहा है क्योंकि इन्हें मिट्टी के मोल लेने के लिए भी खरीदार नहीं मिल रहे. 20-25 पैसे प्रति किलो टमाटर बेचने के बाद जो टमाटर बच जाते हैं, उन्हें किसान घर ले जाने की जगह सड़क पर फेंक रहे हैं.

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झारखण्ड का बुंडू, तमाड़ और पटमदा इलाका खासतौर पर टमाटरो के उत्पादन के लिए मशहूर है. यहाँ से इन्हें बंगाल, ओडिशा समेत देश के दूसरे राज्यों में भेजा जाता है. दूसरे राज्यों से भी इस वक्त ना के बराबर मांग है.

टमाटर जैसा ही हाल दूसरी सब्जियों का भी है. इन्हें भी खराब होने के डर से को बहुत कम दामों पर बेचना पड़ रहा है. फूलगोभी 2 रुपए प्रति किलो के भाव से बिक रही है. नोटबंदी के चलते छोटे नोटों की कमी की वजह से सब्जियों का खुदरा कारोबार पूरी तरह चरमरा गया है. अगर किसी के पास 2000 का बड़ा नोट भी हो तो उसके छुट्टे कराना मुश्किल हो जाता है.

मध्य प्रदेश
मध्य प्रदेश के आगर-मालवा जिले में भी किसानों का बुरा हाल है. टमाटर और संतरे के बाद अब मटर उत्पादक किसानों की भी कमर टूट गई है. मटर का उत्पादन तो बहुत हुआ लेकिन नोटबंदी की वजह से किसानों की सारी उम्मीदों पर पानी फिर गया. हालत ये है कि किसान मटर को खेत में ही रहने दे रहे हैं. उनका कहना है कि मटर को तुड़वाने और फिर उसे मंडी ले जाना उनके बूते में नहीं है. मटर के जो दाम मिल रहे हैं, उससे किसानों का लागत खर्च कहीं ज्यादा है.

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ग्वालियर में किसानों को मटर के दाम एक रुपया किलो भी नहीं मिल पा रहे. पनिहार गांव के किसान मोहन सिंह ने बताया कि 6 बीघा जमीन में मटर के लिए 3 क्विंटल बीज लग गया. मोहन सिंह के मुताबिक वो अब फसल को काटने की जगह इसका बीज के तौर पर ही इस्तेमाल करेंगे क्योंकि मंडी तक ले जाने का खर्च उठाने की स्थिति में वो नहीं हैं. फसल को मंडी तक ले भी जाए तो वहां किसान कैश देने की जगह चेक थमा रहे हैं.

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