scorecardresearch
 

Beat Report: कर्नाटक में कामयाबी, झारखंड में बिखराव... कांग्रेस के चुनावी मैनेजमेंट में फर्क की वजह क्या है?

झारखंड और मध्य प्रदेश में कांग्रेस को राज्यसभा चुनाव में झटके लगे, जबकि कर्नाटक में अतिरिक्त वोटों से जीत मिली. चुनाव नतीजों ने संगठन, गठबंधन और रणनीति पर सवाल खड़े किए हैं.

Advertisement
X
मध्य प्रदेश और झारखंड में चरमराया कांग्रेस का चुनावी मैनेजमेंट! (Photo: ITG)
मध्य प्रदेश और झारखंड में चरमराया कांग्रेस का चुनावी मैनेजमेंट! (Photo: ITG)

एक ऐसे समय में जब बीजेपी को विपक्षी पार्टियों की लगातार आलोचना का सामना करना पड़ रहा है, आरोप है कि वह मॉनसून सत्र से पहले अपनी संसदीय संख्या बढ़ाने के लिए नेताओं को दल-बदल कराने और राजनीतिक जोड़-तोड़ में लगी है.  आने वाले संसद सत्र में परिसीमन बिल जैसे विवादित मुद्दों पर चर्चा होने की उम्मीद है.

कांग्रेस को भी शर्मिंदगी का सामना करना पड़ा है. ज़रूरी संख्या बल होने के बावजूद, पार्टी मध्य प्रदेश और झारखंड में राज्यसभा की दो अहम सीटें नहीं जीत पाई, जिससे संगठन पर पकड़, गठबंधन प्रबंधन और विधायी रणनीति में उसकी कमियां उजागर हुईं.

अजीब बात यह है कि जिस दिन कांग्रेस झारखंड में अपना समर्थन बनाए रखने के लिए संघर्ष कर रही थी, उसी दिन उसने कर्नाटक में शानदार जीत हासिल की, वहां विधान परिषद चुनावों में 135 विधायकों की ताकत होने के बावजूद उसे 16 अतिरिक्त वोट मिले. इन अलग-अलग नतीजों ने एक अहम सवाल खड़ा कर दिया है: आखिर एक ही कांग्रेस, एक ही दिन हुए चुनावों में राजनीतिक प्रबंधन के मामले में इतना अलग-अलग प्रदर्शन क्यों करती है?

झारखंड में क्या गड़बड़ हुई?

कांग्रेस के राज्यसभा उम्मीदवार प्रणव झा की जीत पक्की करने के लिए पार्टी ने दो सीनियर ऑब्ज़र्वर भूपेश बघेल और अजय शर्मा को तैनात किया था. छत्तीसगढ़ के पूर्व मुख्यमंत्री भूपेश बघेल ने कांग्रेस के लिए कई अहम जिम्मेदारियां संभाली हैं, जिनमें 2021 के असम विधानसभा चुनाव, 2026 के चुनावों की तैयारी और 2022 के उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव शामिल हैं. लेकिन इन कोशिशों से पार्टी को शायद ही कभी चुनावी फ़ायदा हुआ हो. सूत्रों का कहना है कि बघेल सिर्फ 6 जून से 8 जून के बीच ही रांची में रहे, मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन से सिर्फ एक बार मिले और चुनाव मैनेजमेंट के अहम चरणों की देखरेख के लिए वापस आए बिना ही चले गए.

Advertisement

हरियाणा में राज्यसभा चुनाव के दौरान कांग्रेस के मैनेजमेंट में अजय शर्मा भी शामिल थे. वहां पार्टी के उम्मीदवार अजय माकन को निर्दलीय उम्मीदवार कार्तिकेय शर्मा से चौंकाने वाली हार का सामना करना पड़ा, जबकि गणित उनके पक्ष में था.

पार्टी से जुड़े सूत्र ने इंडिया टुडे को बताया कि AICC के जनरल सेक्रेटरी (ऑर्गनाइजेशन) के.सी. वेणुगोपाल ने झारखंड राज्यसभा चुनाव में 'ज़्यादा दिलचस्पी नहीं ली', इसकी वजह उन्हें ही पता होगी और एक्टिव देखरेख की कमी के कारण ही आखिरकार हार हुई.

हालांकि, इसका दोष सिर्फ कांग्रेस के मैनेजर्स पर ही नहीं मढ़ा जा सकता. पार्टी के अंदरूनी सूत्रों को शक है कि आरजेडी के चार विधायकों और CPI(ML) के दो विधायकों ने निर्दलीय उम्मीदवार परिमल नथवानी के पक्ष में क्रॉस-वोटिंग की. चुनाव मैनेजमेंट में शामिल कांग्रेस के एक सीनियर नेता ने इशारा किया कि 'नाराज RJD' ने शायद बिहार राज्यसभा चुनाव का बदला लिया हो, जहां कांग्रेस विधायकों की गैर-मौजूदगी की वजह से उनके उम्मीदवार ए.डी. सिंह हार गए थे.

कई नेताओं का मानना ​​है कि अगर कांग्रेस आलाकमान ने ज़्यादा तेजी और राजनीतिक इच्छाशक्ति दिखाई होती, तो आरजेडी की शिकायतों को दूर किया जा सकता था. इस घटना ने गठबंधन को संभालने में कमियों को उजागर किया है.
नेताओं का एक और वर्ग तर्क देता है कि चुनाव से पहले हेमंत सोरेन की नाथवानी के साथ हुई मुलाकात ने गलत राजनीतिक संकेत दिया. कई विधायकों ने कथित तौर पर इस मुलाकात को अनौपचारिक समर्थन के तौर पर देखा, जिससे ऐसी छवि बनी जो आखिरकार कांग्रेस उम्मीदवार के लिए नुकसानदेह साबित हुई.

Advertisement

कर्नाटक में क्या सही रहा?

जब झारखंड में कांग्रेस के रणनीतिकार अपने सपोर्ट बेस को बनाए रखने के लिए संघर्ष कर रहे थे, तब कर्नाटक के मुख्यमंत्री डी.के. शिवकुमार और कर्नाटक कांग्रेस के अध्यक्ष बी.के. हरिप्रसाद अपने सपोर्ट बेस को बढ़ाने में जुटे थे.

कांग्रेस के सभी पांच MLC उम्मीदवार विधान परिषद का चुनाव आसानी से जीत गए. हालांकि, कांग्रेस के पास 135 विधायक थे, लेकिन उसके उम्मीदवारों को कुल 151 वोट मिले. बीजेपी को उम्मीद से कम वोट मिले; उसे 64 के बजाय 57 वोट ही मिले, जबकि JD(S) को उम्मीद के 18 वोटों के मुकाबले सिर्फ 14 वोट मिले. इससे पता चलता है कि कांग्रेस के पक्ष में बड़े पैमाने पर क्रॉस-वोटिंग हुई.

इंडिया टुडे से बात करते हुए बी.के. हरिप्रसाद ने कहा कि पार्टी ने 'किसी भी चीज़ को किस्मत या संयोग पर नहीं छोड़ा.' उनके मुताबिक, कांग्रेस ने मौजूदा सियासी हालात का बारीकी से विश्लेषण किया और उसी के मुताबिक कदम उठाए. 

हरिप्रसाद ने 2014 के बाद बीजेपी शासित राज्यों में कांग्रेस उम्मीदवारों- जैसे अहमद पटेल, विवेक तन्खा और करमबीर सिंह बोध की राज्यसभा जीतों का जिक्र किया. उन्होंने तर्क दिया कि अप्रत्यक्ष चुनाव आखिरकार सटीक राजनीतिक प्रबंधन से तय होते हैं, न कि सिर्फ इस बात से कि राज्य में सरकार किसकी है.

Advertisement

कर्नाटक के एक और नेता ने दावा किया कि कांग्रेस ने बीजेपी और JD(S) के विधायकों के बीच पनप रहे असंतोष और अधूरी उम्मीदों का फ़ायदा उठाया, जिससे उसे कर्नाटक में अतिरिक्त वोट मिल सके.

मध्य प्रदेश में क्या हुआ?

मध्य प्रदेश में राज्यसभा के लिए कांग्रेस लीडर मीनाक्षी नटराजन की कोशिश वोटिंग शुरू होने से पहले ही नाकाम हो गई, क्योंकि रिटर्निंग ऑफिसर ने 9 जून को हलफनामे को अधूरे बताते हुए उनके नॉमिनेशन पेपर खारिज कर दिए.

इस घटनाक्रम ने कांग्रेस नेतृत्व को बहुत शर्मिंदा किया, क्योंकि पार्टी के अंदर नटराजन को व्यापक रूप से राहुल गांधी का करीबी माना जाता है. सूत्रों का कहना है कि अस्वीकृति ने टॉप लीडर्स को 'आहत' किया है. हालांकि, चूक के लिए जिम्मेदारी अभी तक तय नहीं की गई है.

कुछ नेताओं का तर्क है कि नटराजन को अकेले ही जवाबदेह ठहराया जाना चाहिए, खासकर जब से वे सियासी रूप से शत्रुतापूर्ण राज्य से चुनाव लड़ रही थीं और उन्हें ज्यादा सावधानी बरतनी चाहिए थी. एक सीनियर लीडर ने कहा, "हालांकि उन्हें अक्सर 'बौद्धिक और वैचारिक शख्स' के रूप में पहचाना जाता है, लेकिन यह समझना मुश्किल है कि तीन लोकसभा चुनाव लड़ने वाला कोई शख्स तकनीकी आधार पर अपने नामांकन पत्र को कैसे खारिज होने दे सकता है."

Advertisement

हालांकि, अन्य लोगों को आंतरिक तोड़फोड़ का संदेह है, यह देखते हुए कि पार्टी ने उम्मीदवारी पर फैसला लेते वक्त कमल नाथ, दिग्विजय सिंह, अरुण यादव, कमलेश्वर पटेल, जीतू पटवारी और शोभा ओझा सहित मध्य प्रदेश के कई सीनियर नेताओं की अनदेखी की.

झारखंड और मध्य प्रदेश में दोहरे झटके कर्नाटक की सफलता की कहानी के बिल्कुल उलट हैं. इसके साथ ही, वे कांग्रेस के सामने लगातार चुनौती का इशारा करते हैं. वहीं, पार्टी ने बार-बार बीजेपी पर रणनीतिक अवैध शिकार और राजनीतिक लालच के जरिए प्रतिद्वंद्वियों को कमजोर करने का आरोप लगाया है. अगर उसे 2027 और 2029 की चुनावी जंग से पहले एकजुट विपक्ष के आधार के रूप में उभरने की उम्मीद है, तो उसे पहले अपने गठबंधनों, उम्मीदवारों और विधायी अंकगणित को प्रभावी ढंग से मैनेज करनी होगी.
 

 
---- समाप्त ----
Live TV

Advertisement
Latest News in Hindi »
Advertisement