महंगाई का असर अब सिर्फ राशन तक सीमित नहीं है. सब्जियों की बढ़ती कीमतों ने भी आम लोगों की रसोई का बजट बिगाड़ दिया है. अदरक, लहसुन और प्याज के साथ-साथ कई हरी और रोजमर्रा में इस्तेमाल होने वाली सब्जियों के दाम बढ़ गए हैं. त्योहारों का सीजन करीब आने के बीच लोगों को आशंका है कि मांग बढ़ने पर आने वाले दिनों में कीमतों में और इजाफा हो सकता है.
आज तक से बात करते हुए एक सब्जी विक्रेता ने बताया कि रोजमर्रा में इस्तेमाल होने वाली लगभग सभी सब्जियां महंगी हुई हैं. उनके मुताबिक, प्याज, अदरक और लहसुन के दाम में खासा इजाफा हुआ है. टमाटर, जो पहले करीब 20 रुपये किलो बिक रहा था, अब 40 रुपये किलो तक पहुंच गया है. वहीं प्याज की कीमत करीब 30 रुपये किलो से बढ़कर 80 रुपये किलो तक हो गई है.
बढ़ती कीमतों का असर ग्राहकों की खरीदारी पर भी दिखाई दे रहा है. सब्जी विक्रेता के मुताबिक, ग्राहक अब कीमतों को लेकर सवाल करते हैं और अपनी जरूरत तथा बजट के हिसाब से ही सब्जियां खरीद रहे हैं.
किचन बजट पूरी तरह प्रभावित
एक महिला ग्राहक ने बताया कि महंगाई ने उनका किचन बजट पूरी तरह प्रभावित कर दिया है. उनके मुताबिक, राशन और सब्जियों के अलावा दूध और दही जैसी रोजमर्रा की जरूरत की चीजों के दाम भी बढ़े हैं. उन्होंने कहा कि महंगाई का सबसे ज्यादा असर मिडिल क्लास और सर्विस क्लास पर पड़ रहा है. गरीब परिवारों के लिए बढ़ती कीमतों के बीच घर चलाना और भी मुश्किल हो गया है. महिला ने यह सवाल भी उठाया कि जब आम लोग इतना टैक्स देते हैं, तो उसके अनुरूप उन्हें जरूरी सुविधाएं क्यों नहीं मिलतीं.
पश्चिम बंगाल संकट से बढ़ा कीमतों पर दबाव
महंगाई को लेकर ASSOCHAM के मुख्य अर्थशास्त्री डॉ. एसपी शर्मा ने कहा कि पश्चिम बंगाल में संघर्ष शुरू होने से पहले तक महंगाई और कीमतें काफी हद तक नियंत्रण में थीं. लेकिन संकट शुरू होने के बाद इसका असर कीमतों पर पड़ा है. उन्होंने कहा कि WPI महंगाई अब 9.8 फीसदी तक पहुंच गई है, जो चिंता का विषय है, जबकि CPI महंगाई में भी बढ़ोतरी का रुझान देखने को मिल रहा है.
डॉ. शर्मा के मुताबिक, मौजूदा महंगाई मुख्य रूप से मांग से पैदा नहीं हुई है, बल्कि इसके पीछे सप्लाई-साइड के कारक ज्यादा जिम्मेदार हैं. उन्होंने कहा कि जैसे-जैसे सप्लाई से जुड़ा दबाव कम होगा, महंगाई में भी कमी आने की उम्मीद है. उन्होंने कहा कि मजबूत घरेलू मांग और आर्थिक स्थिरता भारतीय अर्थव्यवस्था की ग्रोथ के प्रमुख आधार रहे हैं और इन्हीं वजहों से विकास की रफ्तार को बनाए रखने में मदद मिली है. RBI ने पिछले कई महीनों से ब्याज दरों को स्थिर रखा है, जिससे आर्थिक विकास को समर्थन मिला है. MSME सेक्टर में भी वृद्धि जारी है.
हालांकि, डॉ. शर्मा ने आगाह किया कि अगर ब्याज दरों में बढ़ोतरी की जाती है तो इसका असर बाजार के सेंटीमेंट और कर्ज लेने की परिस्थितियों पर पड़ सकता है. उन्होंने कहा कि फिलहाल West Asia संकट से जुड़े घटनाक्रम पर नजर रखने और स्थिति का इंतजार करने की जरूरत है. उनका जोर आर्थिक विकास की रफ्तार बनाए रखने पर है. उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि रेपो रेट में बदलाव का असर तुरंत दिखाई नहीं देता. मौद्रिक नीति का प्रभाव कुछ समय के अंतराल के बाद अर्थव्यवस्था पर पड़ता है और इसका असर मध्यम से लंबी अवधि में ज्यादा स्पष्ट होता है.
आने वाले दिनों में पड़ सकता है असर
आने वाले दिनों में सब्जियों की कीमतों पर सप्लाई और मांग की स्थिति के साथ-साथ पश्चिम एशिया संकट के घटनाक्रम का असर अहम रहेगा. त्योहारों से पहले अगर मांग बढ़ती है और सप्लाई पर दबाव बना रहता है, तो आम लोगों के रसोई बजट पर महंगाई का बोझ और बढ़ सकता है.