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UGC एक्ट विवाद क्या है? पायल तडवी सुसाइड के बाद बने थे नए नियम, सवर्ण समाज के विरोध के बीच केंद्र ने बदला मन

UGC के इक्विटी नियमों पर विवाद सुप्रीम कोर्ट से निकलकर सियासत के मैदान तक पहुंच चुका है. सामान्य वर्ग के विरोध और दलित-OBC संगठनों की चिंताओं के बीच केंद्र सरकार समीक्षा समिति बनाने पर विचार कर रही है. सवाल है, क्या ऐसा रास्ता निकलेगा जो कैंपस में भेदभाव के खिलाफ सुरक्षा दे और किसी वर्ग को असुरक्षित महसूस न कराए?

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राष्ट्रीय राजपूत करणी सेना अध्यक्ष महिपाल सिंह मकराना समेत कई लोगों ने UGC नियमों का विरोध किया (फोटो- PTI)
राष्ट्रीय राजपूत करणी सेना अध्यक्ष महिपाल सिंह मकराना समेत कई लोगों ने UGC नियमों का विरोध किया (फोटो- PTI)

यूनिवर्सिटी ग्रांट्स कमीशन (UGC) के नए नियमों को लेकर छिड़ा विवाद क्या अब किसी नतीजे पर पहुंचेगा? सामान्य वर्ग के संगठनों के विरोध के बीच केंद्र सरकार ने इन नियमों की दोबारा समीक्षा के लिए एक समिति बनाने पर विचार की बात कही है. क्योंकि मामला अब सिर्फ कॉलेजों और यूनिवर्सिटी में जातिगत भेदभाव रोकने का नहीं रह गया है, बल्कि इसकी गूंज सियासत तक पहुंच चुकी है.

जनवरी 2026 में नोटिफाई होकर प्रभावी हुए UGC के नए नियमों पर सुप्रीम कोर्ट ने महज 16 दिन बाद रोक लगा दी. तब से ये नियम अमल में नहीं हैं और फिलहाल 2012 के नियम लागू हैं. लेकिन इसपर राजनीति और बवाल जमकर हो रहा है.

एक तरफ सामान्य वर्ग के संगठनों ने नियमों के कुछ प्रावधानों पर सवाल उठाए. उनकी दलील थी कि भेदभाव की परिभाषा में एक वर्ग को अलग रखकर बाकी छात्रों के हितों की अनदेखी की गई है. दूसरी तरफ दलित और OBC संगठनों का कहना है कि इन नियमों को रोकने से कैंपस में जातिगत भेदभाव के खिलाफ सुरक्षा की व्यवस्था कमजोर हो सकती है.

इस पूरे विवाद ने बीजेपी के सामने भी राजनीतिक चुनौती खड़ी कर दी. सामान्य वर्ग के एक हिस्से की नाराजगी और दूसरी तरफ दलित-पिछड़े वर्गों की चिंताओं के बीच पार्टी के लिए दोनों पक्षों की भावनाओं को साधना आसान नहीं है. यही वजह है कि UGC के नियमों पर उठे सवाल अब राजनीतिक बहस का हिस्सा भी बन चुके हैं.

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आइए समझते हैं कि रोहित वेमुला और पायल तडवी के मामले से कहानी UGC के नए नियमों तक कैसे पहुंची, इन नियमों में ऐसा क्या था जिस पर विवाद खड़ा हो गया और सुप्रीम कोर्ट और सरकार ने इसपर क्या-क्या कहा

साल 2019- पायल तडवी सुसाइड

मुंबई में भील समुदाय की पायल तडवी ने सुसाइड कर लिया था. एक मेडिकल कॉलेज में कथित तौर पर जातिगत भेदभाव और उत्पीड़न का सामना करने के बाद उन्होंने ये कदम उठाया था.

इसके बाद उनकी मां अबेदा सलीम तडवी ने सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर की. साथ में तेलंगाना में पीएचडी छात्र रोहित वेमुला आत्महत्या की मां भी थीं, जिन्होंने 2016 में कथित जातिगत भेदभाव की वजह से जान दी थी.

'अबेदा सलीम तडवी बनाम भारत सरकार' वाली इस याचिका में उच्च शिक्षण संस्थानों में ऐसे भेदभाव के खिलाफ मजबूत सुरक्षा उपायों की मांग की गई थी.

फरवरी 2025 में ड्राफ्ट, 13 जनवरी 2026 को नए नियम नोटिफाई

फिर UGC ने बातचीत के बाद जनवरी में UGC Equity Regulations 2026 अधिसूचित किए, जिन्होंने 2012 के नियमों की जगह ली. फिर सामान्य वर्ग की तरफ से इसे चुनौती दी गई.

फिर जनवरी में ही सुप्रीम कोर्ट ने नए नियमों पर रोक लगा दी. कोर्ट ने पाया कि ये नियम पहली नजर में अस्पष्ट थे और इनका दुरुपयोग हो सकता था. कोर्ट ने निर्देश दिया कि इस दौरान 2012 के नियम ही लागू रहेंगे.

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क्या था UGC का नया नियम

नए Equity Rule के तहत सभी यूनिवर्सिटी, कॉलेज और उच्च शिक्षण संस्थानों को परिसर में 24x7 हेल्पलाइन, Equal Opportunity Centre, Equity Squads और Equity Committee का गठन करने की बात थी. अगर कोई भी संस्थान इन नियमों का पालन नहीं करता है तो यूजीसी उनकी मान्यता रद्द करने या फंड रोकने जैसी सख्त कार्रवाई कर सकता है.

UGC का कहना था कि पिछड़ी जातियों, अनुसूचित जातियों और जनजातियों के खिलाफ शिकायतों में 2020 से 2025 के बीच 100% से ज्यादा वृद्धि हुई है. इसके अलावा रोहित वेमुला और पायल तडवी जैसे मामलों में सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणियों को ध्यान में रखते हुए यह नियम बनाया गया.

UGC के नए नियमों के खिलाफ क्यों जनरल कैटेगिरी?

1. मुख्य चिंताएं रेगुलेशन 3(1)(c) के तहत 'जाति-आधारित भेदभाव' की परिभाषा को लेकर आई.

रेगुलेशन 3(1)(c) के विरोध की सबसे बड़ी वजह यह थी कि इसमें जातिगत भेदभाव की परिभाषा के तहत सिर्फ SC, ST और OBC वर्गों को शामिल किया गया था. सामान्य वर्ग का नाम इसमें नहीं था. मतलब, जाति या जनजाति के आधार पर SC, ST और OBC के लोगों के साथ होने वाले भेदभाव को 'Caste-based Discrimination' माना गया.

इस पर सामान्य वर्ग की तरफ से सवाल उठा कि अगर किसी सामान्य वर्ग के छात्र के साथ भी उसकी जाति के आधार पर भेदभाव होता है, तो उसे इस परिभाषा के तहत वही सुरक्षा क्यों नहीं मिलेगी?

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सामान्य श्रेणी के याचिकाकर्ताओं का कहना था कि यह ढांचा भेदभावपूर्ण है और इससे गैर-आरक्षित छात्रों के खिलाफ भेदभाव को बढ़ावा मिल सकता है.

2. वहीं 3(1)(e) में 'Discrimination' की एक व्यापक परिभाषा थी. इसमें किसी भी हितधारक के साथ जाति, धर्म, नस्ल, लिंग, जन्मस्थान और दिव्यांगता के आधार पर अनुचित व्यवहार को भेदभाव माना गया.

सवाल उठा कि जब 3(1)(e) में सभी हितधारकों को शामिल किया गया था, तो 3(1)(c) में जातिगत भेदभाव की अलग परिभाषा बनाने की जरूरत क्या थी और इसमें सामान्य वर्ग का नाम क्यों नहीं था? सुप्रीम कोर्ट ने भी इसी सवाल को कानूनी जांच का विषय बनाया था.

3. शुरुआती ड्राफ्ट में झूठी शिकायत करने पर जुर्माना या अनुशासनात्मक कार्रवाई का प्रावधान था. लेकिन जनवरी 2026 में नोटिफाई किए गए अंतिम नियमों से इसे हटा दिया गया था. ये भी विरोध की एक बड़ी वजह बनी.

4. हर कॉलेज और विश्वविद्यालय में Equity Committee और Equity Squad बनाने की बात थी. कहा गया कि इसमें सामान्य वर्ग का प्रतिनिधित्व जरूरी नहीं माना गया है. साथ ही, Equity Squad को बहुत अधिकार दिए गए हैं और 'भेदभाव' की परिभाषा स्पष्ट नहीं की गई.

फिर देश के अलग-अलग हिस्सों में विरोध प्रदर्शन हुए. राष्ट्रीय राजपूत करणी सेना अध्यक्ष महिपाल सिंह मकराना ने जयपुर समेत राजस्थान में UGC RollBack के लिए कई विरोध प्रदर्शन किए.

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दिल्ली के जंतर-मंतर पर भी अगस्त में UGC के नए नियमों के खिलाफ प्रोटेस्ट हुआ था.

सुप्रीम कोर्ट ने UGC के नए नियमों पर क्या कहा

UGC पर सुप्रीम कोर्ट ने मुख्य रूप से पांच सवाल उठाए थे.

- 3(1)(c) की अलग परिभाषा की जरूरत क्या है, जब 3(1)(e) में भेदभाव की व्यापक परिभाषा मौजूद है?
- SC, ST और OBC के भीतर सबसे पिछड़े समुदायों को पर्याप्त सुरक्षा मिलेगी या नहीं?
- हॉस्टल, क्लासरूम और मेंटरशिप ग्रुप में 'Segregation' यानी अलगाव की व्यवस्था का क्या मतलब होगा?
- 2012 के नियमों में रैगिंग का जिक्र था, लेकिन 2026 के नियमों में इसे अलग से क्यों नहीं रखा गया?
- इन प्रावधानों का संवैधानिक समानता के अधिकार पर क्या असर पड़ेगा?

अब गुरुवार को हुई सुनवाई के दौरान केंद्र सरकार ने कोर्ट को बताया कि वह 2026 के नियमों की दोबारा जांच के लिए एक स्पेशल कमेटी बनाने पर विचार कर रही है. चीफ जस्टिस सूर्य कांत की अगुवाई वाली तीन जजों की बेंच को सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने बताया कि सरकार ऐसा रास्ता तलाश रही है, जिससे छात्र समुदाय का कोई भी वर्ग खुद को अलग-थलग, असुरक्षित या डरा हुआ महसूस न करे.

इस पर चीफ जस्टिस ने भी सभी छात्रों के हितों की रक्षा पर जोर दिया. कोर्ट ने याचिकाओं पर सुनवाई चार हफ्ते के लिए टाल दी. हालांकि, फिलहाल समिति के गठन का औपचारिक ऐलान नहीं हुआ है.

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बता दें कि केंद्र सरकार ने पहले, अगस्त 2026 में, अदालत को सूचित किया था कि इन नियमों पर पुनर्विचार किया जा रहा है.

UGC के नए नियमों से बीजेपी को हुआ नुकसान

UGC के नए नियम भले लागू नहीं हुए. लेकिन इसकी नाराजगी चुनाव में साफ दिखने लगी है. हाल ही में हुए MLC चुनाव में BJP को  झटका लगा. इसके पीछे सवर्ण समाज की UGC के नए नियमों को लेकर नाराजगी को भी एक वजह बताया जा रहा है. पार्टी को आशंका है कि इस मुद्दे का असर नौजवानों और नए मतदाताओं पर पड़ सकता है.

यह भी पढ़ें- 5 राज्यों में विधानसभा चुनाव... UGC के नए नियमों पर बवाल के बाद केंद्र सरकार का यू-टर्न?

माना जा रहा है कि इसी वजह से केंद्र सरकार ने UGC नियमों पर यू-टर्न लेकर कमेटी बनाने की बात कही है. इतना ही नहीं उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव 2027 से पहले बीजेपी ने संविधान, UGC, SIR और आरक्षण जैसे मुद्दों पर विपक्ष के आरोपों का तथ्यों के साथ जवाब देने के लिए प्रकोष्ठों को एक महीने का विशेष अभियान चलाने का टास्क दिया गया है.

पार्टी शिक्षकों, डॉक्टरों, वकीलों, व्यापारियों, युवाओं और दूसरे सामाजिक वर्गों के बीच सीधा संवाद स्थापित करेगी. इसके साथ ही घर-घर संपर्क कर मतदाता सूची की जांच और छूटे हुए नाम जुड़वाने पर भी जोर रहेगा. बीजेपी की कोशिश है कि विपक्ष के मुद्दों पर केवल राजनीतिक बयानबाजी न हो, बल्कि समाज के अलग-अलग वर्गों तक अपना पक्ष पहुंचाकर 2027 के चुनाव से पहले नैरेटिव की लड़ाई को मजबूत किया जाए.

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अब BJP के सामने चुनौती यह है कि नियमों में बदलाव से एक वर्ग की नाराजगी दूर करने की कोशिश दूसरे वर्ग की नाराजगी बढ़ा सकती है.

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