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प्रदर्शनकारियों को सुप्रीम कोर्ट से बड़ी राहत... FIR पर दंडात्मक कार्रवाई पर रोक, केंद्र और 7 राज्यों को नोटिस

कॉकरोच जनता पार्टी प्रदर्शनों से जुड़ी जनहित याचिकाओं पर सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई हुई. सुनवाई के दौरान मुख्य न्यायाधीश ने पैलेट गन के इस्तेमाल, इलेक्ट्रिक बैटन, गंभीर रूप से घायल प्रदर्शनकारियों, वकीलों और मीडिया कर्मियों पर हमलों जैसे मुद्दों का उल्लेख किया. प्रदर्शनकारियों को कोर्ट से राहत मिली है. FIR पर दंडात्मक कार्रवाई पर रोक लगा दी गई है और साथ ही केंद्र समेत 7 राज्यों को नोटिस जारी किया गया है.

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CJP प्रदर्शन से जुड़ी याचिकाओं पर सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई हुई (Photo: PTI)
CJP प्रदर्शन से जुड़ी याचिकाओं पर सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई हुई (Photo: PTI)

कॉकरोच जनता पार्टी के बुलावे पर 20 जुलाई को दिल्ली में हुए छात्र आंदोलन में पुलिस कार्रवाई को लेकर सुप्रीम कोर्ट में मंगलवार को अहम सुनवाई हुई. मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत, जस्टिस जॉयमाल्या बागची और जस्टिस वी मोहना की बेंच ने इस मामले में कई बड़े निर्देश दिए. 

कोर्ट ने कहा कि 18 साल से कम उम्र के जिन प्रदर्शनकारियों पर कोई आपराधिक रिकॉर्ड नहीं है, उन्हें रिहा किया जाए. साथ ही कोर्ट ने सभी राज्यों को सीसीटीवी फुटेज, ड्रोन रिकॉर्डिंग, बॉडी कैमरा फुटेज, वायरलेस कम्युनिकेशन रिकॉर्ड और पीसीआर लॉग जैसे डिजिटल सबूत सुरक्षित रखने का आदेश दिया. 

कोर्ट ने यह भी कहा कि प्रदर्शनकारियों से जुड़ा कोई भी डेटा इकट्ठा किया गया है तो उसे सुरक्षित रखा जाए, लेकिन सार्वजनिक न किया जाए.

यह प्रदर्शन नीट पेपर लीक मामले को लेकर हुआ था. प्रदर्शनकारी केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे की मांग कर रहे थे. मार्च संसद की तरफ बढ़ रहा था, जिसे रोकने के लिए पुलिस ने लाठीचार्ज किया और आंसू गैस के गोले छोड़े. इसी दौरान हुई हिंसा और पुलिस ज्यादती को लेकर कई याचिकाएं दाखिल की गई थीं.

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याचिकाकर्ताओं के वकील गोपाल शंकरनारायणन ने कोर्ट को बताया कि यह पूरे देश में हो रहे विरोध प्रदर्शनों से जुड़ा मामला है और सिर्फ दिल्ली की घटना नहीं है. मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत ने कहा कि सभी याचिकाओं में कुछ समान आरोप देखने को मिले हैं. इनमें एक 19 साल के लड़के की आंखों की रोशनी पैलेट गन के इस्तेमाल से जाने का मामला है. 

इसके अलावा इलेक्ट्रिक बैटन के इस्तेमाल की शिकायत भी है. एक युवती को गंभीर चोट लगने के बाद आईसीयू में भर्ती कराया गया. वकीलों पर हमले की भी घटना सामने आई है और एक मीडियाकर्मी पर बेरहमी से हमला किया गया. इसके अलावा सिविल ड्रेस यानी बिना वर्दी के पुलिसकर्मियों द्वारा हिंसा करने के आरोप भी लगाए गए हैं.

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मुख्य न्यायाधीश ने कहा कि यह पूरी तरह से शांतिपूर्ण छात्र प्रदर्शन था, जिसमें कुछ मांगें उठाई गई थीं और यह संविधान के दायरे में था. उन्होंने कहा कि ऐसे शांतिपूर्ण प्रदर्शनों में अक्सर कुछ अनचाहे लोग शामिल हो जाते हैं जो अपने एजेंडे के साथ आते हैं और बाद में खुद ही आयोजक जैसा व्यवहार करने लगते हैं. दूसरी तरफ पुलिसकर्मियों के परिवारों की तरफ से भी याचिकाएं दाखिल की गई हैं, जिनमें कहा गया है कि पुलिसकर्मियों पर भी हमला किया गया.

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वकील गोपाल शंकरनारायणन ने कोर्ट को बताया कि एक वीडियो में एक सहायक उप निरीक्षक खुद एक कार के शीशे तोड़ते हुए दिखाई दे रहा है. उन्होंने कहा कि जिम्मेदारी ऊंचे स्तर तक तय होनी चाहिए, वरना पुलिस को लगेगा कि वे बच निकलेंगे. वरिष्ठ वकील शादान फरासत ने बताया कि उन पुलिसकर्मियों के पास भी नाम की पट्टी नहीं थी जो वर्दी में मौजूद थे.

बिहार से जुड़े मामले में वरिष्ठ वकील शादान फरासत ने कहा कि वहां हिंसा का स्तर दिल्ली से भी ज्यादा रहा है और इसकी अखिल भारतीय स्तर पर जांच होनी चाहिए. उन्होंने बताया कि बिहार सरकार ने एफआईआर वापस लेने का दावा किया है, लेकिन 140 से ज्यादा लोग अब भी हिरासत में हैं, जिनमें ज्यादातर 16 से 18 साल के नाबालिग हैं और एक बच्चा तो सिर्फ 13 साल का है. इन नाबालिगों को 40 घंटे से ज्यादा समय बाद मजिस्ट्रेट के सामने पेश किया गया.

वरिष्ठ वकील प्रशांत भूषण ने बताया कि जुनैद मलिक नाम के एक युवक को, जो खाना बांटने आया था, उठाकर आंखों पर पट्टी बांधकर मसूरी हाईवे पर छोड़ दिया गया. उनके परिवार के सदस्यों से भी पूछताछ की गई. वरिष्ठ वकील श्याम दीवान ने कहा कि जंतर मंतर पर सुबह चार बजे पत्थरों से भरा एक ट्रक लाया गया था, जो दिल्ली पुलिस के कई घेरों को पार करके अंदर आया. वकील वृंदा ग्रोवर ने कहा कि अगर पुलिस को यह नहीं पता कि ट्रक कैसे अंदर आया, तो यह और भी सवाल खड़े करता है.

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दीवान ने वीडियो और सीसीटीवी फुटेज के संरक्षण और चेहरा पहचानने वाली तकनीक से जुड़े डेटा का मुद्दा भी उठाया और कहा कि इस डेटा का इस्तेमाल प्रदर्शनकारियों की प्रोफाइलिंग के लिए नहीं होना चाहिए. 

जस्टिस बागची ने पुलिसकर्मियों के पास सुरक्षा उपकरण न होने पर सवाल उठाते हुए कहा कि सुरक्षा उपकरण आक्रामक उपकरणों से ज्यादा जरूरी हैं. वरिष्ठ वकील एएम सिंघवी ने राज्यवार घटनाओं का पूरा ब्यौरा कोर्ट में पेश किया. मुख्य न्यायाधीश ने कहा कि सबसे संयमित शब्दों में भी कहा जाए तो स्वतंत्र जांच की जरूरत साफ नजर आती है और इसके लिए एक उच्च स्तरीय समिति या एसआईटी बनाई जाएगी.

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