NEET-UG 2026 में कथित गड़बड़ियों और पेपर लीक के आरोपों को लेकर हुए छात्र प्रदर्शनों के दौरान पुलिस की ज्यादतियों के मामले में सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई हुई. चीफ जस्टिस सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली बेंच ने पुलिस की कार्रवाई से जुड़े आरोपों की जांच के लिए पांच सदस्यीय समिति का गठन किया है. यह समिति जरूरत से ज्यादा बल प्रयोग, पैलेट गन से लगी चोटों, महिला प्रदर्शनकारियों के खिलाफ हिंसा, निगरानी और सार्वजनिक संपत्ति को नुकसान पहुंचाने के आरोपों की जांच करेगी.
कोर्ट पुलिस की जवाबदेही और शांतिपूर्ण विरोध-प्रदर्शन के संवैधानिक अधिकार से जुड़े व्यापक सवालों पर भी विचार कर रहा है. यह मामला 20 जुलाई 2026 को दिल्ली में हुए 'चलो संसद' मार्च और देशभर में हुए छात्र प्रदर्शनों से जुड़ा है.
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फेशियल रिकग्निशन तकनीक के इस्तेमाल पर सवाल
सुनवाई के दौरान प्रदर्शनकारियों की पहचान के लिए फेशियल रिकग्निशन तकनीक के इस्तेमाल का मुद्दा भी उठा. वरिष्ठ वकील मेनका गुरुस्वामी ने कहा कि कोर्ट के सामने यह सवाल रखा गया है कि इस तकनीक का इस्तेमाल कैसे हो रहा है, इसका मालिक कौन है, डेटा कहां स्टोर किया जाता है और उस डेटा तक किसकी पहुंच है.
इस पर सॉलिसिटर जनरल (SG) ने कोर्ट को बताया कि इसी तरह की एक याचिका कल भी दाखिल की गई है. सरकार फिलहाल इस मामले में अपना जवाब दाखिल करेगी. कोर्ट ने इस संबंध में विस्तृत हलफनामा दाखिल करने को कहा है. अन्य मुद्दों पर सुनवाई जारी है.
प्रदर्शनकारियों पर दर्ज FIR को लेकर भी फैसला
इससे पहले सुप्रीम कोर्ट ने 20 से 25 जुलाई 2026 के बीच छात्र और युवा प्रदर्शनकारियों के खिलाफ दर्ज एफआईआर को देशभर में बंद करने और रद्द करने का आदेश दिया था. हालांकि, दिल्ली पुलिस को गंभीर आपराधिक रिकॉर्ड वाले 2,873 लोगों के खिलाफ अलग से कार्रवाई करने की छूट दी गई थी.
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दिल्ली पुलिस ने अपने हलफनामे में दावा किया था कि प्रदर्शन में असामाजिक तत्व और हिस्ट्रीशीटर शामिल हो गए थे, जिससे कानून-व्यवस्था बिगड़ी और 240 से ज्यादा पुलिसकर्मी घायल हुए. पुलिस ने यह भी बताया था कि प्रदर्शनकारियों की पहचान के लिए फेशियल रिकग्निशन तकनीक का इस्तेमाल किया गया था. 9 अक्टूबर को सुप्रीम कोर्ट ने एफआईआर रद्द करने के अपने पहले के आदेश की समीक्षा की मांग वाली याचिका भी खारिज कर दी थी.