भारत के पूर्व मुख्य न्यायाधीश डी. वाई. चंद्रचूड़ के बारे में जस्टिस एस. के. कौल की हालिया टिप्पणियों ने न्यायिक स्वतंत्रता और न्यायपालिका तथा कार्यपालिका के बीच संबंधों को लेकर एक महत्वपूर्ण बहस फिर से छेड़ दी है. मुख्य न्यायाधीश की भूमिका के प्रशासनिक पहलू पर बात करते हुए जस्टिस कौल ने कहा, "मुख्य न्यायाधीश की भूमिका के दो पहलू होते हैं. एक न्यायिक और दूसरा प्रशासनिक. मैं न्यायिक पहलू पर बात नहीं करूंगा. मेरा मानना है कि उनमें बौद्धिक क्षमता, योग्यता और कड़ी मेहनत करने की पूरी काबिलियत थी. लेकिन सरकार के साथ तालमेल बिठाने के मामले में मुझे लगा कि वे ज़रूरत से ज़्यादा ही सरकार के प्रति नरम या झुकने वाले थे."
जस्टिस कौल ने यह भी माना कि नियुक्तियों को लेकर न्यायपालिका और सरकार के बीच बातचीत होना कोई नई बात नहीं है, जो सिर्फ चंद्रचूड़ के कार्यकाल तक ही सीमित रही हो. उन्होंने कहा, "दुर्भाग्य से, यह एक चलन बन गया है कि नामों पर चर्चा की जाती है और सरकार के साथ पहले से ही कुछ बातचीत कर ली जाती है. ऐसा पहले भी होता था. मुझे लगता है कि CJI चंद्रचूड़ के कार्यकाल से पहले भी ऐसा होता था और उनके बाद भी हो रहा है. यही बात मुझे परेशान करती है."
इन टिप्पणियों पर गौर करना जरूरी है, लेकिन इन्हें इनके सही संदर्भ में भी समझा जाना चाहिए. प्रशासनिक स्तर पर होने वाली बातचीत को लेकर चिंता जताना, अपने आप में इस बात का सबूत नहीं है कि कार्यपालिका ने न्यायिक फैसलों को प्रभावित किया है. न्यायिक स्वतंत्रता का कोई भी गंभीर मूल्यांकन करते समय, संस्थागत बातचीत (चाहे वह कितनी भी परेशान करने वाली क्यों न लगे) और न्यायिक प्रक्रिया में प्रत्यक्ष हस्तक्षेप के बीच फर्क करना ज़रूरी है.
यह फर्क तब और भी महत्वपूर्ण हो जाता है, जब कांग्रेस पार्टी और उसके नेता न्यायपालिका की स्वतंत्रता की बात करते हैं. कांग्रेस का इतिहास खासकर इंदिरा गांधी का कार्यकाल इस बात की एक गंभीर याद दिलाता है कि क्या होता है जब सरकार न्यायपालिका को राजनीतिक सुविधा के चश्मे से देखने लगती है.
25 अप्रैल 1973 को 'केशवानंद भारती' मामले में सुप्रीम कोर्ट के ऐतिहासिक फैसले (जिसमें संविधान के 'बेसिक स्ट्रक्चर' के सिद्धांत को स्थापित किया गया था) के कुछ ही दिनों बाद इंदिरा गांधी की सरकार ने जस्टिस ए. एन. रे को भारत का मुख्य न्यायाधीश नियुक्त किया. इस नियुक्ति में उनसे वरिष्ठ तीन जजों जस्टिस जे. एम. शेलत, के. एस. हेगड़े और ए. एन. ग्रोवर को नजरअंदाज कर दिया गया. इन तीनों जजों ने कोर्ट से इस्तीफा दे दिया. जस्टिस रे उन जजों में शामिल थे जिन्होंने इस मामले में बहुमत के तर्कों से असहमति जताई थी; इसलिए उनसे वरिष्ठ जजों को छोड़कर उन्हें मुख्य न्यायाधीश बनाने का फैसला काफी महत्वपूर्ण और दूरगामी साबित हुआ.
यह नियुक्ति केवल वरिष्ठता के स्थापित क्रम को तोड़ने तक सीमित नहीं थी. इसके साथ एक स्पष्ट राजनीतिक तर्क भी जुड़ा था कि सुप्रीम कोर्ट का नेतृत्व किस तरह का जज करेगा. 12 मई 1973 को केंद्रीय मंत्री मोहन कुमारमंगलम ने संसद में सरकार के रुख का बचाव करते हुए कहा, "एक सरकार के तौर पर हमारा यह कर्तव्य है कि हम किसी जज की विचारधारा और दृष्टिकोण को देखें ताकि यह तय किया जा सके कि उसे इस समय सुप्रीम कोर्ट का नेतृत्व करना चाहिए या नहीं."
इस बयान के महत्व को नजरअंदाज करना मुश्किल है. इसने देश की सर्वोच्च अदालत का नेतृत्व कौन करेगा, इस फैसले के केंद्र में जज की विचारधारा और दृष्टिकोण को ला खड़ा किया. जैसा कि सरकार ने उनका आकलन किया था. यही वह राजनीतिक और संस्थागत संदर्भ था जिसमें "कमिटेड जुडिशियरी" (सरकार के प्रति प्रतिबद्ध न्यायपालिका) का विचार प्रमुख हुआ. एक ऐसी न्यायपालिका, जिसके काम करने का तरीका सरकार के राजनीतिक और सामाजिक उद्देश्यों के प्रति उसकी समझ के अनुरूप होने की अपेक्षा की जाती थी.
इस दृष्टिकोण के खतरे आपातकाल के दौरान और भी स्पष्ट हो गए. 12 जून 1975 को इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने चुनावी गड़बड़ियों के आधार पर इंदिरा गांधी के चुनाव को रद्द कर दिया. 25 जून को आपातकाल की घोषणा कर दी गई. नागरिक स्वतंत्रताएं सीमित कर दी गईं, राजनीतिक विरोधियों को हिरासत में ले लिया गया और संवैधानिक संस्थाओं की स्वतंत्रता भारी दबाव में आ गई.
आपातकाल के दौरान हुई ज्यादतियों की जांच के लिए गठित 'शाह आयोग' इंदिरा गांधी की आलोचना का मुख्य केंद्र बन गया. 21 नवंबर 1977 को आयोग को लिखे एक पत्र में उन्होंने आयोग के कार्यक्षेत्र (terms of reference) को "एकतरफा और राजनीतिक रूप से प्रेरित" बताया. उन्होंने यह भी तर्क दिया कि "इनके क्रियान्वयन में कुछ ज्यादतियों से हमेशा बचा नहीं जा सकता और न ही वे हमेशा उस समय ध्यान में आती हैं." साथ ही उन्होंने जोर देकर कहा कि जांच में उन परिस्थितियों की भी पड़ताल होनी चाहिए जिनके कारण आपातकाल लागू हुआ.
संसद में भी आयोग के प्रति उनका विरोध जारी रहा. अगस्त 1978 में उन्होंने इसे "राजनीतिक प्रतिशोध का एक जीता-जागता स्मारक" करार दिया और आरोप लगाया कि यह राजनीतिक खात्मे के लिए कानूनी प्रक्रिया के दुरुपयोग को दर्शाता है. उन्होंने आयोग की रिपोर्ट को कड़े शब्दों में खारिज करते हुए कहा: "शाह आयोग की रिपोर्ट को एक जगह मिलनी चाहिए. वह जगह है -कूड़ेदान. इसे वहीं फेंक दिया जाएगा." ये उनके राजनीतिक दावे थे; इनसे आयोग के निष्कर्षों की सच्चाई या अहमियत तय नहीं होती. लेकिन ये उस तीखे विरोध को जरूर दर्शाते हैं, जिसके साथ पूर्व प्रधानमंत्री ने अपनी सरकार के कामकाज की जांच का सामना किया. वह भी स्वतंत्र भारत के संवैधानिक इतिहास के सबसे काले दौर में से एक के दौरान.
आपातकाल के दौरान न्यायपालिका का अपना रिकॉर्ड भी इस बात की एक सशक्त मिसाल है कि कार्यपालिका का दबाव और संस्थाओं के कायर हो जाने के क्या परिणाम हो सकते हैं. 1976 के 'एडीएम जबलपुर बनाम शिवकांत शुक्ला' मामले में सुप्रीम कोर्ट ने बहुमत ने यह माना कि आपातकाल के दौरान और संबंधित कानूनी उपायों के निलंबन की स्थिति में, हिरासत में लिए गए लोग अपनी नजरबंदी को चुनौती देने के लिए न्यायिक राहत नहीं मांग सकते. मुख्य न्यायाधीश ए. एन. रे और न्यायाधीश एम. एच. बेग, वाई. वी. चंद्रचूड़ तथा पी. एन. भगवती इस बहुमत का हिस्सा थे. न्यायमूर्ति एच. आर. खन्ना ने असहमति जताई और तर्क दिया कि कानून का शासन तथा जीवन और स्वतंत्रता की सुरक्षा को सरकार की मर्जी तक सीमित नहीं किया जा सकता.
जस्टिस खन्ना की असहमति को बाद में संवैधानिक स्वतंत्रता की रक्षा में एक निर्णायक मोड़ के रूप में पहचाना गया. वे अपने इस रुख के व्यक्तिगत परिणामों को समझते थे. बताया जाता है कि अपना फैसला तैयार करने के बाद उन्होंने अपनी बहन से कहा था, "मैंने अपना फैसला तैयार कर लिया है, जिसकी कीमत मुझे भारत के मुख्य न्यायाधीश का पद खोकर चुकानी पड़ेगी."
अपनी विदाई के समय न्यायमूर्ति खन्ना ने संस्थागत समर्पण के खतरों के प्रति आगाह किया, "कानून के शासन के पतन का इससे बड़ा कोई संकेत नहीं हो सकता कि वकील पूरी तरह दब्बू हों, न्यायपालिका सरकार के आगे नतमस्तक हो और समाज की अंतरात्मा कुंठित या संवेदनहीन हो गई हो." उन्होंने यह भी कहा, "आजादी की लड़ाई के दिनों से ही निर्भयता वकीलों की परंपरा रही है. जहां डर होता है, वहां न्याय नहीं हो सकता."
जल्द ही घटी घटनाओं ने उनकी चेतावनी की गंभीरता को साबित कर दिया. 28 जनवरी 1977 को भारत के मुख्य न्यायाधीश के पद के लिए न्यायमूर्ति खन्ना को दरकिनार कर उनसे जूनियर जस्टिस एम. एच. बेग को नियुक्त कर दिया गया. न्यायमूर्ति खन्ना ने इस्तीफा दे दिया. 'एडीएम जबलपुर' मामले में उनकी असहमति के बाद हुई यह घटना, इस बात का एक बड़ा उदाहरण बन गई कि यदि कोई न्यायाधीश सरकार की अपेक्षाओं के अनुरूप अपना न्यायिक रुख रखने से इनकार कर दे तो उसे कितनी भारी कीमत चुकानी पड़ सकती है.
जस्टिस मिर्ज़ा हमीदुल्लाह बेग का बाद का सार्वजनिक जीवन भी न्यायिक नियुक्तियों और सार्वजनिक पदों से जुड़े व्यापक ऐतिहासिक रिकॉर्ड का हिस्सा बन गया. भारत के मुख्य न्यायाधीश के रूप में काम करने के बाद उन्होंने अल्पसंख्यक आयोग के अध्यक्ष के रूप में कार्य किया. भारत के आधिकारिक राजपत्र (गजट) के अनुसार, उन्हें 1988 में कानून और न्यायशास्त्र के क्षेत्र में 'पद्म विभूषण' से सम्मानित किया गया. ये सार्वजनिक रिकॉर्ड के मामले हैं. इनके महत्व को उस दौर के व्यापक इतिहास के संदर्भ में देखा जाना चाहिए.
न्यायमूर्ति बहारुल इस्लाम का करियर न्यायिक और राजनीतिक जीवन के मेल का एक और उदाहरण पेश करता है. वे 1962 और फिर 1968 में राज्यसभा के लिए चुने गए थे. 1972 में उन्होंने संसद से इस्तीफा दे दिया और उसी साल उन्हें गुवाहाटी उच्च न्यायालय का न्यायाधीश नियुक्त किया गया. 1980 में वे वहां से सेवानिवृत्त हुए और उसी साल दिसंबर में उन्हें सर्वोच्च न्यायालय में नियुक्त किया गया. जनवरी 1983 में उन्होंने सर्वोच्च न्यायालय से इस्तीफा दे दिया और बाद में कांग्रेस उम्मीदवार के रूप में बारपेटा से लोकसभा चुनाव लड़ा. इन सार्वजनिक नियुक्तियों और राजनीतिक गतिविधियों का क्रम ऐतिहासिक रिकॉर्ड का हिस्सा है. इसने लंबे समय से न्यायिक पदों और पक्षपातपूर्ण राजनीति के बीच के संबंधों की ओर ध्यान आकर्षित किया है.
इसका मतलब यह नहीं है कि मौजूदा चीफ जस्टिस की हर आलोचना गलत है, या यह कि पिछली सरकारों का आचरण आज के सवालों का जवाब देता है. जस्टिस कौल की टिप्पणियों का उनके अपने गुणों के आधार पर परीक्षण किया जाना चाहिए. मुख्य बात यह है कि राजनीतिक दल अपनी सुविधानुसार न्यायिक स्वतंत्रता का इस्तेमाल नहीं कर सकते. यानी जब वे विपक्ष में हों तो इसे 'पवित्र' मानें, और जब सत्ता में हों तो इसकी संस्थागत नींव को ही नजरअंदाज कर दें.
इंदिरा गांधी के दौर में कांग्रेस का रिकॉर्ड विशेष रूप से प्रासंगिक है, क्योंकि उस समय चिंता केवल प्रशासनिक परामर्श के दिखावे तक सीमित नहीं थी. इसमें वरिष्ठ न्यायाधीशों की अनदेखी करना, यह स्पष्ट तर्क देना कि चीफ जस्टिस के चयन में संबंधित न्यायाधीश की विचारधारा का प्रभाव होना चाहिए, और आपातकाल का वह व्यापक माहौल शामिल था, जिसके दौरान संवैधानिक स्वतंत्रता को सीमित कर दिया गया था और सर्वोच्च न्यायालय ने व्यक्तिगत स्वतंत्रता पर एक बेहद चिंताजनक फैसला सुनाया था.
लोकतांत्रिक माहौल के लिए संविधान के प्रति समर्पित न्यायपालिका का होना अनिवार्य है. वहीं ऐसी न्यायपालिका जिससे यह अपेक्षा की जाए कि वह सत्ताधारी सरकार के प्रति समर्पित रहे, एक बिल्कुल अलग बात है. पहली स्थिति नागरिकों की रक्षा करती है और सत्ता पर अंकुश लगाती है; जबकि दूसरी स्थिति में सत्ता को तो वैधता मिल सकती है, लेकिन इससे नागरिकों की स्वतंत्रता खतरे में पड़ जाती है. भारत का संवैधानिक इतिहास इस अंतर को स्पष्ट करता है. राजनीतिक दलों को यह बात हमेशा याद रखनी चाहिए खासकर तब जब वे 'न्यायिक स्वतंत्रता' के नाम पर कुछ भी दावा करते हैं.
(अमित मालवीय महाराष्ट्र BJP के सहप्रभारी और बीजेपी राष्ट्रीय कार्यकारिणी के सदस्य हैं. इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं.)