देश के सरकारी अस्पतालों में मरीजों की जान बचाने के लिए भेजे गए वेंटिलेटर कहीं धूल फांक रहे हैं, तो कहीं उन्हें चलाने के लिए प्रशिक्षित कर्मचारी ही नहीं हैं. आजतक की पड़ताल में राजस्थान, हिमाचल प्रदेश, मध्य प्रदेश, उत्तर प्रदेश, पश्चिम बंगाल और पंजाब के सरकारी अस्पतालों की चौंकाने वाली तस्वीरें सामने आई हैं. कोरोना काल में मरीजों की जिंदगी बचाने के लिए उपलब्ध कराए गए कई वेंटिलेटर वर्षों बाद भी इस्तेमाल नहीं हो सके हैं.
राजस्थान में चादर और पॉलिथीन से ढके मिले वेंटिलेटर
राजस्थान के पाली जिले के बांगड़ अस्पताल में वेंटिलेटर चादर और पीली पॉलिथीन से ढके मिले. ये मशीनें कोरोना काल में अस्पताल पहुंचाई गई थीं. अस्पताल के अधीक्षक डॉ. कैलाश परिहार का कहना है कि गंभीर मरीज कम आने के कारण वेंटिलेटर की जरूरत नहीं पड़ती. हालांकि, अस्पताल प्रशासन का दावा है कि सभी वेंटिलेटर चालू हालत में हैं और उनकी साफ-सफाई होती है.
सवाल उठता है कि अगर अस्पताल को इनकी जरूरत नहीं है, तो इन्हें दूसरे अस्पतालों में क्यों नहीं भेजा गया? राजस्थान सरकार के कैबिनेट मंत्री जोराराम कुमावत ने मामले की जांच कराने की बात कही है.
शिमला में 20 में से सिर्फ 8 वेंटिलेटर इस्तेमाल हो रहे
हिमाचल प्रदेश के शिमला स्थित दीनदयाल उपाध्याय क्षेत्रीय अस्पताल को पीएम केयर्स फंड से 20 वेंटिलेटर मिले थे, लेकिन इनमें से केवल आठ इस्तेमाल हो रहे हैं. करीब एक दर्जन वेंटिलेटर स्टोर रूम में रखे हैं.
अस्पताल प्रशासन के मुताबिक, कई मशीनों में तकनीकी खराबी है. कुछ में स्क्रीन और सॉफ्टवेयर संबंधी समस्याएं हैं. चिकित्सा अधीक्षक डॉ. लोकेंद्र शर्मा ने भी मशीनों की स्थिति पर जानकारी दी. वहीं, स्वास्थ्य मंत्री धनीराम शांडिल ने तत्कालीन बीजेपी सरकार पर रखरखाव में लापरवाही का आरोप लगाया. उन्होंने केंद्र से जरूरत से ज्यादा वेंटिलेटर भेजे जाने की बात भी कही.
मध्य प्रदेश में मशीनें मौजूद, लेकिन प्रशिक्षित स्टाफ की कमी
मध्य प्रदेश के शहडोल जिला अस्पताल में पीएम केयर्स फंड से मिले वेंटिलेटर एक कमरे में बंद मिले. अस्पताल प्रबंधन का दावा है कि मशीनें काम कर रही हैं, लेकिन प्रशिक्षित मेडिकल स्टाफ की कमी के कारण उनका इस्तेमाल नहीं हो पा रहा.
सतना के 500 बेड वाले सरदार वल्लभभाई पटेल जिला अस्पताल में भी ऐसी ही स्थिति सामने आई. यहां ट्रॉमा यूनिट में वेंटिलेटर सपोर्ट वाले कार्डियक बेड रखे हैं, लेकिन पर्याप्त नर्सिंग स्टाफ नहीं है. सिविल सर्जन डॉ. अमर सिंह के मुताबिक, अस्पताल को मिले सात वेंटिलेटरों में छह चालू हैं, जबकि एक मरम्मत के लिए भोपाल भेजा गया है.
यूपी के महाराजगंज में वर्षों से इस्तेमाल नहीं हुए वेंटिलेटर
उत्तर प्रदेश के महाराजगंज महिला अस्पताल की पांचवीं मंजिल पर वेंटिलेटर और अन्य चिकित्सा उपकरण खराब होते मिले. कोरोना काल में भेजी गई मशीनें अब तक मरीजों के इस्तेमाल में नहीं आ सकी हैं. मुख्य चिकित्सा अधिकारी डॉ. सुरेंद्र कुमार चौधरी ने बताया कि क्रिटिकल केयर यूनिट तैयार है, लेकिन मेडिकल गैस पाइपलाइन का काम बाकी है. प्रशिक्षित कर्मचारियों की भी कमी है. उन्होंने जल्द व्यवस्था शुरू करने का दावा किया.
बंगाल और पंजाब में भी सामने आई बदहाली
पश्चिम बंगाल के कूचबिहार स्थित दिनहाटा अस्पताल में भी वेंटिलेटर खराब मिले. अस्पताल प्रशासन ने मशीनों में खराबी स्वीकार करते हुए जल्द मरम्मत कराने का आश्वासन दिया. पंजाब के फिरोजपुर सिविल अस्पताल में कोरोना काल के दौरान चार वेंटिलेटर भेजे गए थे, लेकिन लंबे समय तक उनका इस्तेमाल नहीं हुआ. अस्पताल प्रशासन ने इसकी वजह स्टाफ और बुनियादी सुविधाओं की कमी बताई.
हालांकि, वरिष्ठ चिकित्सा अधिकारी डॉ. निखिल गुप्ता के मुताबिक, पिछले सप्ताह से आईसीयू की व्यवस्था शुरू की गई है और चार वेंटिलेटर लगाए गए हैं.
मशीनें खरीद लीं, लेकिन मरीजों को कब मिलेगा फायदा?
पड़ताल ने सरकारी स्वास्थ्य व्यवस्था की तैयारियों पर गंभीर सवाल खड़े किए हैं. कहीं मशीनें खराब हैं, कहीं बंद कमरों में रखी हैं और कहीं उन्हें चलाने वाला स्टाफ नहीं है. सवाल सिर्फ वेंटिलेटर खरीदने का नहीं, बल्कि जरूरत पड़ने पर मरीजों को उनका लाभ मिलने का है. अस्पताल प्रशासन और स्वास्थ्य विभाग की जिम्मेदारी है कि करोड़ों रुपये के चिकित्सा उपकरण मरीजों की जान बचाने के काम आएं.