छत्तीसगढ़ हाई कोर्ट ने भरण-पोषण से जुड़े मामले पर अहम टिप्पणी की है. कोर्ट का कहना है कि ऐसे मामलों में पति को पत्नी की आय और कमाई के सोर्स को लेकर सवाल करने का पूरा हक है. हाई कोर्ट ने साफ किया है कि पत्नी ने अपनी आय को लेकर कोर्ट में जो शपथ पत्र दिया हो उसकी सच्चाई की जांच करने के लिए पति को बहस का अधिकार है.
यह मामला रायपुर की एक महिला और उनके पति का है. दरअसल, महिला ने दुर्ग फैमिली अदालत में BNSS की धारा 144 के तहत भरण-पोषण का आवेदन दिया था. सुप्रीम कोर्ट के रजनेश बनाम नेहा मामले में दिए निर्देशों के तहत महिला ने अदालत में अपनी आय और संपत्ति का ब्योरा देते हुए शपथ पत्र दिया था.
पति ने कोर्ट से पत्नी के शपथ पत्र में बताई गई आय और कमाई के सोर्स को लेकर सवाल करने की मांग की, लेकिन फैमिली कोर्ट ने उसे रोक दिया. इसके बाद पति ने हाई कोर्ट का दरवाजा खटखटाया. पति ने हाई कोर्ट में दलील दी कि अगर पत्नी के आय के दावों पर उसे बहस का मौका ही नहीं मिलेगा तो वह अपना बचाव कैसे करेगा. मामला जब छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट पहुंचा तो जस्टिस नरेंद्र कुमार व्यास ने पति की याचिका को मंजूरी दी.
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हाईकोर्ट ने दुर्ग कोर्ट के उस आदेश को रद्द किया, जिसमें पति को पत्नी की आय के सोर्स पर सवाल उठाने से रोका गया था. कोर्ट ने साफ कहा है कि 11 सितंबर की सुनवाई में पति को पत्नी के आय के सोर्स पर सवाल करने का मौका दिया जाए.
हालांकि, हाईकोर्ट ने इस बारे में ये भी चेतावनी दी है कि बहस के नाम पर कुछ ही सवालों को बार-बार दोहराकर कोर्ट का समय बर्बाद न किया जाए. कोर्ट का कहना है कि एक ही दिन पर पति और पत्नी दोनों की गवाही पूरी हो.
मामले में फैसला सिर्फ पति के पक्ष में नहीं है, कोर्ट ने पत्नी को भी पति के आय संबंधी सोर्स पर सवाल उठाने का पूरा अधिकार दिया है. कोर्ट का कहना है कि भरण-पोषण के मामले में दोनों पक्षों की वास्तविक वित्तीय स्थिति की जांच जरूरी है. कोर्ट के इस निर्देश के बाद गुजारा-भत्ता वाले मामले में पति और पत्नी दोनों की आय की जांच की जाएगी.