भदोही में इन दिनों कालीनों की खूब चर्चा है. वजह सिर्फ ये नहीं कि यहां देश-दुनिया के खरीदार पहुंचे हैं. वजह एक ऐसा कालीन भी है, जिसके सामने पहुंचकर लोग कुछ देर के लिए ठहर जा रहे हैं. पहली नजर डालिए तो शायद कुछ खास समझ न आए. फिर थोड़ा करीब जाइए. और अब ध्यान से देखिए. कालीन पर चेहरे दिखाई देने लगेंगे. ये चेहरे किसी आम डिजाइन के नहीं हैं. ये बच्चन परिवार की तीन पीढ़ियों के चेहरे हैं. एक तरफ महान कवि हरिवंश राय बच्चन. दूसरी तरफ उनके बेटे अमिताभ बच्चन. और उनके साथ अमिताभ के बेटे अभिषेक बच्चन. मतलब एक कालीन और तीन पीढ़ियों की कहानी.
भदोही में आयोजित चार दिवसीय इंडिया कारपेट एक्सपो में इस खास कालीन को रखा गया है. इसे भदोही की ग्लोबल ओवरसीज कंपनी ने डिजाइन किया है और यहां के बुनकरों ने इसे हाथ से तैयार किया है. अब जरा सोचिए, किसी तस्वीर को कालीन पर उतारना कितना मुश्किल काम होगा. यहां मामला सिर्फ डिजाइन बनाने का नहीं था. चेहरे की पहचान भी बनी रहनी थी. इसलिए इसे तैयार करने में करीब छह महीने लगे.
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कंपनी के निर्यातक संजय गुप्ता के मुताबिक, कालीन पूरी तरह हैंडनॉटेड है. इसमें प्योर वूल का इस्तेमाल किया गया है. इसे तैयार करने में करीब एक लाख रुपये की लागत आई है. इसे फिलहाल बेचा नहीं जा रहा. फिर बनाया क्यों? कंपनी ने इसे अपने स्टॉल पर शोकेस करने के लिए रखा है. यानी ये कालीन अभी किसी ड्राइंग रूम की दीवार पर नहीं जाएगा. फिलहाल इसका काम है भदोही की कारीगरी दिखाना.
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इस कालीन को देखने के लिए लोग रुक रहे हैं. क्योंकि तस्वीर को समझने में थोड़ा वक्त लगता है. दूर से देखने पर डिजाइन अलग लगता है और जैसे-जैसे नजर करीब जाती है, चेहरे साफ होते जाते हैं. यही इसकी सबसे बड़ी खासियत है. अब कहानी में एक और ट्विस्ट है. इस कालीन ने सिर्फ भारतीय खरीदारों का ध्यान नहीं खींचा. एक्सपो में पहुंचे कुछ ईरानी खरीदार भी इसे देखकर उत्साहित हो गए.

संजय गुप्ता के मुताबिक, अमिताभ बच्चन की तस्वीर देखकर उन्हें उनकी फिल्म शोले की याद आ गई. यानी जिस कालीन को भदोही में तैयार किया गया, उसकी कहानी एक्सपो में पहुंचकर भारत से बाहर के खरीदारों तक भी पहुंच गई. वैसे भदोही की पहचान ही कालीनों से जुड़ी है. यहां धागे सिर्फ फर्श या दीवार सजाने का काम नहीं करते. इन्हीं धागों से डिजाइन, तस्वीर और कभी-कभी पूरी कहानी तैयार कर दी जाती है.
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एक तरफ हरिवंश राय बच्चन की साहित्य की दुनिया है. दूसरी तरफ अमिताभ बच्चन का सिनेमा है. और तीसरी तरफ अभिषेक बच्चन की अपनी फिल्मी पहचान. तीनों को एक ही फ्रेम में लाने के लिए कैमरे या स्क्रीन का इस्तेमाल नहीं हुआ. धागों का इस्तेमाल हुआ. गांठों का इस्तेमाल हुआ. और करीब छह महीने की मेहनत लगी. कालीन की कीमत भले ही करीब एक लाख रुपये बैठी हो, लेकिन फिलहाल इसकी बिक्री नहीं हो रही.
इस कालीन को एक्सपो में एक खास कलाकृति के तौर पर रखा गया है. आखिर इस कालीन को देखने के लिए लोग रुक क्यों रहे हैं? शायद इसलिए कि ये सिर्फ एक कालीन नहीं है. इसमें एक परिवार की तीन पीढ़ियां हैं. एक कवि, एक महान अभिनेता और अगली पीढ़ी का अभिनेता. और इन तीनों को एक साथ जोड़ने वाली चीज है भदोही के बुनकरों के हाथों से निकला धागा. यानी बच्चन परिवार की कहानी इस बार पर्दे पर नहीं, कालीन पर बुनी गई है.