हिमाचल प्रदेश में होटल कारोबारियों की मुश्किलें बढ़ गई हैं. राज्य प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड ने होटलों के कंसेंट टू एस्टेब्लिश (CTE) और कंसेंट टू ऑपरेट (CTO) के शुल्क ढांचे में बदलाव किया है. नई दरों का सबसे ज्यादा असर छोटे होटल संचालकों पर पड़ रहा है. 10 से 13 कमरों वाले होटल का पांच साल का संचालन सहमति शुल्क ₹72 हजार से बढ़ाकर ₹1.80 लाख कर दिया गया है. यानी होटल संचालकों को अब ₹1.08 लाख अतिरिक्त चुकाने होंगे. यह करीब 150 फीसदी की बढ़ोतरी है.
नए शुल्क ढांचे में फीस होटल की श्रेणी के साथ उसकी परियोजना लागत के आधार पर तय की जा रही है. इसका असर सिर्फ नए होटलों पर नहीं, बल्कि पहले से चल रहे होटल कारोबारियों पर भी पड़ रहा है. पुराने होटल संचालकों को भी संशोधित दरों के हिसाब से शुल्क जमा करना पड़ रहा है.
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छोटे होटलों की सालाना फीस ₹14,400 से बढ़कर ₹36 हजार
ग्रीन श्रेणी में आने वाले 10 से 13 कमरों के होटल, जिनकी परियोजना लागत करीब ₹1.50 करोड़ तक है, पर इसका सीधा असर दिख रहा है. पहले इन होटलों से सालाना ₹14,400 शुल्क लिया जाता था, जो अब बढ़कर ₹36 हजार हो गया है. यानी छोटे होटल संचालकों को अब प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड की सहमति के लिए पहले से ढाई गुना रकम चुकानी होगी.
बड़े होटलों पर भी बढ़ेगा शुल्क का बोझ
ऑरेंज श्रेणी में आने वाले 20 से ज्यादा कमरों के होटलों पर भी नई दरों का असर पड़ सकता है. करीब ₹3 करोड़ से ₹5 करोड़ की परियोजना लागत वाले होटलों का संभावित सालाना शुल्क ₹60 हजार से ₹1 लाख तक हो सकता है. इस हिसाब से पांच साल का शुल्क करीब ₹3 लाख से ₹5 लाख तक पहुंच सकता है. यहां शुल्क परियोजना लागत के आधार पर तय किया जा रहा है.
होटल एसोसिएशन ने सरकार से की पुनर्विचार की मांग
फेडरेशन ऑफ हिमाचल होटल्स एंड रेस्टोरेंट एसोसिएशन्स के चेयरमैन देवेंद्र वर्मा ने प्रदेश सरकार से इस फैसले पर पुनर्विचार करने की मांग की है. उनका कहना है कि छोटे होटल और गेस्ट हाउस की तुलना बड़े औद्योगिक संस्थानों से करना सही नहीं है. पर्यटन क्षेत्र के छोटे प्रतिष्ठान स्थानीय स्तर पर रोजगार और आर्थिक गतिविधियों को बढ़ावा देते हैं. ऐसे में इतनी बड़ी बढ़ोतरी उनके लिए मुश्किल खड़ी कर सकती है.
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कारोबारियों की चिंता इसलिए भी बढ़ी है क्योंकि शुल्क नहीं जमा करने वाले कुछ होटल संचालकों को बोर्ड की ओर से होटल बंद करने के नोटिस जारी किए जा रहे हैं. होटल कारोबारी पहले से बिजली, पानी, कर्मचारियों की सैलरी और टैक्स जैसे खर्चों का सामना कर रहे हैं. अब बढ़े हुए शुल्क ने उनकी परेशानी और बढ़ा दी है. कारोबारियों की नजर इस बात पर है कि सरकार उनकी मांग पर क्या फैसला लेती है.